संवैधानिक पदों के अपमान का चलन

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश में संवैधानिक पदों में दो पदों की प्रणालियां हैं, जिनमें एक राष्ट्रपति और दूसरा प्रधानमंत्री का है। जैसे प्रधानमंत्री की प्रणाली में विभिन्न राज्यों के लिए मुख्यमंत्री होते है ठीक वैसे ही राष्ट्रपति की प्रणाली में विभिन्न राज्यों में प्रतिनिधित्व करने के लिए राज्यपालों की नियुक्ति की जाती है। हालांकि इन दोनों प्रणालियों में भी उच्च संवैधानिक पद के रूप राष्ट्रपति के पद को सर्वोच्च माना जाता है। उसी प्रकार देखें तो प्रत्येक राज्य में मुख्यमंत्री की तुलना में राज्यपाल का पद भी बड़ा होता है। क्योंकि राज्य में सरकार के गठन से लेकर उसके भंग करने, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने आदि संबंधी फैसलों का अधिकार राज्यपाल के पास होता है। जनता द्वारा किसी पार्टी विशेष के पक्ष में मतदान किए जाने के बाद ही राज्यपाल उस पार्टी को राज्य में सरकार बनाने का प्रस्ताव देती है, जिसके बाद ही वे राज्य में सरकार का गठन कर पाते हैं। भारत के संविधान के इस नियम के आधार पर देखा जाए तो किसी भी राज्य में राज्यपाल का पद मुख्यमंत्री के पद से ऊंचा होता है। हालांकि दुर्भाग्य की बात ये है कि भारत में आज कल संवैधानिक पदों के अपमान का सिलसिला चलाया जा रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण, बीते दिनों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा राज्यपाल के साथ किया गया अपमान जनक व्यवहार है। कुछ विधेयकों को राज्यपाल का अनुमोदन नहीं मिलने और इस वजह से विधानसभा का शीतकालीन अधिवेशन दो दिनों के लिए स्थगित होने के विवाद के बीच बीते गुरुवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा के सामने जो कुछ हुआ, देश के संसदीय इतिहास में उसकी शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले। राज्यपाल जगदीप धनखड़ को पहले से सूचना के बावजूद विधानसभा परिसर में घुसने से रोक दिया गया। वहां, उनके स्वागत के लिए न तो विधानसभा अध्यक्ष विमान बनर्जी मौजूद थे और न ही दूसरा कोई अधिकारी। बाद में राज्यपाल सामान्य गेट से पैदल ही भीतर घुसे। विधानसभा में पुस्तकालय का दौरा करने के बाद बाहर निकले राज्यपाल ने इस घटना को संविधान और लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक करार दिया। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राजभवन और राज्य सचिवालय के बीच लगातार बढ़ती कड़वाहट लोकतंत्र की भावना के ख़िलाफ़ है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, "इस खींचतान औऱ टकराव से राज्य में संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है।" दुख की बात तो यह है कि आज राज्यपाल के अपमान की इस घटना की चर्चा न तो संसद में हुई और न ही राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री ने इस पर कुछ कहा। नेशनल मीडिया ने भी इस खबर को दबा दिया और इस पर किसी प्रकार की कवरेज तक नहीं की गई। आखिर क्या कारण था कि इस घटना को दबा दिया गया। सवाल बस इतना है कि जब संवैधानिक पदों पर पदासीन दो व्यक्ति एक दूसरे की पद की मान - मर्यादा का ख्याल न रखें तो इन पदों का उद्देश्य ही क्या है। आखिर ये देश कहां जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार संवैधानिक पदों के अपमान का सिलसिला देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के द्वारा ही शुरू किया गया है। उन्होंने हमेशा देश के पूर्व प्रधान मंत्रियों को नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी कह कर संबोधन किया और अपमान जनक तरीके से जनता के सामने उछाला, जिसके बाद से यह सिलसिला अब तक जारी है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री पदों की इज्जत न करना अपने आप में एक शर्मनाक कार्य है जिसे आज कई नेताओं द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि राजनीतिज्ञ कहते हैं, जो राजनेता संवैधानिक पदों के अपमान करने के कार्य में लिप्त है, वे इसके दुष्परिणाम के लिए भी तैयार रहें।

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