क्यों बिकती जा रही हैं सरकारी कम्पनियाँ!

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। वर्ष 2019 के शुरुआत में पुलवामा हादसा हुआ, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में एयर स्ट्राइक भी हुआ। इसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के चुरू में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा था, है इस मिट्टी की सौगंध मुझे, देश नहीं झुकने दूंगा - देश नहीं बिकने दूंगा। हालांकि सच्चाई इससे बिल्कुल परे है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण हर दिन घोषणा कर रही है। सरकारी कंपनियों को बेचे जाने की तारीखें तय कर रहीं हैं।

तो यहां यह साफ है देश नहीं झुकने दूंगा - देश नहीं बिकने दूंगा का नारा देते-देते भाजपा की सरकार एक - एक कर सब कुछ बेचते क्यों चली जा रही है। कुछ दिन पहले वित्त मंत्री ने कहा था, एयर इंडिया और भारत पेट्रोलियम को अगले साल बेच दिया जायेगा। इसके साथ ही खबर आई कि सरकार और पांच कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचेगी। उन कंपनियों में भारत पेट्रोलियम के अलावा भारतीय जहाजरानी निगम, कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, टिहरी हाईड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन और नॉर्थ ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी बेचेगी। एक और खबर के अनुसार भारत सरकार देश की चार सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनियों को 42000 करोड़ रुपये की राहत देगी। उन कंपनियों में एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया और जियो शामिल है। क्योंकि इन कंपनियों ने सरकार से अपील किया था कि अगर उन्हें सरकार की तरफ से राहत नहीं मिली, तो कंपनियां डूब जायेंगी। ये दोनों खबरें क्या कहती हैं। निजी कंपनियों को घाटे या वित्तीय संकट से निकालने के लिए सरकार हजारों-लाखों करोड़ रुपये की राहत दे सकती है। लेकिन सरकारी कंपनियों को बेचती रहेगी या कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी को बेचती रहेगी। बात झारखंड राज्य की करें तो यहां भाजपा की सरकार आने के बाद वर्ष 2015 में यही हुआ था। रघुवर सरकार ने सबसे पहला काम यही किया था कि बिजली कंपनी पतरातू थर्मल पावर लिमिटेड को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एनटीपीसी के हाथों सौंप दिया। राज्य सरकार ने कौड़ी के भाव में करीब 75 प्रतिशत हिस्सेदारी एनटीपीसी को दे दी। इसमें कई तरह से और कई स्तरों पर नियमों को तोड़ा गया। तो क्या भाजपा की सरकारों का यही तरीका है, काम करने का। सरकारी कंपनियों को बेचते रहो और कहते रहो - देश नहीं झुकने दूंगा - देश नहीं बिकने दूंगठे

कम्पनी लाभ में फिर उसे बेचा क्यों?

भारत पेट्रोलियन कॉरपोरेशन लिमिटेड कंपनी के मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि यह कंपनी वर्तमान में लाभ में है। फिर उसे क्यों बेचा जा रहा है। इस पर कोई जवाब देने वाला नहीं। इस कंपनी को बेचने से पहले मोदी सरकार ने वर्ष 2016 में कंपनी के राष्ट्रीयकरण संबंधी कानून को रद्द किया। ताकि इस कंपनी को किसी निजी या विदेशी कंपनी को बेचने के लिए संसद से अनुमति ही ना लेनी पड़े।भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन देश की सबसे बड़ी पेट्रोल-डीजल रिटेलर कंपनी है। वर्ष 2018-19 में इस कंपनी ने 7132 करोड़ रुपये का लाभ कमाया है। इससे पहले के वर्ष 2017-18 में 7976 करोड़ रुपया और वर्ष 2016-17 में 8039 करोड़ रुपया। नुकसान में चल रही कंपनियों को बेचने की बात तो समझ में आती है। पर फायदे में चल रही कंपनियों को बेचने का मकसद क्या हो सकता है। व्यवसायिक नजरिये से तो ऐसे कदम किसी बड़े कॉरपोरेट घराने को मदद पहुंचाने वाला ही माना जायेगा और यह काम किसकी सरकार कर रही है। जिसने नारा दिया था - देश नहीं झुकने दूंगा-देश नहीं बिकने दूंगा। इस नारे से ही मंत्रमुग्ध होते रहिये। तब तक सभी सरकारी कंपनियां निजी हाथों में चली जायेंगी। बीपीसीएल और आईओसी सहित पांच कंपनियों से सरकार को करीब एक लाख करोड़ तक मिल सकता है। दरअसल बीपीसीएल में सरकार का हिस्सा 53.29 प्रतिशत है और वह पूरा हिस्सा बेच रही है। इससे 63000 करोड़ मिलने का अनुमान है। वहीं एससीआई का भी सरकार पूरा 63.75 प्रतिशत हिस्सा बेच रही है। इससे 2000 करोड़ रुपये मिलेंगे। इसके अलावा कॉनकॉर से 54.80 प्रतिशत हिस्सेदारी में 30.8 प्रतिशत बेच रही है जिससे 10,800 रुपये मिलेंगे। इसके अलावा टीएचडीसी इंडिया का पूरा 74.23 प्रतिशत और एनईईपीसीओ के पूरे 100 प्रतिशत हिस्सेदारी सरकार बेच रही है। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इससे खरीददार को क्या-क्या मिलेगा तो हम आपको बता देते हैं। दरअसल बीपीसीएल जो भी खरीदेगा उसे देश की 14 प्रतिशत ऑयल रिफाइनिंग क्षमता पर नियंत्रण मिलेगा। बीपीसीएल की मुंबई, केरल मध्यप्रदेश और असम के नुमालीगढ़ में चार रिफायनरी है। इनकी सालाना क्षमता 38.3 मिलियन टन है। इतना ही नहीं यह देश की रिफाइनिंग कैपेसटी का 15 प्रतिशत है। देश की पेट्रोलियम कंपनी पदार्थों की 21 प्रतिशत खपत यही कंपनी करती है।

क्या है विनिवेश और निजीकरण

निजीकरण और विनिवेश को अक्सर एक साथ इस्तेमाल किया जाता है लेकिन निजीकरण इससे अलग है। विनिवेश, निवेश का उलटा होता है। इसके तहत कोई सरकारी कंपनी अपना हिस्सा या शेयर किसी निजी कंपनी या आम लोगों को बेचती है। विनिवेश शेयर बेचकर मालिकाना हक घटाने की प्रक्रिया है। इससे सरकार को दूसरी योजनाओं पर खर्च करने के लिए धन मिल जाता है। कई बार लोग निवेश को निजीकरण समझ लेते हैं। पर ऐसा नहीं है। आमतौर पर सरकार किसी सरकारी पीएसयू में 51 फीसदी हिस्सेदारी बनाए रखना चाहती है। पर अब इस नीति में भी बदलाव होता दिख रहा है। सरकार ने बजट में कहा है कि वो रणनीतिक बिक्री करेगी। रणनीतिक बिक्री के तहत किसी सरकारी कंपनी का स्ट्रैटजिट पार्टनर यानी रणनीतिक साझीदार चुना जाता है। फिर उसे शेयरों का पूरा ब्लॉक ट्रांसफर किया जाता है। कई बार इसमें मैनेजमेंट का ट्रांसफर भी शामिल होता है। मतलब ये कि किसी कंपनी में हिस्सेदारी बेचने पर नए खरीदार को मैनेजमेंट में भी हिस्सा दिया जाता है। रणनीतिक बिक्री का एक मतलब ये भी होता है कि इसके तहत सरकार किसी कंपनी में अपनी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम भी कर सकती है।

29 कंपनियों की लिस्ट तैयार

जहां एक तरफ हम और आप जैसे आम लोग घर चलाने को लेकर परेशान हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार देश चलाने को लेकर परेशान है। दूसरी मोदी सरकार पैसा जुटाने के लिए विनिवेश पर बड़ा दांव खेलने की तैयारी में है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक विनिवेश के लिए करीब 29 कंपनियों की लिस्ट तैयार है। इनमें से कुछ कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी बेची जाएगी और कुछ की जमीनें। सरकार विनिवेश से करीब 1 लाख करोड़ रुपए जुटाएगी। आइए जानते हैं क्या है सरकार की प्लानिंग? किन कंपनियों में विनिवेश हो सकता है? और क्या होता है विनिवेश? सुत्रों के मुताबिक जिन कंपनियों में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेच सकती है, उनमें कई अहम कंपनियों के नाम शामिल हैं। अब एक नजर डाल लेते हैं, जिन लोक उपक्रमों यानी सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज में विनिवेश या रणनीतिक हिस्सेदारी बेचने की तैयारी है।

एयर इंडिया : भारत सरकार की वो कंपनी जो इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया के विलय से बनी है। इन दिनों अपने कर्जे की वजह से संकट में है।

स्कूटर्स इंडिया : लखनऊ की ये कंपनी एक जमाने में लंब्रेटा स्कूटर बनाती थी। आजकल विक्रम ब्रैंड से थ्री-व्हीलर बना रही है।

पवन हंस : भारत सरकार की मिनीरत्न कंपनी है. कंपनी हेलीकॉप्टर सेवा मुहैया कराती है। कंपनी में 51 फीसदी हिस्सेदारी सरकार की है और 49 फीसदी ओएनजीसी की। कंपनी का मुख्यालय दिल्ली में है।

बीईएमएल : भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली कंपनी है। ये खनन और निर्माण के लिए उपकरण बनाती है।

भारत पंप कंप्रेशर्स : इलाहाबाद की ये कंपनी तेल रिफाइनरीज, परमाणु ऊर्जा, सीमेंट घोल और केमिकल सप्लाई वगैरह के लिए पंप बनाती है। तेल खोज और सीएनजी आदि के लिए कंप्रेसर और गैस सिलेंडर बनाती है।

सेल : स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड की तीन इकाइयों- भद्रावती, सलेम और दुर्गापुर में रणनीतिक बिक्री प्रस्तावित है। कंपनी देश की सबसे बड़ी स्टील उत्पादक है।

हिंदुस्तान फ्लोरोकार्बंस लिमिटेड : कंपनी तेलंगाना के संगारेड्डी जिले में है। ये मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल इंडस्ट्री के साथ-साथ डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर के लिए केमिकल पाउडर बनाती है।

हिंदुस्तान न्यूजप्रिंट : भारी उद्योग मंत्रालय के अधीन ये कंपनी अखबारी कागज बनाती है। देश भर के अखबारों को कागज उपलब्ध कराती है।

एचएलएल लाइफ केयर : साल 1966 में भारत सरकार ने इस कंपनी को अस्पतालों के लिए गर्भनिरोधक प्रोडक्ट बनाने के लिए शुरू किया था। आज ये कंपनी सेनेटरी नैपकिन जैसे बहुत से दूसरे मेडिकल प्रोडक्ट भी बना रही है।

सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड : केंद्र सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत आने वाली कंपनी सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काम करती है। कंपनी सौर ऊर्जा के पैनल वगैरह बनाती है।

ब्रिज एंड रूफ कंपनी इंडिया लिमिटेड : भारत सरकार की मिनीरत्न कंपनी है। कंपनी इंजीनियरिंग सेवाएं उपलब्धा कराती है। हाईवे, स्टेडियम, पावर प्लांट, आयल डिपो वगैरह के ठेके लेती है।

एनएमडीसी : सरकारी कंपनी एनएमडीसी यानी राष्ट्रीय खनिज विकास निगम छत्तीसगढ़ में बस्तर के नगरनार में स्टील प्लांट लगा रही है। इसमें भी रणनीतिक हिस्सेदारी बेचने की तैयारी है।

सीमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड : देश में सीमेंट की जरूरत पूरा करने के लिए सरकार ने 1965 में ये कंपनी बनाई थी। इसका एक प्लांट मध्य प्रदेश के नीमच के नयागांव में है। कंपनी सीसीआई ब्रैंड से सीमेंट बनाती है।

प्रोजेक्ट एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड : केमिकल एंड फर्टिलाइजर मिनिस्ट्री के तहत काम करती है। मिनी रत्न कंपनी है। डिजाइन, इंजीनियरिंग और कंसल्टेंसी का काम करती है।

हिंदुस्तान प्रीफैब लिमिटेड : इस कंपनी का गठन सरकार ने पाकिस्तान से आए विस्थापितों के घर बनाने के लिए किया था। साल 1948 में ये कंपनी बनी थी।

फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड : ये कंपनी मिनी रत्न - 2 की कैटेगरी में आती है। इस इकाई के जरिए लोहे और स्टील के उत्पादन के समय जो मलबा निकलता है, उस रिसाइकल करके लोहा बनाया जाता है।

इन कंपनियों के अलावा कुछ और कंपनियां शामिल हैं, जिनके नाम जल्द ही सामने आने की उम्मीद है।

किस राह पर चल रही है सरकार

डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टमेंट पब्लिक असेट मैनेजमेंट वित्त मंत्रालय के अधीन एक डिपार्टमेंट है। साफ तौर पर कहें तो निवेश और लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग। पहले इसका नाम विनिवेश विभाग होता था। मोदी सरकार ने इस विभाग को नया नाम दे दिया है। अब यही विभाग नए तेवर के साथ देश में विनिवेश के काम में जुटा है। इसी डिपार्टमेंट के सचिव ने एक बातचीत के दौरान कहा, सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी प्राइवेट कंपनियों को बेचकर पैसा जुटाया जाएगा। सरकार रणनीतिक बिक्री के लिए अगले हफ्ते 3 नए प्रस्ताव ला सकती है। बजट में ऐसे उपाय करने की बात कही गई है। शेयर बाजार में लिस्टेड सरकारी कंपनियों में जनता की हिस्सेदारी बढ़ाई जाएगी। इसका मतलब ये है कि ऐसी कंपनियों के ज्यादा से ज्यादा शेयर जनता को बेचे जाएंगे। फिलहाल सरकार कुछ जमीनों की बिक्री के प्रस्ताव लाएगी। इनकी बिक्री पर बाजार की प्रतिक्रिया देखी जाएगी। इसके बाद बिक्री के काम को तेज किया जाएगा। एयर इंडिया को बेचने का ऐलान पहले ही किया जा चुका है। ये काम भी आगे बढ़ाया जाएगा। विनिवेश की प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाने की योजना है। इसके लिए 29 कंपनियों की सूची बनाई जा चुकी है। कुछ कंपनियों की जमीन के साथ बिल्डिंग भी बेची जाएगी। माना जा रहा है कि बीते कुछ दिनों से ऐसे संकेत हैं कि इकोनमी में गिरावट है। साथ ही जीएसटी जैसे टैक्स का कलेक्शन भी सरकार की उम्मीदों के मुताबिक नहीं हो पा रहा है। ऐसे में सरकार को विनिवेश की प्रक्रिया को तेज करना ही होगा। सुत्रों के मुताबिक सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने के लिए मोदी सरकार को बड़ी इच्छाशक्ति भी दिखानी होगी। इस साल 1 लाख करोड़ रुपए जुटाने के लिए तमाम कंपनियों में रणनीतिक हिस्सेदारी और जमीनों को बेचना होगा। बजट में 1.05 लाख करोड़ रुपए विनिवेश से जुटाने का लक्ष्य तय किया गया है। बीते 5 जुलाई को बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (पीएसयू) में अपना निवेश 51 फ़ीसदी से कम करने की घोषणा की थी। इसका आसान शब्दों में मतलब ये हुआ कि अगर 51 फीसदी से कम शेयरहोल्डिंग होगी तो सरकार की मिल्कियत ख़त्म। लेकिन उसी घोषणा में ये बात भी थी कि सरकार सिफऱ् मौजूदा नीति बदलना चाहती है जो फि़लहाल सरकार की 51त्न डारेक्ट होल्डिंग की है। इसे बदलकर डारेक्ट या इनडारेक्ट सरकारी होल्डिंग करना चाहते हैं। एक उदाहरण इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) का लेते हैं। इसमें सरकार की 51.5त्न डारेक्ट होल्डिंग है। इसके अलावा लाइफ़ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (एलआईसी) के 6.5त्न शेयर भी उसमें हैं जो पूरी तरह सरकारी कंपनी है। इसका मतलब आईओसीएल में सरकार की इनडारेक्ट होल्डिंग भी है। तो अगर सरकार आईओसीएल से अपनी डारेक्ट सरकारी होल्डिंग कम करती है तो इनडारेक्ट सरकारी होल्डिंग की वजह से फ़ैसले लेने की ताकत सरकार के हाथ में होगी। लेकिन फिर इसका उद्देश्य क्या है? उद्देश्य तो ये था कि कोई नया निवेशक आए और इन संस्थानों को बदल कर विकास की राह पर लाए। लेकिन कहीं ना कहीं सरकारी हस्तक्षेप की आशंका रहती है। आर्थिक और व्यवसाय जगत के एक बड़े वर्ग का मानना है कि पिछले तीसेक सालों में जिस तरह से सरकारी कंपनियों को बेचा गया है वो विनिवेश था ही नहीं, बल्कि एक सरकारी कंपनी के शेयर्स दूसरी सरकारी कंपनी ने खऱीदे हैं। इससे सरकार का बजट घाटा तो कम हो जाता है लेकिन न तो इससे कंपनी के शेयर होल्डिंग में बहुत फक़ऱ् पड़ता है, न ही कंपनी के काम-काज के तरीक़े बदलकर बेहतर होते हैं। लेकिन विनिवेश की ये प्रक्रिया भी अर्थव्यवस्था की तरह धीमी चल रही है। मोदी सरकार का विनिवेश का इस साल का टारगेट सिफऱ् 16त्न पूरा हो पाया है। टारगेट के 1.05 लाख करोड़ में से कऱीब 17,365 करोड़ रुपए जुटाए जा चुके हैं। एयर इंडिया को बेचने के लिए भी निवेशक की तलाश है। इसमें देरी हो रही है क्योंकि पहले सरकार इसमें 24त्न होल्डिंग रखना चाहती थी लेकिन अब सरकार इसे पूरी तरह बेचने को तैयार है। विनिवेश की धीमी रफ़्तार की वजह इसका विरोध भी है क्योंकि इससे नौकरियां जाने का ख़तरा है। आरएसएस से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ ने भी सरकारी कंपनियों को प्राइवेट कंपनियों को बेचने का विरोध किया है। क्योंकि प्राइवेट कंपनी किसी को भी नौकरी से निकाल सकती है। हालांकि अर्थशास्त्री विवेक कौल कहते हैं कि नौकरी से निकालने का मतलब ये नहीं है कि कर्मचारी सडक़ पर आ जाएंगे। स्टाफ़ को वीआरएस (वोलेंट्री रिटायरमेंट स्कीम) देना पड़ेगा, प्रोविडेंट फण्ड देना पड़ता है और उन्हें ग्रेच्युटी देनी पड़ेगी। पिछली बार एनडीए सरकार ने 1999 से 2004 के बीच भी राजकोषीय घाटा कम करने के लिए विनिवेश का तरीका अपनाया था। तब इसके लिए एक अलग मंत्रालय बनाया गया था। ये कवायद कांग्रेस सरकार की भी रही है लेकिन फि़लहाल वो एनडीए सरकार के क़दम की आलोचना कर रही है।

क्यों बेची जा रही है सरकारी कंपनियां?

भारत का राजकोषीय घाटा 6.45 लाख करोड़ रुपए का है। इसका मतलब ख़र्चा बहुत ज़्यादा और कमाई कम। ख़र्च और कमाई में 6.45 लाख करोड़ का अंतर। तो इससे निपटने के लिए सरकार अपनी कंपनियों का निजीकरण और विनिवेश करके पैसे जुटाती है। मोदी सरकार की कैबिनेट ने 5 कंपनियों के विनिवेश को मंज़ूरी दे दी है। इससे पहले नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने अगस्त में बताया था कि विनिवेश या बिक्री के लिए केंद्र सरकार को 46 कंपनियों की एक लिस्ट दी गई है और कैबिनेट ने इनमें 24 के विनिवेश को मंज़ूरी दे दी है। सरकार का टारगेट है कि इस साल वो ऐसा करके 1.05 लाख करोड़ रुपए कमाएगी।

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