क्या भारत विकसित हो पाएगा

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। देश के विकास की रफ्तार में लगातार हो रही कमी, वाकई में चिंता का विषय है। बीते दिनों जारी आँकड़ों के मुताबिक जुलाई-सितंबर, 2019 की तिमाही के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि की दर 4.5 प्रतिशत दर्ज की गई है। यह लगातार छठी तिमाही है, जब जीडीपी के बढ़ने की दर में गिरावट आई है।

गौरतलब है कि जीडीपी किसी खास अवधि के दौरान वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल कीमत है। भारत में कृषि, उद्योग और सर्विसेज तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर तय होती है। पिछले कुछ समय से इन तीनों ही क्षेत्रों में भारी सुस्ती दिख रही है। इंडस्ट्री की ग्रोथ रेट 6.7 फीसदी से गिरकर सिर्फ आधा प्रतिशत रह गई है। अब बड़ा सवाल ये है कि अर्थव्यवस्था की इस चरमराई हालत के साथ, क्या भारत कभी विकसित देशों की सूची में आ पाएगा? बीते कुछ वर्षों में गिरते विकास दर के लिए केंद्र की मोदी सरकार पर बुद्धिजीवियों द्वारा जो इल्जाम लगाए जा रहे हैं, वे कई हद तक सही साबित होते दिखाई पड़ रहे हैं। जानकारों का मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था की सुस्त हालात चिंता का मुद्दा बनने की बजाए राजनेताओं के बीच राजनीतिक और चुनावी मुद्दा बन रहा है। एक ओर भाजपा के नेता कहते हैं, भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा आर्थिक सुस्ती "अस्थायी" है और यह अमेरिका तथा चीन के बीच व्यापार मोर्चे पर चल रहे व्यापार युद्ध की वजह से है, तो वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि ये केंद्र सरकार की असफल निर्णयों का नतीजा है। वर्ष 2016 के पहले तक भारत को दुनिया की सबसे तेज विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था माना जाता था। लेकिन आपको याद होगा विश्व बैंक द्वारा जहां पहले भारत को विकासशील देश का दर्जा दिया जाता था, बाद में उसे लोअर मिडिल इंकम वाला देश का टैग लगा दिया गया। बीते कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देशों के आर्थिक स्तर का वर्गीकरण करने के लिए विकासशील और विकसित (डेवलपिंग और डेवेलप्ड) के मापदंड को माना जाता रहा। लेकिन अब दलील दी जा रही है कि ये वर्गीकरण देशों के वास्तविक आर्थिक स्थिति को नहीं दर्शाते। लिहाजा इसके इस्तेमाल को बंद करते हुए विश्व बैंक अब देशों को उनके ग्रॉस नैशनल इंकम (जीएनआई) के आधार पर चार कैटेगरी में बांटेगा। विश्व में वो देश विकासशील देशों में गिने जाते हैं, जहां निचला मानव विकास सूचकांक, कम सकल घरेलू उत्पाद, उच्च निरक्षरता दर, उच्च गरीबी दर, शिक्षा का निचला स्तर, घटिया परिवहन संचार और चिकित्सा सुविधाएं, असमान आय वितरण, उच्च मृत्यु दर और जन्म दर, उच्च शिशु मृत्यु दर आदि समस्याएं हों। इसके विपरीत तकनीकी विकास, आय का समान वितरण और औद्योगिक विकास अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार होने पर देश को विकसित माना जाता है। ये भी माना जाता है कि उच्च शिक्षित होने की वजह से विकसित देशों के नागरिक ज्यादा तार्किक होते हैं। सभी पैमानों पर भारत काफी पिछड़ा हुआ है। हमारे देश में बड़ी आबादी अभी भी पेयजल, शौचालय, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, गरीबी, कुपोषण, प्राथमिक शिक्षा और पक्की सड़कों जैसी आधारभूत जरूरतों के लिए परेशान है। हां, चीन की बात अलग है। भारत की प्रति व्यक्ति आय चीन की प्रति व्यक्ति आय के पांचवें हिस्से के बराबर ही है। एक अनुमान के मुताबिक उसका प्रति व्यक्ति जीडीपी भी 10 हजार डॉलर का स्तर पार कर चुका है। फिर भी चीन चाहता है कि उसे विकासशील देशों में ही रखा जाए, क्योंकि ऐसे देशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष लाभ मिलते हैं।

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