मुद्दों पर लड़े चुनाव

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लोकसभा चुनाव का रंग गहरा रहा है। विभिन्न पार्टियों ने अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं और धीरे-धीरे प्रचार अभियान जोर पकड़ने लगा है। सभी उम्मीदवारों को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से किए गए मतदाता सर्वेक्षण के नतीजों पर एक नजर जरूर डाल लेनी चाहिए। एडीआर ने अपने सर्वे की रिपोर्ट पिछले ही दिनों जारी की है। इसका महत्व इस बात से कम नहीं हो जाता कि यह सर्वेक्षण पुलवामा हमले और एयर स्ट्राइक के पहले किया गया था। संभव है कुछ वोटरों की सोच इन घटनाओं से भी प्रभावित हुई हो और उनकी राय बदल गई हो, लेकिन मोटे तौर पर इससे यह अनुमान मिलता है कि हमारे देश के लोग अपने जन प्रतिनिधियों से क्या अपेक्षाएं रखते हैं। सर्वे में मतदाताओं के लिए 31 बिंदुओं को सूचीबद्ध किया गया था, जिसमें पीने का पानी, बिजली, सड़क, भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सर्वाजनिक परिवहन जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसमें में मतदाताओं को अपनी पांच प्रमुख प्राथमिकताओं पर राय देनी थी। इसके साथ-साथ इन कसौटियों पर वर्तमान सरकार के प्रदर्शन को भी परखना था।

दरअसल, इस सर्वे का मकसद शासन के विशिष्ट मुद्दों पर मतदाताओं की प्राथमिकता, उन मुद्दों पर मतदाताओं की सरकार के प्रदर्शन पर रेटिंग और मतदाताओं को प्रभावित करने वाले तत्वों का पता लगाना था। सर्वेक्षण से उभर कर आया कि पूरे भारत में नौकरी के बेहतर अवसर, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और पेयजल मतदाताओं की शीर्ष प्राथमिकताएं हैं। नौकरी के बेहतर अवसर 46.80 प्रतिशत, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं 34.60 प्रतिशत और पेयजल 30.50 प्रतिशत मतदाताओं की शीर्ष तीन प्राथमिकताएं हैं। इसके बाद चौथे और पांचवें स्थान पर क्रमश: बेहतर सड़कें 28.34 प्रतिशत और बेहतर सार्वजनिक परिवहन 27.35 प्रतिशत लोगों की प्राथमिकता है। मतदाताओं की प्राथमिकता वाले सभी 10 क्षेत्रों में सरकार की रेटिंग औसत से नीचे है। गौरतलब है कि बेहतर रोजगार के अवसर को 2017 में 30 प्रतिशत लोगों ने अपनी प्राथमिकता बताया था, लेकिन 2018 में 47 प्रतिशत लोगों ने इसे प्राथमिकता बताया। इसी दौरान इस मुद्दे पर सरकार का प्रदर्शन पांच के पैमाने पर 3.17 से गिरकर 2.15 हो गया। यह इस बात का संकेत है कि रोजगार की समस्या बढ़ी है और यह इस बार एक अहम मुद्दा बनेगी।

जो भी दल नौकरियों के मामले में युवाओं को ठीक से आश्वस्त कर पाएगा, उसे बेरोजगारों के वोट ज्यादा संख्या में मिल सकते हैं। दरअसल राष्ट्रीय पार्टियां व्यापक सवाल उठाती हैं, लेकिन रोजमर्रा से जुड़े छोटे-मोटे मुद्दों पर वे ज्यादा फोकस नहीं करतीं। बेहतर होगा कि क्षेत्रीय दल इन मुद्दों को बिल्कुल स्थानीय संदर्भ में उठाएं। अगर वे इस तरह के मुद्दों को बार-बार उठाएंगे तो नैशनल पार्टियों पर भी इसका दबाव बनेगा। बहरहाल सर्वे का एक संकेत यह भी है कि देश के मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा जाति-धर्म और दूसरे भावनात्मक मुद्दों से बाहर आ रहा है। समय रहते इस बात को सभी पार्टियां समझ लें तो बेहतर होगा।

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