पाकिस्तान, बांग्लादेश के शरणार्थियों को नागरिकता देने संबंधी विधेयक को संसद की मंजूरी

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नई दिल्ली, (परिवर्तन)। पाकिस्तान, अफगानिस्तान व बांग्लादेश से अल्पसंख्यक शरणार्थियों (हिंदू, सिख, पारसी, ईसाई, बौद्ध व जैन) को भारत की नागरिकता दिए जाने संबंधी नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 को संसद की मंजूरी मिल गई। राज्यसभा ने इस विधेयक को 105 के मुकाबले 125 मतों से पारित कर दिया। लोकसभा ने सोमवार को इस विधेयक को पारित कर दिया था।

इसके साथ ही 31 दिसम्बर 2014 से पहले इन तीन पड़ोसी देशों से आए अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता दिए जाने का रास्ता साफ हो गया। इससे पहले इन लोगों को भारत में निवास करने की कानूनी अनुमति मिली थी। 1947 में देश के विभाजन के बाद समय-समय पर भारत आए शरणार्थियों को 70 साल के नारकीय जीवन से मुक्ति मिलने जा रही तथा उनका निर्वासन नागरिकता में तब्दील हो सकेगा। इसके पहले सदन ने विधेयक को प्रवर समिति भेजे जाने संबंधी विपक्ष के प्रस्ताव को 99 के मुकाबले 124 मतों से नामंजूर कर दिया। विभिन्न सदस्यों द्वारा पेश संशोधनों को भी सदन ने ध्वनिमत व मत विभाजन के जरिये नामंजूर कर दिया। राज्यसभा में भाजपा का बहुमत नहीं है लेकिन दल जनता दल यूनाइटेड (जद-यू), ऑल इंडिया अन्नाद्रमुक मुनेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक),  बीजू जनता दल (बीजद) समेत कुछ अन्य दलों के बलबूते विधेयक पारित हो गया। शिवसेना ने विधेयक का विरोध करते हुए सदन से वॉकआउट किया। हालांकि, लोकसभा में शिवसेना ने इस विधेयक के पक्ष में मतदान किया था। राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 पर चर्चा के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष के आरोपों और आशंकाओं को दूर करते हुए बिंदुवार जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अगर मजहब के आधार भारत का बंटवारा न हुआ होता तो यह विधेयक लाने की नौबत न आती। 1950 के दशक में नेहरू-लियाकत समझौते के तहत दोनों पक्षों ने स्वीकृति दी कि अल्पसंख्यक समाज के लोगों को बहुसंख्यकों की तरह समानता दी जाएगी। अगर पाकिस्तान ने अल्पसंख्यकों के हितों का ध्यान रखा होता तो आज यह विधेयक नही आता। पाकिस्तान ने वादा नहीं निभाया और वहां के अल्पसंख्यकों को चुनाव लड़ने से भी रोका गया। उनकी संख्या लगातार कम होती रही। भारत ने वादे को निभाया और और यहां राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, चीफ जस्टिस जैसे कई उच्च पदों पर अल्पसंख्यक रहे। यहां अल्पसंख्यकों का संरक्षण हुआ। कांग्रेस सहित विपक्ष के सदस्यों ने विधेयक को संविधान विरोधी और नैतिक रुप से अनुचित बताते हुए कहा कि नया कानून कानूनी परीक्षण में नही टिकेगा। कांग्रेस के पी. चिंदबरम और कपिल सिब्बल ने कहा कि मोदी सरकार इस विधेयक के बहाने ‘हिंदूराज’ स्थापित करने की ओर आगे बढ़ रही है। शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस मुसलमानों में भ्रम फैलाने का काम कर रही है। वह उनमें डर का माहौल पैदा कर रही है।  किसी को भी इस विधेयक से डरने की जरूरत नहीं है। इस विधेयक का उद्देश्य तीन देशों के सभी अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने की प्रक्रिया को सरल और तीव्र बनाना है। अल्पसंख्यकों में हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई व पारसी शामिल हैं। मुस्लिम इन देशों में अल्पसंख्यक नहीं हैं, इसलिए उन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि विपक्ष को केवल इस बात की चिंता है कि इसमें मुस्लिम को क्यों शामिल नहीं किया गया है? कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ मुसलमानों को शामिल किया जाना है।गृहमंत्री ने कहा कि कांग्रेस अलग-अलग समय पर राजनीति के अनुरूप विभिन्न राय प्रकट करती रही है। राजस्थान में कांग्रेस सरकार में पाकिस्तान से आए 13 हजार हिन्दू और सिखों को नागरिकता दी। कांग्रेस पार्टी ने पाकिस्तान से आए ‘गैर-मुस्लिमों’ नागरिकता देने का समर्थन किया था। शाह ने कहा कि महात्मा गांधी ने स्वयं पाकिस्तान से आए हिन्दू और सिखों को नागरिकता देने और नौकरियां दिए जाने के पक्ष में वक्तव्य दिया था। चुनावी लाभ के इरादे से विधेयक लाए जाने के विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए शाह ने कहा कि चुनाव साढ़े चार साल बाद है। मोदी सरकार चुनावी लाभ के लिए नहीं अपितु लंबे समय से चली आ रही समस्याओं के समाधान के लिए यह कदम उठा रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने नेता (नरेन्द्र मोदी) और उनकी लोकप्रियता के बूते चुनाव लड़ती व जीतती है। शाह ने कहा कि वह पहली बार नागरिकता के अंदर संशोधन लेकर नहीं आए हैं, यह कई बार हुआ है। इसका कारण यह था कि किसी परिस्थिति विशेष से प्रभावित होने वाले किसी समूह को समय-समय पर भारत की नागरिकता दी जाती रही है। जब युगांडा, श्रीलंका व बांग्लादेश के लोगों को अलग-अलग समय पर नागरिकता दी गई, अन्य समूहों को नागरिकता देने का मुद्दा सामने नहीं था। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार जो विधेयक लेकर आई है, उसमें निर्भीक होकर शरणार्थी कहेंगे कि हाँ वे शरणार्थी हैं, उन्हें नागरिकता दीजिए और सरकार नागरिकता देगी। जिन्होंने जख्म दिए वो ही आज पूछते हैं कि ये जख्म क्यों लगे। जब इंदिरा गांधी ने 1971 में बांग्लादेश के शरणार्थियों को स्वीकारा, तब श्रीलंका के शरणार्थियों को क्यों नहीं स्वीकारा । उन्होंने कहा कि समस्याओं को उचित समय पर ही सुलझाया जाता है। इसे राजनीतिक रंग नहीं देना चाहिए। अनुच्छेद 14 में जो समानता का अधिकार है वो ऐसे कानून बनाने से नहीं रोकता जो उचित वर्गीकरण के आधार पर है। यहां उचित वर्गीकरण आज है। हम एक धर्म को ही नहीं ले रहे हैं, हम तीनों देशों के सभी अल्पसंख्यकों को ले रहे हैं और उन्हें ले रहे हैं जो धर्म के आधार पर प्रताड़ित है। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी अजीब प्रकार की पार्टी है। सत्ता में होती है तो अलग-अलग भूमिका में अलग-अलग सिद्धांत होते हैं। शाह ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भी पहले इसी सदन में कहा था कि वहां के अल्पसंख्यकों को बांग्लादेश जैसे देशों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। अगर उनको हालात मजबूर करते हैं तो हमारा नैतिक दायित्व है कि उन अभागे लोगों को नागरिकता दी जाए। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल के आरोपों का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि कपिल सिब्बल कह रहे थे कि मुसलमान हमसे डरते हैं, हम तो नहीं कहते कि डरना चाहिए। डर होना ही नहीं चाहिए। उन्होने कहा कि देश के गृह मंत्री पर सबका भरोसा होना चाहिए। ये बिल भारत में रहने वाले किसी भी मुसलमान भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं है।

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