परमात्मा पर विश्वास जगाने के कुछ प्रारम्भिक प्रयोग

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(परिवर्तन)। श्री सुधांशु जी महाराज : बिना विश्वास जीवन असम्भव बन जाता है। ड्राइवर पर विश्वास न हो, तो बस में बैठकर यात्र नहीं की जा सकती। अध्यात्म की यात्र तो और भी कठिन है, जिसमें विश्वास ही आधार है। मंत्र पर विश्वास, देवता पर विश्वास, जीवन की सकारात्मकता पर विश्वास, ऋषियों पर विश्वास, संत पर विश्वास, गुरु पर विश्वास, गुरुमंत्र पर विश्वास आदि आदि। सम्पूर्ण अध्यात्म विश्वास की डोर पर ही तो टिका है।

वैसे सांसारिक जीवन में भी तो विश्वास के बिना एक कदम बढ़ पाना कहां संभव है। कल्पना करें कि आप किसी अनजाने शहर में पहुंच गये, बस आपके हाथ एक मात्र अपने गंतव्य का पता है। जहां आपको जाना है, वहां के लिए उलझन वाली गलियां हैं, बड़ी देर भटकने के बाद कोई अनजाना व्यक्ति मिलता है, जिसे वह पते वाली पर्ची थमाते हैं, वह आपको कुछ निर्देश देता है और उसका पालन करते हुए आप सहजता से चल देते हैं और हाथ वाले पते पर जा पहुंचते हैं। आश्चर्य तब होता है जब तुम देखते हो कि इसी गली से, इसी मोड़ से में कई बार गुजरा और निर्धारित पते से चूकता रहा। क्योंकि तब वह मार्गदशक नहीं मिला था। इसी प्रकार संसार की गलियों में भी भगवान का पता बताने वाले सद्गरु की आवश्यकता होती है। सद्गुरु मिल जाए तो उसके बताये पर विश्वास जमाकर चलना पड़ता है। यह विश्वास ही तुम्हें उस प्रभु के पते तक पहुुंचायेगा। अर्थात् प्रथम है सही सद्गुरु मिलना, फिर उस पर विश्वास करके बताये निर्देश अनुसार अपने मन को उस पर चलाना और उसके अनुशासन में जीवन जीना। वास्तव में सद्गुरु पर पूरी आस्था और विश्वास ही, परमात्मा तक पहुंचाने की रस्सी है। बस उसे हाथ में पकड़े रखना पड़ता है। लेकिन मन में सद्गुरु पर, परमात्मा पर विश्वास बना रहे, इसके कुछ प्रयोग हैं। उन प्रयोगों में गुरु सत्संग, सिमरन, ध्यान, सेवा गुरुदर्शन आदि अनेक आयाम आते हैं, जिन्हें अभ्यास में लाकर शिष्य साधक अपना विश्वास जगाता, बढ़ाता है। नाद अथवा संगीत ही लें, इसके साथ ध्यान टिकायें, सत्संग, कीर्तन में रम जायें, किसी दिव्य ध्वनि को दिल से सुनें और महसूस करें। एकाग्रता की गहराई बनाए रखने के लिए अपने अन्दर का पूर्ण प्रेम जगायें। इस प्रकार रोम-रोम मस्त हो जाएगा। इसी प्रकार कानों से आती हुई हर शुभ ध्वनि मेरे आज्ञाचक्र से होकर सीधे हृदय में प्रवेश कर रही है, हृदय कमल में उतर रही हैैं। इस प्रकार मस्ती में झूमते रहें। सहज एक विश्वास जगेगा कि हम परमात्मा के निकट पहुंच रहे हैं। उस समय कोई तर्क वितर्क नहीं। बस यह प्रयोग ही आपको परमात्मा के रास्ते से जोड़ने के लिए काफी है। इसी प्रकार गुरु सत्संग का चिंतन करें,ज्योति का ध्यान करें। देखेंगे, एक समय के साथ आपका मन स्थिर हो जायेगा, चित्त गहराई में उतरने लगेगा, विश्वास पैदा होगा अंतःकरण में और वह विश्वास डोर परमात्मा के द्वार की ओर बढ़ चलेगी। ये विश्वास और अभ्यास आध्यात्मिक धारा से जुड़ने के दो माध्यम हैं। विश्वास ही जीवन ऊर्जा को जगाता है। आप भी परमात्मा तक पहुंचने के यह कुछ प्रारम्भिक पते हैं, जिन पर विश्वास करके आगे बढ़ें और सौभाग्य जगायें।

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