मोदी सरकार ने अच्छा प्रदर्शन करके भी खोई अपनी चमक

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आजकल संघ परिवार में चर्चा है कि अगर नरेंद्र मोदी सरकार ने अच्छे काम किए हैं तो फिर इसकी लोकप्रियता वैसी क्यों नजर नहीं आ रही, जैसी 2016 तक थी? आर्थिक विकास और विदेश नीति के मामले में इसका रेकॉर्ड पूर्व सरकार की तुलना में काफी बेहतर है। दुनिया भर में गरीबी को मॉनिटर करने वाली संस्था ‘वर्ल्ड डेटा लैब’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2030 तक भारत में अत्यंत गरीब लगभग नहीं रह जाएंगे। उसके मुताबिक 2018 में भारत में ग्रामीण क्षेत्र में 4.3 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्र में केवल 3.8 प्रतिशत आबादी को गरीब माना जाएगा। ब्रुकिंग्स के ‘फ्यूचर डिवेलपमेंट ब्लॉग’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार सन 2022 तक भारत में अत्यंत गरीब जनसंख्या केवल तीन प्रतिशत रहेगी। संयुक्त राष्ट्र ने भी माना है कि 2030 तक भारत से अत्यंत गरीब आबादी तकरीबन खत्म हो जाएगी। इन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों से जाहिर है कि भारत में विकास हो रहा है और वह नीचे तक पहुंचा है। कम से कम 2013-14 तक तो हम गरीबी के संदर्भ में ऐसी रिपोर्ट की कल्पना नहीं कर सकते थे।

उस समय भारत में गरीबी को लेकर यही संस्थाएं भयावह आकलन पेश करती थीं। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल की अंतिम तिमाही में भारत की विकास दर 4.6 प्रतिशत रह गई थी। अंतिम वर्ष की विकास दर 5.2 प्रतिशत थी। उससे तुलना करें तो नोटबंदी और जीएसटी जैसे अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचाने वाले सुधारों के बावजूद 7.5 प्रतिशत के आसपास विकास की गति काफी बेहतर है। गरीबों को आवास, शौचालय, रसोई गैस, बिजली कनेक्शन से लेकर सड़क निर्माण और यहां तक कि छोटे व्यवसायों के लिए कर्ज के मामले में मोदी सरकार के आंकड़े उसके शानदार प्रदर्शन की पु्ष्टि करते हैं। इसके बावजूद यदि मोदी सरकार की लोकप्रियता में कमी दिख रही है तो इसके कुछ खास कारण होने चाहिए। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। 15 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले के प्राचीर से बलूचिस्तान तथा गिलगित बाल्टिस्तान के लिए केवल एक पंक्ति कही थी। उन्होंने वहां के लोगों को उनको याद करने के लिए धन्यवाद दिया था। इस एक पंक्ति ने लोगों के भीतर स्फुरण पैदा किया। पूरा माहौल ही बदल गया था। भारत के अंदर ही नहीं, दुनिया भर में फैले भारतवंशियों की प्रतिक्रिया अद्‌भुत थी।

यह प्रसंग बताता है कि मोदी से लोगों की उम्मीदें क्या थीं। विकास, भ्रष्टाचार रहित शासन आदि की अपेक्षाएं तो थीं ही, लोग नरेंद्र मोदी से विशेष उम्मीद भी पाले हुए थे। 2014 के चुनाव में देश- विदेश से भारी संख्या में लोग नौकरियों से छुट्टी लेकर, कुछ समय के लिए कारोबार से अलग होकर अपना धन लगाकर अपने-अपने क्षेत्रों में प्रचार के लिए आए थे। मोदी भारतीयों की बहुविध आकांक्षाओं के प्रतीक बनकर उभरे थे। अलग-अलग लोगों की, समूहों की अलग-अलग आकांक्षाएं थीं। इनमें से एक बड़ा वर्ग उनको प्रखर राष्ट्रवाद या हिंदुत्व अभिमुख राष्ट्रवाद का चेहरा मानता था। लाल किले के प्राचीर से अपने आरंभिक तीन भाषणों में उन्होंने इन्हें परोक्ष तौर पर वाणी भी दी। प्रवासी भारतीयों को मोदी के रूप में ऐसा नेता दिखता था जो भारतीय सभ्यता-संस्कृति का डंका बजाने निकल पड़ा हो। लोगों को लगा कि विश्वगुरु का जो सपना महापुरुषों ने देखा था उसे समझने तथा अभिव्यक्त करने वाला नेता मिल गया है। मगर वह प्रखर आवाज मद्धिम होती गई।

प्रधानमंत्री भाषणों में सरकार के कार्यों का आंकड़ा गिनाने लगे हैं, जिसमें दोहराव और नीरसता रहती है। जिन विचारों और मूल्यों के लिए उनकी पहचान बनी थी, उन पर उन्होंने बोलना बंद कर दिया है। बीजेपी वैसे भी सामान्य अर्थों में एक राजनीतिक पार्टी नहीं है। यह पूरे संघ परिवार का एक हिस्सा भर है। इसलिए उसे अपनी नीतियां बनाते समय पूरे परिवार की अपेक्षाओं का ख्याल करना होगा। अगर ऐसा नहीं होगा तो अपने लोग नाराज होंगे या उदासीन। और यही हुआ भी है। अयोध्या मामले को साढ़े चार वर्षों तक याद भी नहीं किया गया। संघ प्रमुख ने हारकर सार्वजनिक बयान दिया, विश्व हिंदू परिषद और साधु-संतों ने आंदोलन शुरू किया, तब भी नहीं। तीन राज्यों में पराजय के बाद भी सरकार कुछ करने को तैयार नहीं दिखी। अंतिम समय में सुप्रीम कोर्ट में गैरविवादित भूमि को वापस करने की याचिका लगाई गई है। समान नागरिक संहिता पर बातें हुई, विधि आयोग ने प्रश्नावली बनाई, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में चला गया। पहले वर्ष में गोहत्या रोकने के लिए एक मॉडल कानून बनाने पर बात हुई थी। कहा गया कि इसका प्रारूप सभी राज्यों को भेजा गया है मगर यह अध्याय बंद हो गया। बलूचिस्तान पर प्रधानमंत्री के भाषण के बाद कई लोग उत्साह से सक्रिय हुए। काफी निर्वासित बलूचिस्तानी भारत आए पर यह मुद्दा छोड़ दिया गया। सरकारी, अर्धसरकारी और स्वायत्त संस्थानों में ऐसे लोगों की भी नियुक्तियां हुईं जिनकी विचारधारा, ईमानदारी, निष्ठा, काबिलियत प्रमाणित नहीं थी। इनमें से अनेक के व्यवहार से संगठन परिवार के कार्यकर्ता नाराज हैं।

जाहिर है कि इन सब कारणों से मोदी सरकार की लोकप्रियता कायम रहना संभव नहीं। वाजपेयी सरकार के समय भी लगभग यही स्थिति थी। 2004 की पराजय में परिवार की ही मुख्य भूमिका थी। चूंकि संगठन ने वाजपेयी सरकार की पराजय के बाद यूपीए सरकार की ज्यादतियां झेली हैं। भगवा आतंकवाद, हिंदू आतंकवाद के नाम पर प्रताड़ना और भय का मंजर देखा है, इसलिए वह मोदी को हराना नहीं चाहता। मगर 2014 की तरह काम करने की प्रेरणा पैदा होना कठिन है। दरअसल जब आप बहुत ज्यादा उम्मीदें पैदा कर देते हैं और उन्हें पूरा नहीं कर पाते तो यह अंतत: आपके लिए ही घातक साबित होता है।

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