जल्लाद की भूमिका में पुलिस

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

नागरिकता संशोधन बिल अब कानून बन चुका है। इस कानून को लेकर देश के कई हिस्सों में उग्र प्रतिवाद का माहौल बन गया है और स्थानीय सरकार को इसके विरोध, प्रदर्शन और दुष्परिणामों का सामना करना पड़ रहा है। असल में देखा जाए तो इस कानून को लेकर विरोध की शुरूआत भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों से शुरू हुई, लेकिन धीरे धीरे यह देश के अन्य हिस्सों में भी फैल गई। इनमें मुख्य रूप से राजधानी दिल्ली, मुंबई, अलीगढ़, हैदराबाद, बेंगलूरु, कोच्चि, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल के कई विश्व विद्यालयों के छात्र-छात्राएं अपने स्तर पर कानून का विरोध कर रहे हैं। सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन करने के क्रम में कई जगहों से बसों और सरकारी संप्पति को भी नुकसान पहुंचाने की खबरें सामने आई हैं।  इस कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन के बीच सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। रविवार की देर शाम भी एक ऐसी ही वीडियो ने देश वासियों को हिला कर रख दिया। इस वीडियो में दिखा गया कि प्रदर्शन कर रहे जामिया के छात्रों को पुलिस घर से बाहर की ओर घसीट कर उन पर लाठीचार्ज कर रही है। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों ने स्थानीय पुलिस पर आरोप लगाया है कि बिना किसी कारण पुलिस बल ने विश्वविद्यालय में घुस कर छात्रों के साथ मारपीट, लाठीचार्ज और तोड़फोड़ किया है। इस दौरान कई छात्रों के बुरी तरह घायल होने की खबरें आई। इस घटना के बाद देश भर में पुलिस की बर्बरता के खिलाफ छात्र अपना रोष प्रकट कर रहे हैं। पुलिस द्वारा लिए गए इस एक्शन को कुछ बुद्धिजीवी सही बता रहे हैं तो हजारों लोग इसे लोकतंत्र का एक काला दिन भी बता रहे हैं। जामिया के छात्रों का कहना है कि सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस को हमने उस रात जल्लाद की भूमिका में देखा। पुलिस कैंपस में घुस आई और अंधाधुन तरीके से छात्रों को पीटने लगी जो कि सरासर गलत है।   यहां समझने वाली बात यह है कि केंद्र की मोदी सरकार ने अपनी सोच से इस बिल को संसद में पेश किया था, जिसे पूर्ण समर्थन मिलने के बाद अब इसे कानून बना दिया गया है। भारतीय लोकतंत्र में सरकार के किसी भी निर्णय पर असहमति जताने के कई विभिन्न तरीके हैं, जिनमें से विरोध-प्रदर्शन एक है। इस कानून पर अपनी असहमति व्यक्त करते हुए अगर छात्र प्रदर्शन के हिस्सा बन रहे हैं तो इसमें दिक्कत ही क्या है। पुलिस की इस कार्रवाई का कोई मतलब हमारी समझ से परे हैं। इस घटना के बाद लोग पुलिस के कार्य को कितनी गंभीरता से लेंगे ये तो वक्त ही बताएगा, क्योंकि छात्रों पर बल प्रयोग कर पुलिस ने अपनी छवि को धूमिल कर दिया है। 

हालांकि यह कोई पहली बार नहीं है कि देश की पुलिस द्वारा बेवजह लोगों को पीटा गया। आपको याद होगा पिछले दिनों दिल्ली के वकीलों और पुलिस में भी झड़प और तनातनी की घटना सामने आई। इतना ही नहीं बल्कि 1988 में दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में भी मामूली झड़प के बाद पुलिस ने वकीलों को पीटा था। उस समय किरण बेदी डीसीपी थी, और उन्होंने भी पुलिस के एक्शन का समर्थन किया था।

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