कैसे मिले इंसाफ

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। ये सच है कि देश में आज ब्यूरोक्रेसी का पलड़ा सबसे ज्यादा भारी है। और शायद इसीलिए देश के हर कोने में केवल उन्हीं का राज चलता है। इसका ताज़ा उदाहरण पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली में दिखने को मिला, जहां काले कोट बनाम खाकी की लड़ाई कई दिनों से जारी है।

तीस हजारी कोर्ट में वकीलों और पुलिस कर्मियों के बीच भिड़ंत हुई तो दिल्ली पुलिस के जवान इंसाफ मांगने के लिए सडक़ पर उतर आए। अब सुरक्षा देने वाले ही सडक़ों पर उतर कर धरना देने लगे तो जनता की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?अधिकार और जि़म्मेदारी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हमें बतौर एक नागरिक इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। हम चाहे जो कोई भी हों, जहां कहीं भी हों। हमें इस मसले पर बड़े बदलाव करने की ज़रूरत है। हम सब जब क़ानून के दायरे में अपनी जि़म्मेवारियों का निर्वहन करते हैं तो कोई टकराव नहीं होता। लेकिन जब यह दायरा कानून का पालन करने वाले ही तोडऩे लगे तो उन पर अंकुश कौन लगाए?

देश में ऐसा कोई राज्य नहीं है, ऐसा कोई शहर नहीं है, ऐसा कोई गांव नहीं है या ऐसा कोई कस्बा नहीं है, जहां के निवासी ब्यूरोक्रेसी के भ्रष्टतंत्र से परेशान न हों। आए दिन इससे संबंधित खबरों को दबा दिया जाता है वो इसीलिए क्योंकि ब्यूरोक्रेसी पर उंगली उठाने और बोलने का अधिकार बढ़ते भ्रष्टाचार ने हमसे छीन लिया है। रोजमर्रा की जिंदगी में न जाने कितने ही लोगों को खाकी वर्दी की ताकत दिखा कर डराया, धमकाया और बिना वजह परेशान किया जाता है। इनमें ट्रैफिक पुलिस, थाना प्रभारी, समेत उच्च पदों पर पदासीन कई अधिकारी शामिल है। क्योंकि इन अधिकारियों के पास वो ताकत है कि शक़ के बनाम पर ये किसी को भी मौखिक या शारीरिक रूप से प्रताडि़त कर सकते हैं। इसे आम शब्दों में हम मासूम लोगों कि साथ किया गया अमानवीय व्यवहार भी कह सकते हैं। भ्रष्टाचार में लिप्त ये वही पुलिस वाले हैं जो थाने में शिकायत लिखने के लिए भी आपसे पैसे मांगते हैं। ये वही पुलिस वाले हैं जो किसी दुर्घटना स्थल पर देर से पहुंचते हैं।

ये वही पुलिस वाले हैं जो किसी लडक़ी का रेप होने पर पैसे वाले पक्ष का नाम बचाते हैं और लडक़ी का नाम पब्लिक के सामने लाते हैं। आज जब यही पुलिस वाले सडक़ों पर उतर कर अपने लिए इंसाफ मांग रहे हैं, तो आप बताइये किसे दया आनी चाहिए। और शायद इसीलिए आज जनता भी चुप है। यही घटनाएं देश के राजनेताओं के साथ हो तब कहीं जाकर उन्हें ये समझ आए कि देश में बेलगाम ब्यूरोक्रेसी पर अंकुश लगाना कितना जरूरी है। पर न केन्द्र सरकार और न राज्य सरकार ब्यूरोक्रेसी पर अंकुश लगाने की मंशा रखती हैं।

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