दिल्ली अग्निकांड : दुर्घटना नहीं, लापरवाही और भ्रष्टाचार है कारण

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। दिल्ली के अनाज मंडी अग्निकांड में करीब 43 लोगों की दम घुटने से मौत हो गई। देर रात हुए इस अग्निकांड का एक ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस ऑडियो में आग की लपटों के बीच घिरे एक युवक ने अपने दोस्त से बात करते हुए कहा कि वो अब मरने वाला है। जरा सोचिए कितना भयावह होगा वह पल जब आपको सामने मौत दिख रही है और आपके पास करने को कुछ नहीं है। संकट की घड़ी में अपने दोस्त को कॉल करने वाले युवक है मुशर्रफ। आग और धुएं के बीच उसे बचने की जब कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उसने अपने एक दोस्त को अग्निकांड के बारे में बताया। करीब साढ़े तीन मिनट के इस कॉल में मुशर्रफ ने अपने दोस्त से कहा, 'मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं है। मैं आग और धुएं के बीच घिर गया हूं। मेरे दोस्त, मेरे परिवार और बच्चों को ध्यान रखना। अभी इस घटना के बारे में किसी को नहीं बताना।' इसके बाद मुशर्रफ की आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। वायरल ऑडियो में कॉल रिसीव होते ही मुशर्रफ ने मोनू से कहा, 'मोनू भैया आज मैं खत्म होने वाला हूं। बिल्डिंग में आग लग गई है। आ जइयो करोलबाग। टाइम कम है और भागने का कोई रास्ता नहीं है। खत्म हुआ भैया मैं तो...घर का ध्यान रखना। अब तो सांस भी नहीं ली जा रही।' मुशर्रफ बीते करीब दो वर्षें से वहां एक कारखाने में काम करता था। अपने परिवार के लिए रोज़ी रोटी कमाने के लिए वह दिल्ली आया था।

यूं तो दिल्ली के अनाज मंडी अग्निकांड को एक दुर्घटना बताया जा रहा है, लेकिन इसे एक सामान्य दुर्घटना का नाम दिया जाना, इसमें मारे जाने वाले 43 लोगों का अपमान होगा। क्योंकि जब आप साफ आंखों से इस अग्निकांड की गहराई को देखेंगे तो आपको पता चलेगा ये दुर्घटना नहीं बल्कि लापरवाही और भ्रष्टाचार का कारण है, जिसमें आज 43 निर्दोष लोगों ने झुलस कर और दम घोट कर अपनी जान गवां दी। आज इस भयावह अग्निकांड के लिए किस किस को दोष दिया जाए, क्योंकि अगर नाम लेने बैठे तो अखबार के पन्ने कम पड़ जाएंगे। सच ही तो है, देश में मासूम लोगों के जान की कोई कीमत ही तो नहीं है, इसीलिए इनके मरने पर किसी को अफसोस नहीं होता। भ्रष्ट-तंत्र की वजह से ही इन लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी। इसके लिए जिम्मेदार कौन है, केंद्र सरकार या राज्य सरकार, प्रशासन या नगरपालिका, फैक्ट्री के मालिक या ये लोग खुद ? सवाल बड़े और कठिन जरूर है लेकिन जवाब एकदम आसान है। सेफ्टी स्टैंडर्ड को फॉलो नहीं करने की वजह से भारत को बहुत बड़ा नुकसान हर बार झेलना पड़ता है, लेकिन लोग नींद से तब भी नहीं जागते हैं। कुल मिलाकर लोगों में गुस्सा होता है, सरकार और अथॉरिटी के प्रति नाराजगी होती है, लोगों के मारे जाने का गम होती है। लेकिन इसके बावजूद परिस्थितियां बदलेंगी इसकी संभावना कम होती है। 

खुशियां बांटते बांटते चली गई जिंदगी

कहते हैं मौत की आवाज़ नहीं होती है। एक सन्नाटा होता है और किसी व्यक्ति के मरते ही ये सन्नाटा उस घर से होकर, गली और सड़क पर दूर-दूर तक पसर जाता है। दूर से आते किसी भी व्यक्ति को वहां मौजूद चेहरे देखकर ही किसी की मौत होने का अंदाजा हो जाता है। लेकिन रविवार की सुबह जब रानी झांसी रोड पर स्थित अनाज मंडी की तंग गलियों में मौजूद एक कारखाने में आग लगी, तो वहां से ये सन्नाटा गायब था। इस आग में कम से कम 43 लोगों की मौत हो गई। किसी आम दिन की तरह सड़क पर ट्रैफिक अनवरत चल रहा था। वहां मौजूद और वहां से गुज़रने वाले किसी व्यक्ति को ये अंदाज़ा ही नहीं था कि मरने वाले कौन थे, क्या करते थे और कहां के रहने वाले थे। क्योंकि इस हादसे में उन युवाओं की मौत हुई है जो अपने घरों से हज़ारों किलोमीटर दूर रोज़ी-रोटी कमाने के लिए दिल्ली की इन तंग गलियों में अपना जीवन गुज़ार रहे थे। ये लड़के उस कारखाने में काम कर रहे थे जहां एक दिन पहले तक बच्चों के खिलौने और स्कूल के बैग बनाए जाते थे। इस हादसे के मुख्य दो कारण हैं। पहली वजह सुबह के वक्त अचानक बिजली का शॉर्ट सर्किट का होना है। उसके बाद उसकी चिंगारी नीचे रखे कैमिकल (सुलेसन) के बॉक्स पर जा गिरी। इसके चलते चिंगारी अचानक काफी तेजी से फैल गई और देखते ही देखते आग ने भयान रूप धारण कर लिया। कहा जा रहा है कि सुलेसन में आग पकड़ते ही उससे खतरनाक धुएं निकलने लगे। ऐसे में दम घुटने से कई लोगों की मौत तुरंत मौत हो गई। हादसे वाली रात को फुरकान ने एक ट्रक में समान को पैक करवाया था। ट्रक पर समान की पैकिंग होने के बाद फुरकान सोने के लिए चला गया और फैक्ट्री के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया। जिससे आग लगने के बाद कोई मजदूर बाहर नहीं निकल सका। जानकारी के मुताबिक, इस बिल्डिंग में करीब 12 फैक्ट्रियां हैं, जिसमें खिलौने बनाने, कैप बनाने और महिलाओं के पर्स बनाने सहित कई प्रकार के काम होते थे। हर फ्लोर पर 6 कमरे बने हुए हैं। इस बिल्डिंग के मालिक के मुताबिक करीब 100 से ज्यादा कारीगर/ मजदूर एक साथ यहां काम करते थे।

कौन सी एजेंसी हैं जिम्मेदार

घटना में मारे गए लोग मजदूर हैं, जो कारखाने में रविवार सुबह आग के दौरान सो रहे थे। इस बड़ी घटना के बाद सवाल उठने लगे हैं कि रिहायशी इलाके में इतनी बड़ी फैक्ट्री कैसे चल रही थी। अगर फैक्ट्री को एनओसी नहीं मिली तो बिना परमिशन के कैसे चल रही थी। इसी के साथ यह भी सवाल उठने लगे हैं कि दिल्ली में ऐसी कौन सी जगह हैं, जहां अवैध फैक्ट्रियां चल रही हैं और इस गड़बड़ी के पीछे कौन सी एजेंसी जिम्मेदार हैं। बात दें, दिल्ली में कहां कौन सी जगह पर किस तरीके की फैक्ट्री या कारोबार चल रहे हैं, उसकी ज़िम्मेदारी सीधे-सीधे एमसीडी की होती है। दिल्ली नगर निगम न सिर्फ कहीं पर फैक्ट्री या कमर्शियल काम के लिए लाइसेंस और मंजूरी देती है, बल्कि अगर कहीं अवैध तरीके से कोई कामकाज चल रहा है तो उसको सील करने की ज़िम्मेदारी भी उसी की होती है। ठीक इसी प्रकार देश के अन्य प्रदेशों एवं शहरों में ऐसे कमर्शियल जगहों में पर्याप्त सुरक्षा मानकों का ध्यान रखा जा रहा है या नहीं इसकी निगरानी करना नगर पालिका की ज़िम्मेदारी होती है। हालांकि कुछ जान कार बताते हैं कि देश में अवैध मकानों या बिल्डिंगों में चलाए जाने वाले कारोबार या व्यवसाय की लिस्ट बनाकर संबंधित विभाग के अधिकारी वहां जाते तो हैं लेकिन कार्रवाई करने के बदले वहां से अपनी जे-वें भर कर लौट आते हैं। 

दमकल विभाग का रोल संदेहास्पद ?

देश के किसी भी प्रदेश के दमकल विभाग यानी कि फायर सर्विस की जिम्मेदारी सभी ऐसी जगह पर जहां पर इस तरीके के निर्माण हैं या कामकाज चल रहे हैं, उन्हें नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) देने की जिम्मेदारी होती है। समय-समय पर फायर डिपार्टमेंट को ऐसे इलाकों पर नजर भी रखनी होती है, जहां अवैध फैक्ट्रियां, कारोबार और व्यवसायिक संस्थान चलाए जा रहे हैं और जो आग की संभावनाओं को बढ़ावा दे रही हैं, उनके खिलाफ डिपार्टमेंट एक्शन भी ले सकता है। आमतौर पर यह विभाग राज्य सरकार के गृह विभाग के अंदर काम करता है। 

क्यों सोती रही पुलिस?

दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी किसी भी किस्म के अवैध उद्योग धंधे या कारखानों पर नजर रखना भी है। ऐसे में कई बार वहां के स्थानीय लोग पुलिस से इस बारे में शिकायत करते हैं जिसे अलग-अलग एजेंसियों को संज्ञान में लाना पुलिस विभाग की जिम्मेदारी है। लिहाजा पुलिस रिपोर्ट दर्ज कर कारखाने के मालिक के खिलाफ तुरंत कार्रवाई शुरू कर सकती है।

हादसे के वक्त कहां था स्थानीय प्रशासन

इसके अलावा फैक्ट्री के इलाके में लोकल एडमिनिस्ट्रेशन होता है। वह अपने अपने इलाकों में अवैध तरीके से चल रहे कामकाज पर नजर रखते हैं। दिल्ली में डिस्ट्रिक एडमिनिस्ट्रेशन, राजस्व विभाग दिल्ली सरकार के तहत काम करता है और इसी विभाग के अंदर डिजास्टर मैनेजमेंट भी आता है। किसी भी जिले का डिजास्टर मैनेजमेंट उस जिले के डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट के अंतर्गत काम करता है और वह ऐसी किसी भी जगह पर नजर रखता है जो हादसे को बढ़ावा दे सकती है। यानी इस मामले में एमसीडी, दिल्ली फायर सर्विस, दिल्ली सरकार के गृह विभाग के तहत आने वाला दिल्ली फायर डिपार्टमेंट, दिल्ली पुलिस और यहां तक कि दिल्ली सरकार के ही अंतर्गत आने वाला डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन भी जिम्मेदार है।

फैक्‍ट्री में बाहर से क्यों लगा था ताला

वहां काम करने वाले 'मजदूर' थे या 'कैदी'? यह सवाल रह रह कर ज़हन में आ रहा है। अनाज मंडी की जिस फैक्ट्री की बात हो रही है उसमें जब आग लगी उस वक्त बाहर से ताला लगा हुआ था। एक ओर आग पूरी बिल्डिंग को अपनी चपेट में लिए जा रही थी, दूसरी ओर अंदर से सिर्फ बचाओ-बचाओ चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं। कोई करता भी क्या, जब बाहर से ही ताला लगा तो अंदर घुट-घुट कर मरने के अलावा और क्या रास्ता बचता है। सवाल ये है कि आखिर बाहर से ताला किसने और क्यों लगाया? अगर ये ताला मालिक ने लगाया था तो उसे किस बात का डर था? क्या मजदूर उसका सामान चुराकर भाग जाते? या वो मजदूरों को कैदियों की तरह रखता था, जैसा कि पुराने वक्त में तानाशाह राजा-महाराजा किया करते थे। हादसे वाली रात को फैक्ट्री में फुरकान नाम के मैनेजर ने फैक्ट्री के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया। इस कारण कई मजदूर आग लगने के बाद बाहर नहीं निकल सके। फुकरान के ताला लगाकर जाने के कुछ ही समय बाद फैक्ट्री में आग लग गई और यह आग इमारत में फंसे मजदूरों के लिए कब्रगाह साबित हुई। दिल्ली पुलिस की टीम ने हादसे के बाद कार्रवाई करते हुए एक एफआईआर दर्ज कर रविवार शाम को ही रेहान नाम के शख्स को गिरफ्तार कर लिया। इसे बिल्डिंग का मालिक बताया जा रहा है। लेकिन मामले की पड़ताल के बाद यह जानकारी मिली कि रेहान के साथ-साथ कई लोग के पास उस बिल्डिंग का मालिकाना हक था। इस बिल्डिंग के मालिक - रेहान, सोहेल, तारिक, आसिफ और इमरान हैं। सोहेल नाम के शख़्स के बारे में पुलिस तफ़्तीश कर रही है, क्योंकि आग सेकेंड फ्लोर पर लगी थी। इस फ्लोर का मालिकाना हक मुरादाबाद के इकराम और सोहेल के नाम पर है। इसके साथ ही जिस केमिकल वाले डब्बे में आग लगी थी वह सामान इकराम नाम के एक कारोबारी का है। इसलिए पुलिस की टीम अब सोहेल को भी ढूंढ़ रही है। इस बिल्डिंग में करीब 12 फैक्ट्री थी। इनमें खिलौने बनाने, कैप बनाने से लेकर महिलाओं का पर्स बनाने सहित कई काम होते थे। हर फ्लोर पर 6 कमरे बने हुए हैं। 

अगर दोषी पकड़े भी गए तो क्या बदलेगा?

जांच का आदेश तो हो गया, लेकिन दोषी पकड़े भी गए तो क्या बदलेगा? - दिल्ली सरकार ने आग की घटना में जांच के आदेश देते हुए सात दिन के भीतर रिपोर्ट मांगी है। चलिए मान लेते हैं कि 7 दिन में दोषी पकड़ जाएगा, फिर क्या? सजा होगी? चलिए सजा भी हो गई, उसके बाद क्या? कुछ महीनों या सालों बाद फिर से ऐसी ही आग लगेगी। दिल्ली में आग कोई नई बात नहीं है। हर बार लगभग एक जैसी ही लापरवाही सामने आती है। सरकारी अधिकारी अपना काम ढंग से नहीं करते और नियमों को ताक पर रखकर चल रही फैक्ट्रियों, इमारतों, होटलों, रेस्टोरेंट, सिनेमाघर आदि को मंजूरी दे देते हैं। नतीजा होता है बहुत से लोगों का जिंदा जल जाना। इतने सालों में ये व्यवस्था दुरुस्त नहीं की जा सकी है। तो एक बार फिर वही सवाल, अगर दोषी पकड़े भी गए तो क्या बदलेगा?

इसके बाद उठे कई बड़े सवाल

आखिर इस आग की जिम्मेदारी किसकी - भाजपा की ओर से केजरीवाल सरकार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह उनके एक मंत्री का क्षेत्र है। दिल्ली सरकार को ही ध्यान देना चाहिए था कि नियमों को ताक पर रखकर फैक्ट्री चल रही थी। वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता राघव चड्ढा का कहना है कि इसके लिए भाजपा के कब्जे वाली एमसीडी को जिम्मेदार माना जाना चाहिए, जिसने फैक्ट्री का लाइसेंस दिया है। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं, तो फिर जिम्मेदार कौन? हर चैनल पर खबरें चल रही हैं कि फैक्ट्री अवैध थी, फैक्ट्री अवैध थी। लेकिन सवाल उठता है कि इस अवैध फैक्ट्री को चलाने की परमिशन मिली कहां से। मिनिस्ट्री की गाइड लाइंस कहती हैं कि कैसी भी मैनुफैक्चरिंग यूनिट चाहे छोटी हो या बड़ी, रिहायशी इलाके में नहीं लग सकती है। लेकिन इसमें तो 60 से ज्यादा मजदूर काम करते थे। इसकी इजाज़त कहां से मिली? क्या पुलिस को इस बात की जानकारी नहीं थी कि यहां फैक्ट्री चलती है। और इतनी बड़ी संख्या में मजदूर काम करते हैं। दिल्ली पुलिस ने अब जाकर फैक्ट्री मालिक को हिरासत में लिया, लेकिन पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई। क्या दिल्ली पुलिस भी इस मामले में ज़िम्मेदार नहीं है? किसी भी फैक्ट्री को चलाने के लिए कई तरह के लाइसेंस लेने पड़ते हैं, मसलन नगर निगम की एनओसी, राज्य के पर्यावरण मंत्रालय का सर्टिफिकेट, अग्निशमन विभाग का नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट। इन सबके बावजूद सभी विभागों का सालाना विज़िट होता है। इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। क्योंकि पहले ही सूरत में फैक्ट्री के पास कोई लाइसेंस नहीं था, तो आगे की बात बेमानी हो जाती है। दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने कहा है कि मामले की मजिस्ट्रियल जांच होगी, उसके बाद वो कुछ कहेंगे। लेकिन मोटी तौर पर कहें तो इस हादसे के लिए वो तमाम अथॉरिटीज़ ज़िम्मेदार हैं, जिनके ज़िम्मे दिल्ली को चलाने की ज़िम्मेदारी है। चाहे वो नगर निगम हो, बिल्डिंग माफिया हो, दिल्ली पुलिस हो या फिर दिल्ली सरकार का पर्यावरण मंत्रालय हों। इस हादसे के बाद सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है।

गुजरात के बच्चों ने गवायीं थी जान

इसी वर्ष मई के महीने में सूरत के तक्षशिला कॉम्प्लेक्स में लगी आग की घटना में करीब 23 छात्रों की दर्दनाक मौत हो गई थी। पुलिस ने इस सिलसिले में कोचिंग सेंटर के संचालक, बिल्डर और भवन मालिक को गिरफ्तार किया था। उस वक्त घटना से हिली सरकार ने पूरे राज्य में वाणिज्यिक भवनों में चलने वाले कोचिंग सेंटरों को बंद करने का आदेश दिया था। साथ ही सरकार ने दो अग्निशमन अधिकारियों को भी निलंबित कर दिया था। उस समय अधिकारियों ने बताया था कि गुजरात के आठ नगर निगमों और अन्य नगरपालिकाओं ने वाणिज्यिक भवनों में चल रहे सभी कोचिंग सेंटरों में आग से सुरक्षा के सभी मानकों को पूरा करने के आदेश दिए गए हैं। इन मानकों के पूरा होने तक सभी कोचिंग सेंटरों के संचालन पर रोक रहेगी। इसके अलावा सरकार ने विभिन्न शहरों और कस्बों में स्थित कोचिंग सेंटरों, निजी अस्पतालों और अन्य इमारतों में अग्नि सुरक्षा मानकों की जांच शुरू कर दी है। ऐसे भवनों के लिस्ट निकाले जाने के कुछ महीनों बाद ही मामले को रफा-दफा कर दिया गया। सूत्र बताते हैं कि अधिकारियों ने भवन मालिकों से अपनी कमाई कर नियमों को सुली चढ़ा दी थी। नियम कहते हैं फायर ब्रिगेड की एनओसी के बिना अब इनका संचालन नहीं किया जा सकता, लेकिन देश की ऐसी लाखों इमारतें एवं कार्य स्थल हैं जिनमें अग्नि सुरक्षा की कोई सुविधा और उपकरण नहीं हैं। ऐसी घटनाओं में सीधे तौर पर बिजली बोर्ड : जो सरेआम खुले में बॉक्स लगाकर उनकी सुरक्षा के कोई उपाय और रखरखाव नहीं करता, फायर ब्रिगेड : जिसने जरूरी फायर सेफ्टी के बिना इन अवैध सेंटर्स को चलने दिया, और महानगरपालिका : जिसने ऐसी अवैध बिल्डिंगों को चलाने अनुमति दी, सभी जिम्मेदार हैं।

राजनीतिक पार्टियां कब सुधरेंगी

पहले बात विजय गोयल की। वह तो सीधे बोल पड़े कि अरविंद केजरीवाल सरकार को इस हादसे की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। तर्क दिया कि ये क्षेत्र दिल्ली सरकार के एक मंत्री का है। यानी राजनीतिक बयानबाजी कर दी, लेकिन अगले ही पल भोले बनते हुए बोल पड़े कि इस मामले पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने ये भी कहा है कि दिल्ली के घनी आबादी वाले इलाकों का निरीक्षण होना चाहिए, लेकिन दिल्ली सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है। उन्होंने तो ये भी कहा कि बहुत सारी इमारतें गिरने की कगार पर हैं, लेकिन दिल्ली सरकार उस ओर ध्यान नहीं दे रही है। मनोज तिवारी की बातें भी कुछ वैसी ही निकलीं। जब उनसे प्रतिक्रिया मांगी गई तो वह झट से बोल पड़े कि इस मामले की जांच के बाद जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, इसमें कोई जल्दबाजी नहीं करनी है। जब उन्हें बताया गया कि सरकार इस मामले में नगर निगम को जिम्मेदार ठहरा रही है तो तिवारी बोले कि पूरी रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा कौन जिम्मेदार है। मदद का ऐलान करते हुए उन्होंने कहा कि इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। हां, पूरी बात के दौरान एमसीडी पर उठने वाले सवालों को तुरंत घुमा दिया, क्योंकि एमसीडी पर भाजपा का कब्जा है। हरदीप पुरी ने भी इस आग पर अपनी बात कही। जब उनसे कहा गया कि दिल्ली में जगह-जगह लोगों के सिरों पर तारें लटकी हुई हैं तो वह बोले कि मैं भी दिल्ली में ही रहता हूं और सब देख रहा हूं। अब सवाल ये है कि अगर आप सब देख रहे हैं तो अब तक कुछ किया क्यों नहीं? सिर्फ इसलिए कि सरकार आपकी नहीं है? एमसीडी तो आपकी है, तो आपने क्या कर लिया? बात ही बात में वह राजनीति करने से बाज नहीं आए और बोल पड़े, भाजपा के लोग घटना की जानकारी मिलने के चंद घंटों में ही यहां पहुंच गए। कौन पहुंचे और नहीं ये, लेकिन इस मामले पर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। मतलब खुद ही राजनीतिक बयानबाजी कर दी और फिर खुद ही बोल पड़े कि राजनीति नहीं। उन्होंने भी मनोज तिवारी की बात दोहरा दी कि मामले की जांच होनी चाहिए और उसके बाद ही जिम्मेदारी तय की जा सकती है। बताया जा रहा है कि दिल्ली सरकार के कुछ मंत्रियों ने इसका ठीकरा एमसीडी पर फोड़ा है। हालांकि आपको बता दें कि एमसीडी पर भाजपा का कब्जा है। लेकिन सिर्फ इतना कह भर देना काफी नहीं। दिल्ली सरकार को ये सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे इलाकों की जांच नियमित रूप से हो। अगर नहीं होती है तो दिल्ली सरकार को एमसीडी के खिलाफ भी एक्शन लेना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। अगर होता तो एक के बाद एक दिल्ली में आग की घटनाएं ना होतीं। वहीं आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता राघव चड्ढा ने कहा है भाजपा इस मामले पर राजनीति कर रही है जो शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर सवाल उठाने ही हैं तो भी भाजपा के कब्जे वाली एमसीडी को जिम्मेदार माना जाना चाहिए, जिसने फैक्ट्री का लाइसेंस दिया है।

पार्टियों का झुलसना तय

जब 13 जून 1997 में दिल्ली के ग्रीन पार्क में स्थित उपहार सिनेमा में आग लगी थी, जो उसमें 59 लोगों की मौत हुई थी। वजह वही थी जो अनाज मंडी में सामने आ रही है। लोगों के बचने की जगह ही नहीं थी। लोग एक तरह से फंस गए। और इस बार तो लोग नींद में थे। हो सकता है कई तो नींद में ही दम घुटने के चलते मर गए होंगे। उपहार सिनेमा कांड में जांच के बाद दोषियों को सजा मिली थी, इस बार भी मिल जाएगी, लेकिन उन 43 लोगों का क्या, जिनकी जान चली गई। न तो दिल्ली सरकार ने लोगों की जान को प्राथमिकता दी है, ना ही भाजपा की एमसीडी को इस बात से कोई मतलब है कि कौन जी रहा है और कौन मर रहा है। दिल्ली में चुनाव होने वाले हैं तो हर राजनीतिक पार्टी लोगों को अपने-अपने तरीके से लुभाने और गुमराह करने की कोशिश करेगी, लेकिन जिस आग ने 43 लोगों की जान ले ली, उसकी आंच राजनीतिक पार्टियों तक भी पहुंचेगी।

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