राजनीतिक अस्थिरता

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। अगर सिर्फ राष्ट्रपति शासन वाले हिस्से को अलग कर दें, तो इस समय महाराष्ट्र में जो हो रहा है, वही कुछ महीने पहले कर्नाटक में हुआ था।

विधानसभा चुनाव के बाद स्पष्ट बहुमत के अभाव में पहले नंबर की पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी और तीसरे नंबर की पार्टी को दूसरे नंबर की पार्टी ने समर्थन देकर उसकी सरकार बनवा दी थी। राजनीतिक अस्थिरता जब भी कहीं आती है, तो वह कुछ दिन का असंतुलन नहीं होती, चीजें जब एक बार डगमगाती हैं, तो यह डगमगाहट लंबे समय तक खिंचती है। यही कर्नाटक में हुआ और थोडे अंतराल के बाद दलबदल का सिलसिला शुरू हो गया। ऐसे में, पहले नंबर की पार्टी की सुविधा यह होती है कि वह कम संख्या में विधायकों से पाला बदलवाकर या उनसे इस्तीफा दिलवाकर पलड़ा अपनी तरफ झुका सकती है। कर्नाटक का यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में उस समय आया है, जब हम महाराष्ट्र के गणित में उलझे हैं। कर्नाटक में दलबदल करके भाजपा में जाने वाले कांग्रेस और जनता दल-सेकुलर के विधायकों की तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने दलबदल कानून के तहत न सिर्फ सदस्यता खत्म कर दी थी, बल्कि यह फैसला भी दिया था कि मौजूदा विधानसभा के वजूद तक वे चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। ये विधायक इन दोनों ही फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए। सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित था, इसलिए चुनाव आयोग को खाली हुई सीटों पर उप-चुनाव भी तारीख घोषित करने के बावजूद उसे टालने पड़े। अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि सदस्यता समाप्त करने का फैसला बिल्कुल सही था और यह विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र का मामला है, लेकिन बर्खास्त सदस्य फिर से चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि ऐसी आशंका ज्यादा नहीं है, लेकिन उप-चुनाव के नतीजे सत्ता-संतुलन को बदल भी सकते हैं। खंडित जनादेश के बाद ऐसे हालात से मुक्ति के लिए अगली विधानसभा के गठन का ही इंतजार करना पड़ता है। हालांकि महाराष्ट्र में ऐसा नहीं था। वहां जनता ने भाजपा और शिव सेना गठजोड़ के पक्ष में स्पष्ट जनादेश दिया था। मगर यह गठजोड़ ही सरकार बनाने की खींचतान का शिकार हो गया और राज्य विधानसभा ठीक वहीं पहुंच गई, जहां खंडित जनादेश से बना सदन होता है। महाराष्ट्र के उलझे गणित में सरकार कैसी, किसकी और कितनी टिकाऊ बनेगी, यह हम नहीं जानते।लेकिन जल्द ही वे सारे रास्ते खुलते दिख सकते हैं, जो दलगत राजनीति को निकृष्टतम स्तर पर ले जाते हैं। इस पर मतभेद हो सकता है कि महाराष्ट्र में फिलहाल राष्ट्रपति शासन लगाने की स्थितियां थीं या नहीं, लेकिन जैसी राजनीतिक अस्थिरता वहां है, उसके खतरे भी साफ हैं, और सौदेबाजी की राजनीति का जो दौर वहां शुरू हुआ है, वह जल्द जाने वाला नहीं है। भारत के लोकतंत्र को पूरी दुनिया में एक परिपक्व लोकतंत्र की मान्यता दी जाती है, जिसमें लोग शांतिपूर्ण ढंग से सरकारें बदल दिया करते हैं। मगर दलगत स्तर पर ऐसी कई खामियां हैं, जिनसे लोकतंत्र को मुक्त कराना जरूरी है। इसमें एक खामी राजनीतिक सौदेबाजी और दलबदल है। दलबदल पर जो कानून है, उसकी सीमाएं लगातार सामने आ रही हैं। पूरी व्यवस्था को ऐसा रूप देने की जरूरत है, जिसमें जनादेश हर बार अपनी मूल भावना के साथ जमीन पर उतरता दिखे।

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