जनता के भ्रम का कारण

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश की आम जनता तक काफी भ्रम फैलाने वाली बाते की जा रही है। इसे आप जनता को दिग्भ्रमित करने का तरीका या राजनीति करने का तरीका, कुछ भी कह सकते हैं। हालांकि अब इस विषय पर अपनी बात पहुंचाने के लिए भाजपा ने एक अभियान शुरू करने का जो फैसला किया है, वह देर से उठाया गया कदम ही दिखता है। मालूम हो कि इस अभियान के तहत दस दिनों में तीन करोड़ परिवारों से मिलकर नागरिकता संशोधन कानून के बारे में बताने और साथ ही जगह-जगह प्रेस कांफ्रेंस करने की भी योजना है। देखा जाए तो यह काम अब तक हो जाना चाहिए था, बल्कि केंद्र सरकार की पहली जिम्मेदारी यही होनी चाहिए थी कि वे जनता तक इस एक्ट की सारी जानकारियां पहुंचाए। पार्टी के साथ मोदी सरकार को भी आम जनता से संपर्क-संवाद की जरूरत तभी समझ लेनी चाहिए थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नागरिकता कानून को व्यापक प्रचार-प्रसार की जरूरत है। हालांकि यह समझना कठिन है कि नागरिकता कानून पर विपक्ष के तीखे विरोध के बाद भी सत्ता पक्ष को यह समझने में देरी क्यों हुई कि जो तत्परता उन्होंने संसद में बिल को पास करते वक्त दिखाई थी वही फूर्ती उन्हें जनता के समक्ष इस बिल को पास कर एक्ट बनाते वक्त भी दिखानी थी। आज इसी एक भूल की वजह से देश में इस एक्ट को लेकर घमासान मचा हुआ है। चारों तरफ सूचना की कमी की वजह से भ्रम और झूठी अफवाहें फैलाई जा रही है। यह भाजपा की भूल ही है कि उन्होंने यह समझा कि इस विधेयक पर संसद की मुहर लगते ही, अब इस मसले पर कुछ कहने-बताने और खासकर विरोध कर रहे लोगों से बात करने की जरूरत नहीं। यह मानने के कारण हैं कि सत्तापक्ष यह भी नहीं समझ सका कि नागरिकता संशोधन कानून के साथ प्रस्तावित एनआरसी को लेकर जनता के बीच किस तरह भ्रम फैलाकर न केवल उन्हें गुमराह किया जा रहा है बल्कि उकसाया भी जा रहा है। यह काम विपक्षी नेताओं की ओर से तो किया ही जा रहा, वामपंथी रुझान वाले बुद्धिजीवियों और फिल्म जगत के लोगों की ओर से भी किया जा रहा है। इस काम में मीडिया के एक हिस्से की भी भूमिका है। इसी कारण विरोध के नाम पर अराजकता का खुला प्रदर्शन भी किया जा रहा है और उसे बेशर्मी के साथ सही भी ठहराया जा रहा है। उन्माद भरे उपद्रव का सिलसिला भी इसीलिए कायम है।

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