स्त्रियों को हो उपासना की स्वतंत्रता

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अम्मा की दृष्टि में, स्त्री-पुरुष दोनों समान हैं। वे एक पक्षी के दो पंखों जैसे हैं। किस आँख, दायीं या बाईं, को अधिक महत्वपूर्ण कहेंगे? दोनों का अपना-अपना महत्व है। समाज में ऐसा ही दर्जा है स्त्री-पुरुष का! दोनों को ही अपने-अपने धर्म के प्रति जागरूक रहते हुए, एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए। इसी प्रकार हम विश्व में सामंजस्य बनाये रख सकते हैं। यदि स्त्री और पुरुष एक दूसरे की संपूरक शक्तियाँ बनकर, मिल-जुल कर परस्पर आदर सहित आगे बढ़ें तो पूर्णत्व को प्राप्त होंगे।

वस्तुतः, पुरुष स्त्री का ही अंश हैं। प्रत्येक शिशु सर्वप्रथम माता के गर्भ में, उसके अस्तित्व का ही अंग बन कर रहता है। जहाँ तक जन्म का सम्बन्ध है, पुरुष की एकमात्र भूमिका बीज डालने की ही है। उसके लिए यह भोग-सुख के क्षण मात्र से अधिक कुछ नहीं, जबकि स्त्री के लिए इसके आगे नौ-माह की कठिन तपस्या होती है। इस जीवन को ग्रहण, धारण कर स्त्री ही इसे अपने अस्तित्व का अंश बना कर रखती है तथा अपने भीतर उसके पलने-बढने के लिए सबसे अनुकूल वातावरण प्रदान करती है और फिर समय आने पर जन्म देती है। स्त्री मूलतः, माता, जीवन-स्रष्टा है। पुरुष के अवचेतन मन में कहीं यह आकांक्षा बनी रहती है कि माँ के शुद्ध प्रेम में फिर से लथपथ हो जाए। पुरुष के स्त्री के प्रति आकर्षण का यह एक सूक्ष्म कारण है क्योंकि वो उसकी जन्म-दात्री है। मातृत्व की वास्तविकता पर कोई भी प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता - कि पुरुष की रचना स्त्री से हुई है। फिर भी जिन्हें अपने संकीर्ण मानसिकता से बाहर आने से इनकार है, वे कभी इस मूलभूत वास्तविकता को समझ नहीं पायेंगे। जिन्हें केवल अंधकार का ज्ञान है, उन्हें प्रकाश के विषय में समझाना कठिन है।

मातृत्व स्वयं में ब्रह्माण्ड सदृश एक बहुत विशाल व्यवस्था है। मातृत्व-शक्ति के बल पर, एक स्त्री समस्त विश्व को प्रभावित कर सकती है। परमात्मा पुरुष है अथवा स्त्री? इस प्रश्न का उत्तर है - वह न पुमान है न स्त्री - परमात्मा 'वह ' है। किन्तु आप यदि परमात्मा के लिंग के विषय में आग्रह ही रखते हों तो वो स्त्रीलिंग अधिक है क्योंकि पुल्लिंग, स्त्रीलिंग में ही निहित है। महिलाओं को जागृत होना होगा! आज, समय की मांग है कि आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ महिलाओं को आत्मज्ञान की शिक्षा भी दी जाए। कुछ वर्ष पूर्व, इस बात पर भारी विवाद उठ खड़ा हुआ था कि महिलाओं को शबरीमला मंदिर में जाने की अनुमति होनी चाहिए अथवा नहीं। क्योंकि मंदिर घने जंगल के भीतर स्थित है और वो भी खडी ढाल वाली पहाड़ी के शिखर पर, अतः वहाँ तक यात्रा कर के जाना प्रायः दुष्कर व खतरनाक हुआ करता था। जंगली हाथी तथा भेड़िये मंदिर के रास्ते में घूमते-फिरते रहते थे और लोगों को कई दिनों तक पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। ऐसे में, यदि तीर्थ-यात्रियों के दल में महिलाएं भी होतीं तो यात्रा और अधिक कठिन हो जाती। कदाचित यही कारण था कि महिलाओं को शबरीमला जाने की अनुमति नहीं दी जाती थी। किन्तु बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। ऐसी समस्याओं में आध्यात्मिक आचार्यों का परामर्श लेना आवश्यक है। [वेदों व शास्त्रों में निर्धारित] आचार-संहिता धर्म की आधार-स्तम्भ है, इन आचारों की अवमानना का अर्थ होगा सर्वनाश को गले लगाना। अम्मा के विचार में तो स्त्री व पुरुष दोनों को ही पूजा-उपासना हेतु समान स्वातंत्र्य होना चाहिए। अम्मा द्वारा प्रतिष्ठित ब्रह्मस्थान मंदिरों में अम्मा ब्रह्मचारिणियों को शास्त्रीय नियमों के अनुसार पूजा आदि के लिए प्रोत्साहन देती हैं। इन मंदिरों में पूजा को लेकर लिंग-भेद का कोई स्थान नहीं है। अम्मा की मानें तो कम-से-कम परमात्मा के सम्मुख जा कर तो इस भेद-दृष्टि का तिरस्कार करें।


अपनी दैवी शक्ति को जागृत करें

कृपया विश्व को एक रेगिस्तान न बनाएं! हम इस धरती से प्रेम व करुणा लुप्तप्राय होने नहीं दे सकते। यदि ऐसा हुआ तो मनुष्य ही नहीं रहेगा, मनुष्य के रूप में पशु रह जायेगा। वर्तमान स्थिति स्थिति को देखते हुए, अम्मा को संदेह होने लगता है कि कदाचित शांति तथा एकता चाहने वाले लोगों की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। क्या मनुष्य जान-बूझ कर अपने भीतर पाशविक-वृत्तियों को बढ़ावा दे रहा है? अथवा वो मौजूदा परिस्थितियों का असहाय शिकार हो गया है? कारण जो भी हो, केवल मनुष्य के सामर्थ्य में विश्वास रखना गलत होगा। हमें परमात्मा के सामर्थ्य की आवश्यकता होगी। परमात्मा की शक्ति कहीं बाहर नहीं, हमारे भीतर है, केवल हमें इसे जागृत करना है। जिस शान्ति की हम जिज्ञासा करते हैं, वो कोई अध्यारोपित शान्ति नहीं और न ही मृत्योपरांत प्राप्त होने वाली कोई वस्तु है। यह वो शान्ति है जिसका समाज में तब प्राकट्य होता है जब सब अपने-अपने धर्म पर अटल रहते हों। प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे में अपनी आत्मा का ही दर्शन करते हुए दूसरे का सम्मान करना चाहिए।

आज, प्रार्थना एवं साधना की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। लोग ऐसा सोचते हैं कि, "केवल मेरे प्रार्थना करने से क्या लाभ हो सकता है?" ऐसी सोच ही गलत है। प्रार्थना द्वारा, हम प्रेम के बीज बो रहे हैं। पूरे रेगिस्तान में एक भी फ़ूल खिले तो कुछ तो होगा। वहाँ एक भी वृक्ष उगाया जाए तो क्या थोड़ी सी छाया नहीं देगा? बच्चो, यह सदा याद रहे - प्रार्थना प्रेम है और प्रेम ही के माध्यम से विश्व भर में शुद्ध प्रेम की तरंगें हिलोरें लेने लगती हैं। आतंकवादियों, युद्ध-संबंधी प्रवृत्ति तथा आपराधिक-प्रवृत्ति वाले लोगों के हृदय प्रेम व करुणा से रिक्त हो गए हैं। ईश्वर करे कि करोड़ों लोगों की प्रार्थनाओं के फलस्वरूप वातावरण प्रेम तथा करुणा से सिक्त हो उठे ताकि उनके दृष्टिकोण में थोड़ा सा परिवर्तन तो आये। आज विश्व को आवारा हाथी जैसे जीने वाले स्वार्थी लोगों की आवश्यकता नहीं है, जिन्हें हत्या, लूटपाट के सिवा कुछ और नहीं आता। यह तो अहंकार की भाषा है। आज हमें आवश्यकता है प्रेम व करुणा से लबालब भरे हृदयों की जो समाज की असली ताक़त हैं। उन्हीं के हाथों समाज का उत्थान सम्भव है।

अम्मा का स्वप्न है कि कम-से-कम एक रात के लिए ही सही, विश्व का प्रत्येक व्यक्ति भय-मुक्त हो कर सो सके। प्रत्येक व्यक्ति को कम-से-कम एक दिन भरपेट भोजन प्राप्त हो। कम-से-कम एक दिन ऐसा हो जब एक भी व्यक्ति हिंसा के कारण अस्पताल का मुंह न देखे। कम-से-कम एक दिन निस्स्वार्थ सेवा द्वारा, प्रत्येक व्यक्ति गरीबों, ज़रूरतमंदों की सहायता करे। अम्मा की प्रार्थना है कि कम-से-कम उनका यह छोटा सा स्वप्न साकार हो।

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