क्या देश को अभी नागरिकता संशोधन कानून की जरूरत थी

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। बेरोजगारी, भूखमरी, किसानों की आत्महत्मा, बढ़ता अपराध, बढ़ती महंगाई, घटते जीडीपी दर और इन सबके जवाब में आया नागरिकता संशोधन कानून। देश जहां इतनी सारी समस्याओं के साथ जूझ रहा है, वहीं केंद्र सरकार ने जनता के इन तमाम सवालों का जवाब देते हुए नागरिकता संशोधन बिल को पारित करवा लिया और अब यह कानून बन चुका है।

हालांकि नागरिकता संशोधन बिल भाजपा के चुनाव एजेंडे में शामिल था, लेकिन इस वक्त क्या सचमुच इसकी जरूरत महसूस हो रही है। अगर आपका भी जवाब हां है तो क्या यह केंद्र सरकार की और भाजपा के नेताओं की जिम्मेदारी नहीं थी कि वे इस बिल के बारे में तमाम जानकारियां जनता के साथ विस्तृत रूप साझा करें। यही कारण है कि देश में इसका विरोध तेजी से हो रहा है और उत्तर भारत से उठी ये विरोध की आवाज़ अब दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलूरु एवं कोच्चि तक फैल रही है। लेकिन अब भी मोदी सरकार इस विषय पर कुछ कहने से बच रही है। आखिर क्यों ? आइए सबसे पहले ये समझते हैं कि क्या है नागरिकता संशोधन कानून और क्यों हो रहा है इस पर विरोध ?  बीते 12 और 13 दिसंबर की रात को नागरिकता संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर कर दिया गया और इसे क़ानून की शक्ल दे दी गई। लेकिन राष्ट्रपति तक विधेयक पहुंचने से पहले ही पूरे पूर्वोत्तर में इसका ज़ोरदार विरोध शुरू हो गया। इससे पहले 10 दिसंबर को लोकसभा में इस विधेयक पर लंबी चर्चा हुई जिसके बाद सदन में ये बहुमत से पास हो गया। इसी दिन से बिल के विरोध में असम में छात्रों और आम लोग सड़कों पर उतरना शुरु हो गया था। स्थिति पर काबू पाने के लिए सुरक्षाबलों की भारी तैनाती की गई लेकिन सड़कों पर विरोध कम नहीं हुआ। बीते 11 दिसंबर को विधेयक राज्यसभा पहुंचा और देर शाम जब ये पारित हुआ उस वक्त तक उत्तरपूर्व के असम, मणिपुर, त्रिपुरा में विरोध प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी। शाम तक गुवाहाटी में कर्फ्यू लगा दिया गया था। जामिया नगर में इस कानून के खिलाफ हो रहा प्रदर्शन उस समय हिंसक हो गया था,  जब प्रदर्शनकारियों ने तीन बसों में आग लगा दी थी और एक फायर ब्रिगेड की गाड़ी में भी तोड़फोड़ की थी। इसके बाद पुलिस ने बेरहमी से जामिया यूनिवर्सिटी कैंपस पर एक तरहसे धावा बोल दिया। पुलिस ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में घुसकर छात्रों और शिक्षकों के साथ मारपीट की थी। वहीं इस दौरान घटना को कवर कर रहे पत्रकारों को भी पुलिस ने नहीं बख्शा था।

विद्यार्थियों को उकसाया जाना गलत

इन सब के बीच एक बात का ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि देश में युवाओं द्वारा किया जा रहा ये विरोध किसी भी मोड़ पर व्यापक रूप ले सकता है। विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं के साथ दिल्ली पुलिस ने जो बर्बरता दिखाई है, इससे विद्यार्थिय़ों का आक्रोश और अधिक बढ़ गया है। हालांकि इस बात पर भी दो राय नहीं है कि कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा उपद्रव की घटनाएं भी सामने आई हैं। लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक लाभ के लिए सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से लोगों के बीच इस मामले को हिन्दू-मुस्लिम बता कर लोगों को उकसाया जा रहा है। जब बिना किसी तैयारी के मोदी सरकार ने इतना बड़ा निर्णय ले लिया है तो इसके विरोध से होने वाले दुष्परिणामों का सामना करने के लिए भी उन्हें तैयार रहना चाहिए। हालांकि बात यह भी सच है कि अगर इस कानून को देश के कुछ नागरिक मानने से मना कर रहे हैं तो सड़कों पर हिंसक झड़प किए बिना, देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाए बिना, और कानून व्यवस्था को बनाए हुए भी इस मामले के समाधान की मांग कर सकते हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे विचार और न्याय के लिए हमेशा खुले हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि मामले की सुनवाई तब तक नहीं होगी जब तक हिंसा रूक नहीं जाती।

क्या है नागरिकता संशोधन क़ानून ?

भारत के पूर्वोत्तर में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर विरोध होता रहा है जिसका उद्देश्य पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से ग़ैर-मुसलमान अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए नियमों में ढील देने का प्रावधान है। इस बार भले ये क़ानून बन गया हो लेकिन इससे पहले भी मोदी सरकार ने इसे पास कराने की कोशिश की थी। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान इसी वर्ष 8 जनवरी को यह लोकसभा में पारित हो चुका है। लेकिन इसके बाद पूर्वोत्तर में इसका हिंसक विरोध शुरू हो गया, जिसके बाद सरकार ने इसे राज्यसभा में पेश नहीं किया। सरकार का कार्यकाल पूरा होने के साथ ही यह विधेयक स्वतः ख़त्म हो गया। मई में नरेंद्र मोदी की सरकार का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ। इस दौरान अनुच्छेद 370 समेत कई बड़े फ़ैसले किए गए और अब नागरिकता संशोधन विधेयक भी क़ानून बन गया है। संसद में इसे विधेयक के रूप में पेश करने से पहले ही पूर्वोत्तर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। सरकार की तरफ से जो विधेयक पेश किया गया था उसमें दो अहम चीज़ें थीं - पहला, ग़ैर-मुसलमान प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देना और दूसरा, अवैध विदेशियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजना, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने 20 नवंबर को सदन को बताया था कि उनकी सरकार दो अलग-अलग नागरिकता संबंधित पहलुओं को लागू करने जा रही है, एक सीएए और दूसरा पूरे देश में नागरिकों की गिनती जिसे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर या एनआरसी के नाम से जाना जाता है। अमित शाह ने कहा था कि सीएए में धार्मिक उत्पीड़न की वजह से बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। उन्होंने बताया था कि एनआरसी के जरिए 19 जुलाई 1948 के बाद भारत में प्रवेश करने वाले अवैध निवासियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर करने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। मूल रूप से एनआरसी को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से असम के लिए लागू किया गया था। इसके तहत अगस्त के महीने में यहां के नागरिकों का एक रजिस्टर जारी किया गया। प्रकाशित रजिस्टर में क़रीब 19 लाख लोगों को बाहर रखा गया था। जिन्हें इस सूची से बाहर रखा गया उन्हें वैध प्रमाण पत्र के साथ अपनी नागरिकता साबित करनी थी। हालांकि, अमित शाह ने कहा था कि नई राष्ट्रव्यापी एनआरसी प्रक्रिया में असम फिर से शामिल होगा। पूर्वोत्तर में व्यापक विरोध प्रदर्शन के बावजूद नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर आगे भाजपा आगे क्यों बढ़ी, इसकी वजह इस पूरे क्षेत्र में पार्टी को मिली चुनावी सफलता है। जब केंद्र सरकार अपने पहले कार्यकाल के दौरान इस विधेयक को पास करवाने की कोशिश में लगी थी तब पूर्वोत्तर में कई समूहों ने बीजेपी का विरोध किया था। लेकिन, जब 2019 के चुनाव परिणाम आए तो पूर्वोत्तर में बीजेपी और इसकी सहयोगी पार्टियों ने अच्छा प्रदर्शन किया। समूचे पूर्वोत्तर की 25 संसदीय सीटों में से बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों को 18 पर जीत मिली। बीजेपी को इस बात की उम्मीद है कि हिंदुओं और ग़ैर-मुसलमान प्रवासियों को आसानी से नागरिकता देने की वजह से उसे बहुत बड़ी संख्या में हिंदुओं का समर्थन मिलेगा।

कई कोशिशें हुईं नाकाम

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि उत्तर पूर्व को इस विधेयक के कारण नुक़सान नहीं होगा। लेकिन उनकी बात के असर होता कहीं दिखा नहीं। ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन विधेयक को पेश करने के दौरान ही यानी 9 दिसंबर को मणिपुर को भी इनर लाइन परमिट में शामिल करने का प्रस्ताव किया गया था। लेकिन हिंसा भड़कने के बाद ही इससे संबंधित दस्तावेज़ बने। 11 दिसंबर को अचानक मणिपुर में भी इनर लाइन परमिट व्यवस्था लागू करने संबंधी आदेश पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए। इनर लाइन परमिट एक तरह का यात्रा दस्तावेज़ है, जिसे भारत सरकार अपने नागरिकों के लिए जारी करती है, ताकि वो किसी संरक्षित क्षेत्र में निर्धारित अवधि के लिए यात्रा कर सकें। फिलहाल ये अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिज़ोरम और मणिपुर में लागू है।कांग्रेस नेता गौर गोगोई इसे बीजेपी की विभाजनकारी नीति बताते हैं और कहते हैं कि ये उत्तर-पूर्व को बाँटने का बीजेपी का एक तरीक़ा है। लेकिन मामला सिर्फ़ उत्तरपूर्व में विरोध का नहीं है. बल्कि दिल्ली, मुंबई, औरंगाबाद, केरल, पंजाब, गोवा, मध्यप्रदेश समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे हैं। क्या बीजेपी को इस बात का अंदेशा नहीं था कि असम में इतने बड़े स्तर के प्रदर्शन शुरू हो जाएंगे? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे भारत आने वाले थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गुवाहाटी में उनकी मुलाक़ात होने वाली थी। आबे का दौरा 15-17 दिसंबर तक के लिए प्रस्तावित था मगर अंतिम वक्त पर इसे टाल दिया गया। चर्चा हो रही है कि अगर सरकार को अनुमान होता कि इस तरह के प्रदर्शन हो सकते हैं तो इस मुलाक़ात के लिए या तो गुवाहाटी को नहीं चुना जाता या फिर इस समय इस विधेयक को पेश करने से बचा जाता। 

क्यों नहीं चला बीजेपी का फॉर्मूला?

राजनीतिक विश्लेषक राधिका रामासेशन कहती हैं, "मुझे लगता है कि दिल्ली से बहुत कम लोग ही उत्तर पूर्व को समझ पाए हैं। वहां कई तरह के समुदाय हैं और उन्हें समझने में पूरा एक जनम लगेगा। बीजेपी पूरे उत्तर पूर्व को असम की तरह समझ रही थी। शायद असम को भी पूरी तरह बीजेपी समझ नहीं पाई है।" बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार कोलकाता में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक बताते हैं, "उत्तर पूर्व के बारे में बीजेपी की जानकारी बहुत कम है। इसका कारण ये है कि बीजेपी के नेता हर चीज़ को धर्म के चश्मे से देखते हैं। उन्हें लगा कि वो ऐसा कर देंगे तो हिंदू लोग उनके पक्ष में आ जाएंगे। उन्हें ये अंदाज़ा नहीं है कि असम या उत्तर पूर्व के दूसरे क्षेत्र हैं वहां रहने वालों के लिए बंगाली हिंदू और बंगाली मुसलमान एक ही चीज़ है. वो मानते हैं कि ये लोग यहां आकर बसेंगे तो यहां की डेमोग्राफ़ी बदल जाएगी।" "बीजेपी का मंत्र, 'असमिया हिंदू, बंगाली हिंदू भाई भाई' ये फॉर्मूला वहां नहीं चल पाया। उन्हें लगा कि असम में हमें बहुमत मिला था और ये हिंदू राज्य है यहां कोई विरोध नहीं होगा। लेकिन बाद में उन्होंने यहां कुछ जगहों पर इनर लाइन परमिट को बढ़ाया। ऐसे में असम और त्रिपुरा में लोगों को लगने लगा कि दूसरी जगहों के बंगाली हिंदू उनकी जगहों में आ जाएंगे।" सुबीर भौमिक बताते हैं, "बीजेपी जल्दबाज़ी में अपना कोई राजनीतिक एजेंडा कामयाब करना चाहती है। उन्हें पता है कि अर्थव्यवस्था जैसे मामलों में वो पहले ही बैकफुट पर हैं तो हम हिंदू एजेंडा आगे बढ़ाएंगे। उन्हें लगा कि कश्मीर, एनआरसी, राम मंदिर और नागरिकता संशोधन क़ानून कर देंगे को हिंदू वोट हमारे पक्ष में जाएंगे। पार्टी बहुत जल्दी में है।" राधिका रामासेशन बताती हैं, "ये केवर उत्तर भारत का सवाल नहीं है। बीजेपी पश्चिम बंगाल में चुनावों पर भी ध्यान दे रही है। उन्हें लगता है कि अगर वो नागरिकता संशोधन क़ानून को ठीक से लागू कर लेंगे तो उन्हें बंगाली हिंदुओं का एक नया वोटबैंक (जिन्हें अब तक नागरिकता नहीं मिली है) उन्हें मिल जाएगा।" "एक वक्त कांग्रेस ने भी असम में मुसलमान वोट बैंक बनाया था। उन्होंने ईस्ट पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को लेकर एक ठोस वोट बैंक था।"

क्यों और कैसे शुरू हुआ विरोध

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में पूर्वोत्तर सुलग रहा है। पश्चिम बंगाल में बवाल हो रहा है। सड़कों पर अशांति है। ट्रेनें रोकी जा रही हैं। तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं हो रही हैं। यह विरोध असम समेत पूरे पूर्वोत्तर में अखिल असम छात्र संस्था (आसू) तथा नॉर्थ-ईस्ट स्टूडेंट आर्गेनाइजेशन (नेसो) के आह्वान पर आरंभ हुआ है। इस आंदोलन को अन्य कई संगठनों द्वारा भी समर्थन मिल रहा है। हालांकि आंदोलन आरंभ होने के बाद बराक घाटी के लोग भावनात्मक रूप से पूरी शिद्दत के साथ जुड़ गए हैं। लेकिन यह भी सच है कि आंदोलन के नाम पर कुछ बाहरी तत्व बड़े पैमाने पर हिंसक गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में विरोध मुख्यतः दो बिंदुओं पर हो रहा है। असम में इसे भाषा, संस्कृति, इतिहास, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के मामले में स्थानीय लोगों के अल्पसंख्यक होने के रूप में बताया जा रहा है। अन्य राज्यों में इसे राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों के हनन के रूप में देखा जा रहा है। नागरिकता विधेयक में संशोधन पहली बार हुआ है, ऐसा भी नहीं है। अब से पहले 9 बार इसमें संशोधन हो चुका है। लेकिन कभी इस तरह का विरोध नहीं देखा गया। इस कानून का असर मुख्य रूप से असम, त्रिपुरा, मेघालय व नगालैंड के कुछ इलाकों तक ही होगा। ईस्टर्न बंगाल फ्रंटियर एक्ट के तहत अरुणाचल प्रदेश को विशेष रियायत मिली हुई है। पार पत्र (इनर लाइन परमिट) की व्यवस्था वाले राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम के अलावा नगालैंड के अधिकांश हिस्सों में इसका असर नहीं होगा। संविधान की छठी अनुसूची में शामिल असम के कई इलाकों के साथ ही नगालैंड, मेघालय, त्रिपुरा के अधिकांश हिस्सों में भी इस कानून का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। पूर्वोत्तर के अधिकांश क्षेत्र जनजातीय इलाके हैं। इसकी वजह से संविधान के जरिये जनजातीय अस्मिता को सुरक्षित रखने के लिए कई तरह के प्रावधान किए गए हैं। ऐसे में नागरिकता संशोधन कानून का प्रभाव एक सीमित इलाकों तक ही होगा। इस कानून के विरोध की एक मुख्य वजह बहुत पुरानी है। अंग्रेजों ने जब पूर्वोत्तर की सत्ता की बागडोर संभाली तो उन्हें कामकाज करने के लिए अंग्रेजी भाषा जानने वालों को बाहर से लाना पड़ा। उसमें बड़ी संख्या बांग्लाभाषी थे। इसकी वजह से राज्य की मूल भाषा असमिया पर गहरा असर हुआ। बांग्ला भाषा का सरकारी कार्यालयों में उपयोग होने की वजह से स्थानीय लोगों के लिए यह एक बड़ी चिंता बन गई। नतीजतन, भाषा के नाम पर विवाद होने लगा। यह फिलहाल बरकरार है। 

1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में लोग बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से शरण लेने के लिए भारत में आए थे। युद्ध के बाद उनकी बड़ी संख्या भारत में रह गई। 70 के दशक में स्थानीय लोगों को बड़ी संख्या में घुसपैठ कर आए बांग्लादेशी नागरिकों से अपने अधिकारों की चिंता सताने लगी। जिसकी वजह से लगभग 6 वर्षों तक लंबा असम आंदोलन चला। 1985 में तत्कालीन केंद्र सरकार, असम सरकार, अखिल असम छात्र संस्था (आसू) और ऑल असम गण संग्राम परिषद (एएजीएसपी) के बीच असम समझौता हुआ। उसमें यह उल्लेख था कि 24 मार्च, 1971 की मध्य रात्रि के बाद बांग्लादेश से अवैध तरीके से घुसपैठ कर आए नागरिकों को बाहर निकाला जाएगा। साथ ही संसाधनों और राजनीति पर स्थानीय लोगों का एकाधिकार होगा। भावनात्मक मुद्दे को लेकर असम आंदोलन से उत्पन्न हुई असम गण परिषद (अगप) सत्ता में आ गई। राज्य की दो बार सत्ता की बागडोर संभालने के बावजूद अगप असम समझौते को लागू कराने में नाकाम रही। उधर, केंद्र की सरकारों ने भी असम समझौते को लागू करने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अवैध घुसपैठ का मुद्दा हर बार हावी रहा। इस मुद्दे पर सरकारें बनती और बिगड़ती रहीं। इस बीच राज्य में भाजपा का प्रभाव बढ़ने लगा। भाजपा ने अवैध घुसपैठ और शरणार्थी को अलग नजर से देखने की बात कही। इसका असर राज्य के बराक घाटी में राजनीतिक रूप से दिखा। कांग्रेस भी चुनावों में घुसपैठ और शरणार्थी की बातों को अलग करके उठाने लगी। नतीजतन, बराक घाटी की अधिकांश सीटों पर कांग्रेस को जीत नसीब हुई। वर्तमान समय में भाजपा की केंद्र सरकार ने अपने उन्हीं चुनावी वादों को पूरा करने के लिए नागरिकता संशोधन कानून को संसद के जरिये पारित करा दिया। इस कानून का विरोध मुख्य रूप से गैर राजनीतिक संगठन आसू, नेसो, अजायुछाप, कृषक मुक्ति संग्राम समिति (केएमएसएस) के अलावा राजनीतिक पार्टियों में कांग्रेस, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) व वामपंथी पार्टियां कर रही हैं। सही अर्थों में विरोध के स्वर की मुख्य वजह भाषाई दबाव है। लेकिन, इससे भी बड़ा मुद्दा इसके जरिये घुसपैठ कर असम में रहने वाले बांग्लादेशी मुसलमानों को नागरिकता नहीं मिलना है। कांग्रेस, एआईयूडीएफ और वामपंथी पार्टियां सिर्फ इसी वजह से विरोध कर रही हैं कि घुसपैठिए मुसलमानों को भारतीय नागरिकता नहीं मिल पाएगी। यही उनका कोर वोट बैंक हैं। अन्यथा उनके विरोध का कोई कारण नहीं है। विरोध करने वाले अन्य संगठनों में भी अधिकांश ऐसे हैं जो वे भी कमोबेश मुसलमान वाले प्रावधान को लेकर ही दुविधा में हैं। विरोध के स्वर जिन इलाकों में मुखर हो रहे हैं, उनमें कुछ को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर मुस्लिम बहुल इलाके हैं।

इसकी एक वजह हाल ही में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) की अद्यतन अंतिम सूची के प्रकाशन को देखने से नजर आती है। एनआरसी में नाम दर्ज कराने के लिए कुल तीन करोड़ 29 लाख से अधिक लोगों ने आवेदन किया था। इसमें से 19 लाख से कुछ अधिक लोगों का नाम एनआरसी में शामिल नहीं हुआ है। आंकड़ों के अनुसार 19 लाख लोगों में से एक तिहाई से अधिक संख्या मुसलमानों की है। एक तिहाई से कम बांग्लादेशी हिंदुओं की है। शेष देश के अन्य हिस्सों से आए नागरिकों की है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि इस कानून से हिन्दू बांग्लादेशियों को संभवतः नागरिकता मिल जाएगी। जबकि, अवैध घुसपैठियों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए विदेशी न्यायाधिकरणों का चक्कर लगाना पड़ेगा। नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि सरकार असम को भी इस कानून से बाहर करे। अगर किसी भी नागरिक को नागरिकता देनी है, तो उसे देश के अन्य हिस्सों में ले जाकर बसाए। असम में संसाधनों की कमी के कारण और अधिक इंसानों का बोझ उठाने की क्षमता नहीं है। राज्य में पहले से ही बेरोजगारी व अन्य तरह की समस्याएं विद्यमान है।  उल्लेखनीय है कि असम के ब्रह्मपुत्र घाटी में इस कानून का जोरदार विरोध हो रहा है। उधर, बराक घाटी में इसका पुरजोर समर्थन हो रहा है। कारण बराक घाटी में बांग्लाभाषियों की संख्या अधिक है। बराक घाटी के गैर राजनीतिक संगठन हों या कांग्रेस, वामपंथी व सत्ताधारी पार्टी, सभी एक स्वर से इसका समर्थन करते हैं। नागरिकता संशोधन कानून के बनने के बाद राज्य में आंदोलन लगातार हो रहा है। इसका राज्य की आर्थिक-सामाजिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। इससे सबसे बड़ा नुकसान शिक्षा का होगा। असम आंदोलन के दौर में भी एक पीढ़ी की शिक्षा पूरी तरह से बर्बाद हो गई थी। इस समस्या का जल्द समाधान नहीं हुआ तो राज्य के युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।

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