बिना इंटरनेट कैसे बनेगा डिजिटल इंडिया

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बेंगलूरु (परिवर्तन)।

वर्ष 2014 में सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास की कई योजनाओं की घोषणाएं की थीं। इनमें से एक योजना थी डिजिटल इंडिया। नरेंद्र मोदी ने कहा कि डिजिटल इंडिया ने लोगों की आदत बदल दी है। उनका दावा है कि अब गांव-गांव में डिजिटल भुगतान किया जा रहा है। लेकिन क्या सचमुच डिजिटल इंडिया के चलते वाक़ई देश बदल रहा है? क्या इससे गांव में रहने वालों की ज़िंदगी बदल रही है? प्रधानमंत्री का यह कहना कि किसी को दिखे या ना दिखे, देश बदल रहा है ख़ुद ही सवालिया निशान लगाता है। सरकार का दावा है कि डिजिटल इंडिया से लोगों को नौकरियां मिल रही हैं। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, वो तो भगवान ही जाने। डिजिटल इंडिया के तहत लोगों को कैशलेस करने के चक्कर में बहुत परेशानी भी हुई है। केवल गांवों में ही नहीं बल्कि देश के कई प्रमुख शहरों इंटरनेट काम नहीं करता है। पिछले दो-चार सालों से एयरटेल जैसी कंपनियां भी संघर्ष कर रही हैं। सरकारी बीएसएनएल कंपनी का नेटवर्क हर जगह है, लेकिन बहुत सुस्त है। इन पर लोड ज़्यादा हो गया है। सरकार योजनाओं की घोषणा कर देती है, लेकिन ज़मीन पर लागू नहीं होती। इन दिनों कॉल ड्रॉप की समस्या के साथ ही इंटरनेट की खराब और पस्त हालत से डिजिटल इंडिया का कैंपेन विफल होता नजर आ रहा है। चाहे बात सरकारी कनेक्शन की हो या फिर बात निजी कंपनियों की, इंटरनेट सुविधा के मामले में दोनों ही फिसड्डी है। इसीलिए शायद सरकार ने भारत संचार निगम लिमिटेड यानि बीएसएनएल को पहले तो एमटीएनएल के साथ मर्ज किया, लेकिन फिर भी जब कंपनी की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ तो अंततः सरकार ने इसे भी निजी कंपनी को बेचने पर विचार किया जा रहा है, जिसके तहत सरकार ने धीरे धीरे कंपनी की विभिन्न संपत्तियों को बेचने का सिलसिला शुरू कर दिया है। यहां सवाल यह उठता है कि जब समस्या की जड़ खराब कनेक्टिविटी, सुस्त इंटरनेट और कॉल ड्रॉप जैसी समस्याओं की हो तो ऐसे में देश डिजिटल कैसे बन पाएगा। जब इंटरनेट की हालत की तुलना हम दूसरे देशों से करते हैं, तो तस्वीर और साफ़ हो जाती है। कंटेंट डिलीवरी नेटवर्क सर्विस प्रोवाइडर अकामाई की 'स्टेट ऑफ़ द इंटरनेट - कनेक्टिविटी' रिपोर्ट ने भारत की इंटरनेट की स्पीड की पोल खोली है। रिपोर्ट के मुताबिक़, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत और फिलिपींस ऐसे देश हैं जो 4 एमबीपीएस के बेसिक स्टैंडर्ड तक नहीं पहुँच पाए हैं। ये दोनों देश 3.5एमबीपीएस ब्रॉडबैंड की औसत स्पीड के साथ फ़ेहरिस्त में सबसे नीचे 114वें पायदान पर हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में सबसे बेहतरीन इंटरनेट वाला देश दक्षिण कोरिया है, जहां औसत स्पीड 29 एमबीपीएस है। डिजिटल इंडिया पिछड़े भारत को कैसे जोड़ता है उसके लिए सरकार की दो योजनाएं बहुत अच्छी हैं। एक डिजिटल लिटरेसी और दूसरा भारत नेट है। डिजिटल प्रशिक्षण के लिए 6 करोड़ लोगों के लिए बजट भी पास किया। इसमें भी कमी है कि आंकड़ा पूरा करने की होड़ के बजाय किन लोगों को डिजिटली शिक्षित करना है यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। 6 करोड़ लोगों में सारे शिक्षक, पंचायत के सभी निर्वाचित सदस्य, सभी आशा वर्कर्स आदि को शामिल किया जाना चाहिए। इन लोगों को डिजिटली शिक्षित करेंगे को तो ज़्यादा सार्थक होगा। सरकार दावा कर रही है कि सवा लाख गांवों में इंटरनेट पहुंच चुका है, लेकिन जब क़रीब 270 पंचायतों का सर्वे किया तो मालूम चला कि केवल 18 से 20 फ़ीसदी कनेक्शन काम कर रहे हैं या काम करने के लायक हैं। जितनी भी योजनाओं की घोषणा की जा रही हैं वो ज़मीन पर प्रभावी हैं या नहीं।

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