सबरीमाला यात्रा - करें अयप्पा स्वामी के दर्शन

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है विश्‍व प्रसिद्ध सबरीमाला का मंदिर। यहां हर दिन लाखों लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया है। करीब 800 साल पुराने इस मंदिर में ये मान्यता पिछले काफी समय से चल रही थी कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश ना करने दिया जाए। इसके कुछ कारण बताए गए थे। आओ जानते हैं इस मंदिर के इतिहास और स्थिति के बारे में।

कौन थे अयप्पा स्वामी ?

भगवान अयप्पा के पिता शिव और माता मोहिनी हैं। विष्णु का मोहिनी रूप देखकर भगवान शिव का वीर्यपात हो गया था। उनके वीर्य को पारद कहा गया और उनके वीर्य से ही बाद में सस्तव नामक पुत्र का जन्म का हुआ जिन्हें दक्षिण भारत में अयप्पा कहा गया। शिव और विष्णु से उत्पन होने के कारण उनको 'हरिहरपुत्र' कहा जाता है। इनके अलावा भगवान अयप्पा को अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है। इनके दक्षिण भारत में कई मंदिर हैं उन्हीं में से एक प्रमुख मंदिर है सबरीमाला। इसे दक्षिण का तीर्थस्थल भी कहा जाता है। धार्मिक कथा के मुताबिक समुद्र मंथन के दौरान भोलेनाथ भगवान विष्णु के मोहिनी रूप पर मोहित हो गए थे और इसी के प्रभाव से एक बच्चे का जन्म हुआ जिसे उन्होंने पंपा नदी के तट पर छोड़ दिया। इस दौरान राजा राजशेखरा ने उन्हें 12 सालों तक पाला। बाद में अपनी माता के लिए शेरनी का दूध लाने जंगल गए अयप्पा ने राक्षसी महिषि का भी वध किया। अय्यप्पा के बारे में किंवदंति है कि उनके माता-पिता ने उनकी गर्दन के चारों ओर एक घंटी बांधकर उन्हें छोड़ दिया था। पंडालम के राजा राजशेखर ने अय्यप्पा को पुत्र के रूप में पाला। लेकिन भगवान अय्यप्पा को ये सब अच्छा नहीं लगा और उन्हें वैराग्य प्राप्त हुआ तो वे महल छोड़कर चले गए। कुछ पुराणों में अयप्पा स्वामी को शास्ता का अवतार माना जाता है।

अयप्पा स्वामी का चमत्कारिक मंदिर 

भारतीय राज्य केरल में शबरीमाला में अयप्पा स्वामी का प्रसिद्ध मंदिर है, जहां विश्‍वभर से लोग शिव के इस पुत्र के मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं। इस मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात घने अंधेरे में रह-रहकर यहां एक ज्योति दिखती है। इस ज्योति के दर्शन के लिए दुनियाभर से करोड़ों श्रद्धालु हर साल आते हैं। सबरीमाला का नाम शबरी के नाम पर पड़ा है। वही शबरी जिसने भगवान राम को जूठे फल खिलाए थे और राम ने उसे नवधा-भक्ति का उपदेश दिया था। बताया जाता है कि जब-जब ये रोशनी दिखती है इसके साथ शोर भी सुनाई देता है। भक्त मानते हैं कि ये देव ज्योति है और भगवान इसे जलाते हैं। मंदिर प्रबंधन के पुजारियों के मुताबिक मकर माह के पहले दिन आकाश में दिखने वाले एक खास तारा मकर ज्योति है। कहते हैं कि अयप्पा ने शैव और वैष्णवों के बीच एकता कायम की। उन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा किया था और सबरीमाल में उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यह मंदिर पश्चिमी घाटी में पहाड़ियों की श्रृंखला सह्याद्रि के बीच में स्थित है। घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और तरह-तरह के जानवरों को पार करके यहां पहुंचना होता है इसीलिए यहां अधिक दिनों तक कोई ठहरता नहीं है। यहां आने का एक खास मौसम और समय होता है। जो लोग यहां तीर्थयात्रा के उद्देश्य से आते हैं उन्हें इकतालीस दिनों का कठिन वृहताम का पालन करना होता है। तीर्थयात्रा में श्रद्धालुओं को ऑक्सीजन से लेकर प्रसाद के प्रीपेड कूपन तक उपलब्ध कराए जाते हैं। दरअसल, मंदिर नौ सौ चौदह मीटर की ऊंचाई पर है और केवल पैदल ही वहां पहुंचा जा सकता है। इस मंदिर में महिलाओं का आना वर्जित है। इसके पीछे मान्‍यता ये है कि यहां जिस भगवान की पूजा होती है (श्री अयप्‍पा), वे ब्रह्माचारी थे इसलिए यहां 10 से 50 साल तक की लड़कियां और महिलाएं नहीं प्रवेश कर सकतीं। इस मंदिर में ऐसी छोटी बच्‍चियां आ सकती हैं, जिनको मासिक धर्म शुरू ना हुआ हो। या ऐसी या बूढ़ी औरतें, जो मासिक धर्म से मुक्‍त हो चुकी हों। यहां जिन श्री अयप्‍पा की पूजा होती है उन्‍हें 'हरिहरपुत्र' कहा जाता है। यानी विष्णु और शिव के पुत्र। यहां दर्शन करने वाले भक्‍तों को दो महीने पहले से ही मांस-मछली का सेवन त्‍यागना होता है। मान्‍यता है कि अगर भक्‍त तुलसी या फिर रुद्राक्ष की माला पहनकर और व्रत रखकर यहां पहुंचकर दर्शन करे तो उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है।

सबरीमाला के महोत्सव 

एक अन्य कथा के अनुसार पंडालम के राजा राजशेखर ने अय्यप्पा को पुत्र के रूप में गोद लिया। लेकिन भगवान अय्यप्पा को ये सब अच्छा नहीं लगा और वो महल छोड़कर चले गए। आज भी यह प्रथा है कि हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर पंडालम राजमहल से अय्यप्पा के आभूषणों को संदूकों में रखकर एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। जो नब्बे किलोमीटर की यात्रा तय करके तीन दिन में सबरीमाला पहुंचती है। कहा जाता है इसी दिन यहां एक निराली घटना होती है। पहाड़ी की कांतामाला चोटी पर असाधारण चमक वाली ज्योति दिखलाई देती है। पंद्रह नवंबर का मंडलम और चौदह जनवरी की मकर विलक्कू, ये सबरीमाला के प्रमुख उत्सव हैं। मलयालम पंचांग के पहले पांच दिनों और विशु माह यानी अप्रैल में ही इस मंदिर के पट खोले जाते हैं। इस मंदिर में सभी जाति के लोग जा सकते हैं, लेकिन दस साल से पचास साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर मनाही है। सबरीमाला में स्थित इस मंदिर प्रबंधन का कार्य इस समय त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड देखती है।

18 पावन सीढ़ियां  

चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ यह मंदिर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है, जिनके अलग-अलग अर्थ भी बताए गए हैं। पहली पांच सीढ़ियों को मनुष्य की पांच इन्द्रियों से जोड़ा जाता है। इसके बाद वाली 8 सीढ़ियों को मानवीय भावनाओं से जोड़ा जाता है। अगली तीन सीढ़ियों को मानवीय गुण और आखिर दो सीढ़ियों को ज्ञान और अज्ञान का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा यहां आने वाले श्रद्धालु सिर पर पोटली रखकर पहुंचते हैं। वह पोटली नैवेद्य (भगवान को चढ़ाई जानी वाली चीजें, जिन्हें प्रसाद के तौर पर पुजारी घर ले जाने को देते हैं) से भरी होती है। यहां मान्यता है कि तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर, व्रत रखकर और सिर पर नैवेद्य रखकर जो भी व्यक्ति आता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

कब होते हैं दर्शन

मंडल काल या मंडल मासम सबरीमला मंदिर को समर्पित समय होता है जो 41 दिनों का होता है। इस दौरान भक्त कठिन व्रत का पालन करते हैं, 41 दिन के मंडल काल के बाद 3 दिनों के लिए मंदिर बंद किया जाता है और चौथे दिन दर्शन के लिए खोला जाता है। ये मंदिर श्रद्धालुओं के लिए साल में सिर्फ नवंबर से जनवरी तक खुलता है। और मकरसंक्रांति तक दर्शन किए जाते हैं इसके बाद मंदर के पट बंद कर दिए जाते हैं। कठिन व्रत का पालन करते हैं दर्शन करने वाले-

चूंकि इस मंदिर में 10 से 50 वर्ष तक की महिलाएं नहीं जा सकतीं इसलिए दर्शन करने वालों में पुरुषों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। जो भी श्रद्धालु यहां आता है उसे यहां आने से पहले 41 दिनों का कठिन व्रत करना होता है। इसे दीक्षा या तप भी कहा जाता है। सबरीमला जाने वाले व्यक्ति को -

समस्त लौकिक बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्मचर्य का पालन करना जरूरी है।

सुबह उठकर और रात को सोने से पहले, दिन में दो बार नहाना जरूरी है। पानी गर्म नहीं होना चाहिए और सिर धोकर नहाना होता है। शुद्धता सबसे जरूरी है। नहाने से पहले कुछ नहीं खा सकते।

खुश्बू का इस्तेमाल किसी भी तरह से नहीं होता। घर में बनी हुई चीजें ही इस्तेमाल की जाती हैं।

खाना घर का बना ही खाया जाता है जिसे खुद अलग बर्तनों में बनाया जाता है। भोजन शाकाहारी ही करना चाहिए। दिन में पूरा खाना और रात को हल्का खाना और फल।

जमीन पर ही सोना होता है। चादर या कंबल का इस्तेमाल कर सकते हैं।

इस दौरान दाढ़ी या बाल नहीं कटवाए जाते।

फिल्मों या मनोरंजन से दूर रहना होता है। अयप्पा के भजन और भक्ति गीत ही सुन सकते हैं। मन में अयप्पा का पाठ करते रहना होता है।

हिंसा, बहस, विवाद से दूर रहना होता है। अश्लील शब्दों का इस्तेमाल नहीं होता।

जीवन को बहुत ही सादगी से जीना होता है। घर में पूजा करें तो भी सादगी से, अमीरी नहीं दिखानी होती क्योंकि अयप्पा के लिए सब बराबर हैं।

मन में सिर्फ श्रद्धा का भाव होना चाहिए। खुद को शांत रखने के लिए ध्यान लगाना होता है।

नंगे पैर रहना चाहिए। चप्पल जूतों का उपयोग न करें तो अच्छा होता है।

पहली बार दर्शन को जाने वाले लोगों को कन्नीस्वामी कहा जाता है, जिन्हें काले कपड़े और मुण्डू धोती पहननी होती है। एक यात्रा के बाद गहरे नीले या नारंगी रंग के कपड़े पहन सकते हैं।

इस दौरान कोई भी गलत काम नहीं करना चाहिए। जैसे- घूस लेना, हिंसा से जुड़ा कोई काम, गाली गलौज आदि।

सिगरेट, शराब, तंबाकू या पान मसाला को हाथ तक नहीं लगाना।

इस दौरान किसी की मृत्यु से जुड़े संस्कारों में नहीं जाते। साथ में तुल्सी का पत्ता रखते हैं जिससे खुद को शुद्ध कर सकें।

महिलाओं से दूरी बनाकर रखनी होती है। किसी भी तरह के भावनात्मक बंधनों से खुद को मुक्त करना होता है।

घर में प्रवेश करने से पहले पैर धोने होते हैं।

गले में तुलसी या रुद्राक्ष की माला रखनी होती है। यात्रा या व्रत पूरा होने के बाद ही अयप्पा मंदिर के गुरुस्वामी ही वो माला उतारते हैं।

शाम को पूजा करनी होती है और मंदिर जाना जरूरी है।

यात्रा पूरी होने तक उन्हें अपने माथे पर चंदन का लेप लगाए रखना जरूरी होता है।

मंदिर यात्रा के दौरान उन्हें सिर पर इरुमुडी रखनी होती है यानी दो थैलियां और एक थैला। एक में घी से भरा हुआ नारियल व पूजा सामग्री होती है तथा दूसरे में भोजन सामग्री। ये लेकर उन्हें शबरी पीठ की परिक्रमा भी करनी होती है, तब जाकर अठारह सीढियों से होकर मंदिर में प्रवेश मिलता है।

श्रद्धालु सिर पर पोटली रखकर पहुंचते हैं। पोटली नैवेद्य से भरी होती है।

कहते हैं जो कोई भक्त 41के इस व्रत को करके यात्रा पूरी करता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती है।

ये 41 दिन के नियम मंदिर की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार बनाए गए हैं। जिसे दर्शन करने वालों को पालन करना ही होता है। लेकिन महिलाओं का मासिक धर्म चक्र 28 दिन का होता है इसलिए वो किसी भी तरह 41 दिनों का ये व्रत नहीं कर सकतीं, क्योंकि मान्यताओं के हिसाब से महिलाएं मासिक की वजह से अपवित्र हो जाती हैं और मंदिर में आने के योग्य नहीं होती। बच्चे, पुरुष और रजोनिवृत्ति महिलाएं ये व्रत कर सकते हैं इसलिए उनके मंदिर जाने पर कोई रोक-टोक नहीं है।

कैसे पहुंचें मंदिर?

तिरुअनंतपुरम से सबरीमाला के पंपा तक बस या निजी वाहन से पहुंचा जा सकता है। पंपा से पैदल जंगल के रास्ते पांच किलोमीटर पैदल चलकर 1535 फीट ऊंची पहाड़ियों पर चढ़कर सबरीमला मंदिर में अय्यप्पा के दर्शन प्राप्त होते हैं। रेल से आने वाले यात्रियों के लिए कोट्टयम या चेंगन्नूर रेलवे स्टेशन नज़दीक है। यहां से पंपा तक गाड़ियों से सफर किया जा सकता है। यहां से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट तिरुअनंतपुरम है, जो सबरीमला से कुछ किलोमीटर दूर है। बेंगलूरु से दूरी - 397 किमी है।

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