महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी देगा कौन ?

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- पुलिस की लापरवाही, भुगत रही जनता - आम लोगों को सज़ा और नेताओं को चुनाव लड़ने छूट बेंगलूरु, (परिवर्तन)। न जाने और कितनी मासूम लड़कियों को इस हैवानियत एवं बर्बरता की सुली पर चढ़ना पड़ेगा? और कितनी महिलाएं सड़क पर निकलने से डरेंगी ? और कितनी ही महिलाएं देर शाम होते ही अपने घरवालों को जवाब देती फिरेंगी कि वे अब तक इस मानसिक रोगों से जूझ रहे समाज में सुरक्षित है ?

जी हां, आज हमे शर्म आनी चाहिए ये कहते हुए कि हम इंसान हैं, क्योंकि जो अमानवीयता हम अपनी चारों ओर देख रहे हैं फिर भी अपने मुंह में दही जमा कर बैठे हैं, उससे तो हमें खुद को इंसान भी नहीं कहना चाहिए। जोर - शोर से देश में भ्रूण हत्या के खिलाफ नारे लगाए जाते हैं, बेटी बचाओ के अभियान चलाए जाते हैं। ये सवाल आप खुद से कीजिए, क्या आज यही दिन देखने के लिए हम और आप “बेटी बचाओ” अभियान में शामिल हुए थे ? अगर जवाब अंदर से आई तो आँखें शर्मसार हो जाएंगी। हैदरावाद की 27 वर्षीय प्रज्ञा (बदला हुआ नाम) बेशक पेशे से जानवरों की चिकित्सा में माहिर थी, लेकिन इंसान के अंदर जो जानवर भेड़िये के रूप में छुपा है उसे भला वो कैसे पहचान पाती? और शायद यही वजह है कि उसे विश्वास के नाम पर मौत नसीब हुई। सुनसान सड़क पर जिन लोगों ने उसकी ओर विश्वास का हाथ बढ़ाया उन्हीं लोगों ने न केवल उसके विश्वास को तोड़ा बल्कि उसकी इज्जत को भी तार तार कर दिया। उन दरिंदों ने सिर्फ प्रज्ञा के शरीर को ही नहीं बल्कि उसके सपनों और उसकी उम्मीदों को भी जला दिया। आमतौर पर क़ानून और पुलिस का डर ही लोगों को अपराध करने से रोकता है। यह डर तो अब रहा नहीं। वैसे भी हमारे देश के क़ानून में जेल, बेल, रिश्वत और अपील का इतना लंबा खेल है कि न्याय के इंतज़ार में एक जीवन खप जाता है। 

क्या है मामला ?

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में एक सरकारी डॉक्‍टर के साथ गैंगरेप, हत्‍या और जला देने के दिल दहला देने वाले मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। पुलिस जांच में पता चला है कि इस जघन्य वारदात के एक आरोपी मोहम्‍मद आरिफ ने हैवानियत के दौरान पीड़‍िता का मुंह दबा रखा था ताकि उनकी चीखों को कोई सुन न सके। वह तड़पती रहीं और दरिंदे उनके साथ हैवानियत करते रहे। माना जा रहा है कि सांस नहीं ले पाने के कारण हैदराबाद की इस 'निर्भया' की मौत हो गई। इस बीच पुलिस ने कहा है कि आरोपियों ने ही साजिश के तहत स्‍कूटी से हवा न‍िकाल दी थी ताकि वे महिला डॉक्‍टर को अपने जाल में फंसाकर वारदात को अंजाम दे सकें। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि गैंगरेप के दौरान महिला डॉक्‍टर ने मदद के लिए गुहार लगाना शुरू कर दिया। आरोपियों को लगा कि वे पकड़े जा सकते हैं। इसी बीच मोहम्‍मद आरिफ ने महिला पशु डॉक्‍टर का मुंह बंद कर दिया ताकि उनकी आवाज बाहर न आ सके। माना जा रहा है कि इसी दौरान सांस नहीं ले पाने के कारण महिला डॉक्‍टर की दम घुटने से मौत हो गई। तेलंगाना पुलिस ने महिला डॉक्‍टर के साथ गैंगरेप, हत्‍या और जला देने के 4 आरोपियों को अरेस्‍ट कर लिया है। गिरफ्तार किए गए लोगों की पहचान मोहम्मद आरिफ, नवीन, चिंताकुंता केशावुलु और शिवा के रूप में हुई है। पुलिस ने बताया कि हैवानियत की यह घटना बुधवार रात 9.35 से 10 बजे के बीच की है। पुलिस ने बताया कि गैंगरेप के बाद आरोपी डॉक्‍टर के शव को एक ट्रक पर लादकर हाइवे पर कुछ आगे बढ़े और एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल और डीजल खरीदा। घटना के सामने आने के बाद ट्विटर पर ट्रेंड हुआ, लोग हजारों की संख्या में सड़कों  पर उतरे और संसद तक जिक्र हुआ, अंततः आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। हर तरफ गुस्सा है। सोशल मीडिया से लेकर देश की संसद तक आम लोगों से लेकर मंत्री तक आरोपियों के लिए कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं। कुछ कह रहे इन्हें जिन्दा जला दो कुछ का कहना है इन्हें बधिया कर दो। दूसरी ओर कुछ लोग बेटियों को नसीहतें दे रहे हैं तो कुछ लोग बेटों को सुधरने की हिदायद दे रहे हैं। 

पुलिस पर सवाल

बता दें कि हैदराबाद के इस निर्भया कांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक पीड़‍िता डॉक्‍टर के हत्‍यारे को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग उठ रही है। इस बीच, पीड़‍िता की मां ने सभी दोषियों को सबके सामने जिंदा जलाने की मांग की है। परिवार वालों ने यह भी कहा है कि साइबराबाद पुलिस उन्‍हें दौड़ाती रही। अगर उसने तत्‍काल कार्रवाई की होती तो पीड़‍िता को जिंदा बचाया जा सकता था। पुलिस प्रशासन के इस व्यवहार से चौकिये नहीं, क्योंकि पुलिस प्रशासन अपनी ये गलती दोहराती रहती है। यूं तो देश में सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की है, लेकिन सच यह भी है कि पुलिस प्रशासन ने अपने काम और दायित्व को लेकर कभी तत्परता नहीं दिखाई है। ये हाल देश के कई विभिन्न राज्यों का हैं जहां पुलिस प्रशासन द्वारा महिलाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। समाचार 'परिवर्तन' के पास ऐसे कई मामले दर्ज हैं जहां पीड़िताओं ने पुलिस द्वारा किए गए अमानवीय व्यवहार की पुष्टि की है। 'परिवर्तन' अखबार के माध्यम से कई बार इस विषय पर अभियान भी चलाए गए, लेकिन दुख की बात को ये है कि पुलिस प्रशासन और केंन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा लगातार इसे अनदेखा किया गया। 

ऐसी ही एक घटना बेंगलूरु में भी घटी, जब एक निर्दोष महिला को मराथाहल्ली पुलिस स्टेशन के अधिकारियों द्वारा जबरन थाने ले जाया गया और उनसे बदसूलुकी भी की गई। थाने में पूछताछ के नाम पर अधिकारियों ने महिला यानी नंदिनी (बदला हुआ नाम) को मानसिक और शारीरिक दोनों ही रूप से प्रताड़ित किया और अगले दिन शाम को छोड़ दिया गया। इस वाकिये के बाद जब ‘परिवर्तन’ ने महिला से बात की तो सारी सच्चाई सामने आई। आज भी जब नंदिनी (बदला हुआ नाम) को उस घटना की याद आती है तो वह कांप उठती है और इतना ही कह पाती है कि अब पुलिस प्रशासन पर से मेरा विश्वास उठ चुका है। वे बताती हैं कि आए दिन हो रहे इन घटनाओं को सरकारी तंत्र जिस रवयै से ले रही है इससे साफ जाहिर है कि वे इन ज्वलंत मुद्दों को लेकर कितनी उदासीन है। नंदिनी ने बताया कि मुझे जब तक इंसाफ नहीं मिल जाता, मैं प्रशासन के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखुंगी।     

पुलिस जो सबकी रक्षा का प्रण लेती है ऐसे मामलों में असंवेदनशीलता दिखाती है, एरिया के झगड़े में फंसती है और कानून के सर्वोच्च मंदिर को ठेंगा दिखाती है। देश को अपराध मुक्त बनाने के लिए सबसे पहले इसी के सुधार की आवश्यकता है। इस मामले में तेलंगाना पुलिस ने क्या किया, पीड़िता के पिता की बातों से पता चलता है। उनका आरोप है कि पुलिस वालों ने शिकायत पर ध्यान नहीं दिया और जब शिकायत की तो कहने लगे कि लड़की किसी के साथ भाग गई होगी। ये जो सोच है, कि लड़की घर नहीं लौटी मतलब किसी के साथ भाग गई होगी, और भागी हुई लड़कियां बुरी होती है। यह दोहरे स्तर पर नुकसानदेह है। इतना सुनकर अगर आप पुलिस से निराश हो गए हैं, तो थोड़ी रुकिए क्योंकि अभी और सुनना है आपको। पीड़िता की मां बताती है कि जब पीड़िता की छोटी बहन ने साइबराबाद पुलिस थाने पहुंची तो उसके शमसाबाद भेज दिया गया, यह कहते हुए कि ये केस उस थाने के अंतर्गत आता है। इस पर पुलिस अधिकारियों की ओर से तर्क य़े दिया गया कि स्कूटी आखिरी बार शमशाबाद में देखी गई थी। घरवालों को अफसोस एक थाने से दूसरे थाने में वक्त बर्बाद हुआ, ऐसा न होता तो शायद पीड़िता जिंदा होती। 

नियम क्या कहते हैं - नियम है कि संगीन मामलों में तुरंत एफआईआर लिखी जाए। 2008 में यूपी में एक केस ऐसा हुआ था कि बच्ची लापता हुई थी, और महीने बाद एफआईआर लिखी गई। 2013 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया कि ऐसे मामलों में शुरुआती जांच के बिना एफआईआर लिखी जाए। हालांकि अगर बात थाने और एरिया को लेकर अटके तब के लिए भी नियम साफ हैं, जीरो एफआईआर लिए जाए। बाद में मामले को उपयुक्त थाने में ट्रांसफर कर दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की अवहेलना करते हुए तेलंगाना व केसीआर की पुलिस पीड़िता को सुरक्ष देने में नाकाम रही। हालांकि अब डैमेज कंट्रोल करने के लिए एसआई समेत तीन पुलिस वाले को सस्पेंड कर दिया गया है। लेकिन यहां अहम सवाल ये है कि पुलिस के सस्पेंशन से डॉकर लौट आएगी क्या। यहां पीड़िता के मौत के दूसरे गुनहेगार जिन्हें संवेदनशीलता की सबसे ज्यादा जरूरत है, वो है हमारे नेताओं के उतपटांग बयानबाजी और उनकी छिछली नेतागिरी। मामले के प्रकाश में आने के बाद  तेलंगाना के गृहमंत्री महमूद अली ने मीडिया को बयान देते हुए कहा, पढ़ी लिखी महिला थी, अपनी बहन को फोन करने के बजाए पुलिस को कॉल करती तो बच जाती। बुद्धिजीवी कहते हैं इसकी जरूरत न पड़ती अगर प्रदेश के गृहमंत्री अच्छा होता और प्रदेश की पुलिस चौकस होती एरिया और थाने के झगड़े में न पड़ती, चारों ओर कानून का तो शायद पीड़िता बच जाती। गृहमंत्री का बयान समाज के एक बड़े गड़बड़ को दर्शाता है। यह गड़बड़ है ऐसे मामलों में पीड़िता को दोष देने की रवायत। उनका कहना है कि महिलाओं के लिए जिस समझदारी दिखाने की बात नेता करते हैं वो समझदारी साहस दिखाने में है। और ये नेता का, सिस्टम का फैल्योर है कि वे इस साहस को सलाम करने की बजाए ओंछी बातें करते हैं। इसके अलावा कुछ नेता ऐसे हैं, जिन्होंने इस मामले को सांप्रदायिक हिंसा का प्रतीक बताया। उन्होंने चार में से एक आरोपी के मजहब को इस घटना का कारण बताया। उन्होंने पुरी कोशिश की कि यह मामला हिन्दु मुस्लिम बन जाए। ज़रा सोचिए, इसी मानसिक रूप से पीड़ित समाज में हमारी बेटियां हमारी बहुए कैसे जी रही हैं।

क्या हुआ निर्भया फंड का 

निर्भया कांड के बाद कई नीतियां बनाई गई थीं। निर्भया कोष की स्थापना भी इन्हीं में से एक थी जिसका मुख्य उद्देश्य दुष्कर्म पीड़ितों की सहायता करना और उनके पुनर्वास को सुनिश्चित करना था। नीतियों का निर्माण एक विषय है और क्रियान्वयन दूसरा। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार महिला सुरक्षा को लेकर बनाए गए निर्भया फंड के कुल बजट का राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों ने लगभग 20 फीसद फंड ही खर्च किया है। बात यदि वर्ष 2015 से 2018 के दौरान की हो तो इस दौरान निर्भया फंड में 854.6 करोड़ रुपयों का आवंटन हुआ, लेकिन इस राशि में से मात्र 165.4 करोड़ रुपये ही राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा खर्च किए गए। शुरुआत में 2013-14 में जहां यह रकम एक हजार करोड़ रुपये थी, वहीं 2014-15 में भी इतनी ही रकम इस फंड में जुड़ गई। इसके बाद 2016-17 और 2017-18 में प्रत्येक वर्ष 550 करोड़ रुपये फंड में जुड़ते चले गए। वर्तमान में वर्ष 2018-19 के केंद्रीय बजट में 50 करोड़ रुपये धन राशि इस फंड में आवंटित कर दी गई है। निर्भया फंड में मुख्य रूप से इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम, केंद्रीय पीड़ित मुआवजा निधि, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध रोकथाम, वन स्टॉप स्कीम, महिला पुलिस वालंटियर जैसी योजनाओं पर खर्च का प्रावधान था। लेकिन कई राज्य तो ऐसे भी हैं जिन्होंने इस कोष में से एक भी रुपया इन योजनाओं पर खर्च करना जरूरी ही नहीं समझा। इन राज्यों में महाराष्ट्र, मणिपुर और केंद्र शासित क्षेत्र लक्षद्वीप के नाम आते हैं। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि जिस राज्य में हैवानियत और दरिंदगी की यह घटना घटित हुई थी उस राज्य ने भी इस राशि का मात्र 0.84 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग किया है। पश्चिम बंगाल तो 0.76 प्रतिशत हिस्सा प्रयोग करके दिल्ली से भी पीछे है। दिल्ली सरकार महिला सुरक्षा के नाम पर मुफ्त यात्री परिवहन के लिए 1,500 करोड़ रुपये सालाना खर्च कर सकती है, लेकिन निर्भया फंड की एक फीसद राशि का भी उपयोग नहीं कर पाती। क्या वाकई में सरकारें महिलाओं की सुरक्षा के प्रति गंभीर हैं या महज राजनीतिक लाभ हेतु मुफ्त सार्वजनिक परिवहन सेवा जैसी योजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है? निर्भया फंड में प्रत्येक जिले में वन स्टॉप सेंटर प्रारंभ करने की भी बात कही गई थी, किंतु यह सपना भी अधर में लटका हुआ नजर आ रहा है। निर्भया कांड के बाद मंत्रालय द्वारा वन स्टॉप सेंटर को महिलाओं के लिए सबसे जरूरी माना था, लेकिन आज घटना को सात वर्ष और फंड स्थापना को छ: वर्ष बीत जाने के बाद भी यह स्थिति क्यों हैं?

नेताओं पर कार्रवाई होगी कब ?

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में महिलाओं के साथ बलात्कार, शोषण और प्रताड़ना की घटनाओं के लिए केवल आम अपराधी ही जिम्मेदार है, क्योंकि आए दिन इस जघन्न अपराध में लिप्त नेताओं के कारनामे भी सामने आते है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि एक अकेले राज्य में ही नहीं बल्कि महिलाओं की अस्मिता पर कीचड़ उछालने वाले कई दरिंदे देश में हर कोने में घुम रहे हैं, परंतु कुछ लोकतंत्र के मंदिर कहे जाने वाले संसद में भी विराजते हैं। जिनकी अनदेखी बारी बारी से राज्य और केंद्र सरकारें करती आई है। हाल ही में हमने कई ऐसे सेक्स टेप, बलात्कार, प्रताड़ना और शारीरिक शोषण की आवाजें सुनी जिनमें हमारे देश के नेताओं का नाम सामने आया। अपराधी आम लोगों में से एक हो तो उसके खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आते हैं, नारे लगाते हैं, इंसान की गुहार लगाते हैं लेकिन जब अपराधी कोई नेता हो तो लोग अपनी आवाज़ दवा देते हैं या उनकी आवाज़ को दवा दिया जाता है। ऐसा इस लिए क्योंकि नेताओं के हाथों में सत्ता की ताकत होती है और इसका उपयोग करना उनसे बेहतर कौन जान सकता है।  

इन नेताओं पर है महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले

कांग्रेस नेता महिपाल मदेरणा और भवंरी देवी कांड - भंवरी देवी के राजस्थान के मंत्री महिपाल मदेरणा के साथ संबंध थे और वो इसकी एक सीडी बनाकर मंत्री को ब्लैकमेल कर रही थी।  

आरजेडी विधायक अरुण यादव - आरा की रहने वाली नाबालिग का सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि आरजेडी विधायक अरुण यादव ने उसके साथ गलत काम किया है।

बीएसपी नेता पर आरोप - साल 2017 में एक युवती ने अयोध्या विधानसभा सीट से बसपा प्रत्याशी बज्मी सिद्द‍िकी और उनके साथियों पर गैंगरेप का आरोप लगाया है।

सपा नेता पर भी लगा रेप का आरोप - साल  2015 उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में शौच के लिए गई एक लड़की को अगवा करके उससे कथित रूप से सामूहिक दरिंदगी का मामला सामने आया। 

दिल्ली के पूर्व विधायक विजय जॉली - दिल्ली के पूर्व विधायक विजय जॉली पर साल 2017 में एक महिला ने आरोप लगाया। 

गुजरात में जयेश पटेल - साल 2016 में जयेश पटेल पर उनकी ही युनिवर्सिटी में नर्सिंग का कोर्स कर रही एक छात्रा ने बलात्कार का आरोप लगाया।

बीजेपी विधायक उमेश अग्रवाल पर आरोप - साल 2015 में दिल्ली की अदालत ने हरियाणा से बीजेपी विधायक उमेश अग्रवाल के खिलाफ रेप का मुकदमा दर्ज किया। 

उत्तराखंड के बीजेपी नेता हरक सिंह रावत पर आरोप - साल 2016 में उत्तराखंड के बीजेपी नेता हरक सिंह रावत पर दिल्ली पुलिस ने रेप का मामला दर्ज किया।

मध्य प्रदेश में 2 बीजेपी नेताओं पर रेप का आरोप - साल 2018 में मध्य प्रदेश के सीहोर जिलें में 28 वर्षीय महिला का दो स्थानीय भाजपा नेताओं द्वारा कथित रूप से गैंगरेप का मामला सामने आया।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी विधायक कुशाग्र सागर पर आरोप - साल 2018 में  बदायूं से विधायक कुशाग्र सागर पर 22 साल की महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया। 

महाराष्ट्र में बीजेपी नेता की हरकत - साल 2017 में चलती बस में महिला के साथ 'किस' करने की तस्वीरें वायरल होने के बाद महाराष्ट्र में बीजेपी नेता को गिरफ्तार किया गया।

गुजरात बीजेपी उपाध्यक्ष पर आरोप - एक युवती ने गुजरात बीजेपी उपाध्यक्ष जयंती भानुशाली पर आरोप लगाया है कि उसने पिछले नवंबर से अब तक उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया। 

महाराष्ट्र में बीजेपी बीजेपी के प्रवक्ता और पूर्व विधायक के खिलाफ केस - साल 2013 में महाराष्ट्र बीजेपी के प्रवक्ता और पूर्व विधायक मधु चव्हाण के खिलाफ रेप और धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ। 

पूर्व केंद्रीय पर निहालचंद पर आरोप - 2011 में महिला ने यौन शोषण का मामला दर्ज कराया था। महिला का आरोप था कि उसे ड्रग देकर उसके साथ रेप भी किया गया।

विधायक कुलदीप सिंह सेंगर उन्नाव मामला - नाबालिग से रेप के मामले में पॉस्को एक्ट के तहत कुलदीप सेंगर पर आरोप तय है।

चिन्मयानंद पर आरोप - बीजेपी नेता चिन्मयानंद को लॉ की छात्रा से बलात्कार के आरोप है। उनके ऊपर लॉ कॉलेज की छात्रा ने यौन शोषण का आरोप लगाया है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर पर आरोप -  पूर्व केंद्रीय मंत्री और जाने-माने पत्रकार पर कई महिलाओं ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं।

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