अयोध्या के फैसले से सभी संतुष्ट होंगे : श्रीश्री रविशंकर

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श्री श्री एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में बेंगलूरु, (परिवर्तन)। अयोध्या विवाद पर ४० दिन तक चली लंबी सुनवाई के पश्चात, सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की पीठ ने १६ अक्टूबर को होने वाली अंतिम सुनवाई पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है और यह संभावना है कि १६ नवंबर से पहले निर्णय सुना दिया जाएगा। इसी दिन सीजेआई गोगोई सेवानिवृत्त हो जाएंगे।

यह सदैव से चिंता का विषय था कि न्यायालय के द्वारा लिया गया कोई भी फैसला दोनों पक्षों की सोच को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखेगा या नहीं और परिणामस्वरूप दोनों समुदायों के बीच तनाव का कारण तो नहीं बन जाएगा। हाल ही में एक राजनेता ने त्यौहार के अवसर पर लोगों को आभूषण खरीदने के बजाय तलवारें खरीदने के लिए कहा, इस प्रकार के मामले भी उठ सकते हैं।

जहां देश एक ओर सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा है, वहीं एक बड़ी संभावना यह भी हो सकती है कि समाधान एक अन्य पक्ष की ओर से आए और वह पक्ष है, मध्यस्थ पैनल। यह पैनल एक विकल्प है, जिस पर बहुत बड़ी संख्या में भारत के लोग आशाएं लगाकर बैठे हुए हैं। यदि मध्यस्थता में किए गए प्रयासों के कारण कोई निर्णय होता है, तो यह खुशमिजाजी और सामुदायिक भाईचारे के लिए एक ऐतिहासिक सबक होगा, जो उस बात की ओर संकेत करेगा कि भारत परिपक्व एकजुट लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है। आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक एवं सुविख्यात संत श्री श्री रविशंकर का मानना है कि अयोध्या मामले पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से सभी संतुष्ट होंगे।

इस वर्ष ८ मार्च को सर्वोच्च न्यायालय ने तीन सदस्यों वाले मध्यस्थ पैनल का गठन किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज एफएम कलीफुल्ला, आध्यात्मिक नेतृत्वकर्ता श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू शामिल थे।

यदि मध्यस्थता सफल हो गई, तो भारत श्री श्री रविशंकर का बहुत - बहुत धन्यवादी होगा। लोगों को आध्यात्मिक नेतृत्वकर्ता के अथक प्रयासों के द्वारा एक कड़े संदेहवाद के बावजूद, एक मैत्रीपूर्ण समझौते की आशा है, जिसके बारे में जनता में इस मुद्दे पर खुलकर बातचीत हुई है। श्री श्री ने २०१७ से २०१८ की अवधि में, मध्यस्थता पैनल में नियुक्त होने से बहुत पहले, इस मामले में तीनों पक्षों के प्रत्येक हितधारक से मिले और विचार - विमर्श किया, क्योंकि वे इस मामले को लेकर चिंतित है और उन्होंने न्यायालय के बाहर समझौते की संभावना के लिए मूलभूत आधार तैयार किया। मीडिया की बहुत कड़ी नजर होने के बावजूद, वह विवादित जगह पर कई बार गए। अन्य समय पर मुस्लिम नेता उनके बैंगलोर स्थित आश्रम में उनसे मिले। वह वागियों से मिलने के लिए उत्तर प्रदेश भी गए।

मध्यस्थता पैनल में नियुक्त किए जाने से पहले, श्री श्री ही एकमात्र आवाज़ थे, जिन्होंने दशकों पहले झगड़े के मैत्रीपूर्ण समझौते के मुद्दे को सार्वजनिक तौर पर उठाया। उन्होंने २००३ में एक शांति प्रस्ताव रखा, जो श्रृद्धा और करुणा के आधारभूत सिद्धांतों पर आधारित था। यह एक ऐसा फॉर्मूला था, तो १६ वर्ष के पश्चात अब काम करेगा।

२०१७ के अंत में, श्री श्री ने अयोध्या में चिंताशील वादियों के बीच विवादित जगह को लेकर एक आम सहमति को बनाया, जिससे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय, जो पूर्ण रूप से कानूनी  होता, के बजाय मध्यस्थता प्रक्रिया में अपनी श्रद्धा और विश्वास को ठीक माना।

यह मामला लगातार चाहे कितना भी चुनौतीपूर्ण क्यों ना रहा हो,लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है कि आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने लगातार चलने वाले,सामुदायिक और तनावपूर्ण झगड़ों में हस्तक्षेप करके एक महत्वपूर्ण सफलता पाई हो।मानवतावादी नेतृत्वकर्ता श्री श्री ने वैश्विक स्तर पर भी गठबंधन और लगातार बातचीत से आम सहमति का निर्माण करके विवादित मुद्दों को सुलझाया है।

कश्मीर में सम्पूर्ण राज्य में बंद होने के बावजूद,उन्होंने १२००० कश्मीरियों को शांति का संदेश देते हुए संबोधित किया। इस सभा में जीवन के हर एक स्तर का कश्मीरी व्यक्ति मौजूद था, जिनमें मुख्यत: महिलाएं थीं। श्री श्री उत्तर पूर्व के सात राज्यों के ६७ विद्रोहियों के समूह को एक मंच पर एकसाथ लेकर आए, जिन्होंने सुलह और विकास के लिए एक नया अध्याय आरंभ करते हुए, गुवाहाटी घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। वह कोलंबिया के घरेलू विवाद में भी मध्यस्थता की, जहां शांति और न्याय के बीच संतुलन की आवश्यकता थी। वहां उन्हें फार्क विद्रोहियों को गांधी के अहिंसा के सिद्धांत को रणनीतिक रूप से लागू करने के लिए समझाने के लिए जाना जाता है। इसके लिए उन्हें कोलंबिया के सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया। श्री श्री रविशंकर विवाद के समय पर भी राजनैतिक गहमागहमी के बावजूद बातचीत से हल निकालने के लिए कहते हैं।

१० नवंबर, २०१७ को श्री श्री रविशंकर ने पैग़ाम - ए - मुहब्बत का आयोजन किया, जो शहीद हुए सुरक्षा के जवानों, गोलीबारी की घटनाओं में पीड़ितों और मारे गए आतंकवादियों के परिवारजनों के लिए बैंगलोर में आयोजित एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था। यह कार्यक्रम २०० परिवारों, जिन्होंने घाटी में हिंसा के दौरान अपने प्रियजनों को खोया था, को शांति फैलाने हेतु एक मंच पर एक साथ लेकर आया।

उत्तरपूर्व में, श्री श्री ने विद्रोही समूहों के ७०० गुरिल्ला लड़ाकों को मुख्यधारा में लाने के लिए मुख्य भूमिका निभाई। इन लड़ाकों ने २०१३ में बैंगलोर में एक महीने का पुनर्वास प्रशिक्षण प्राप्त किया। आज वे सामान्य जीवन जी रहे हैं। उनमें से कुछ किसान हैं और कुछ अन्य लोगों ने सहकारिता आरम्भ की है। इसी प्रकार से, २०१७ में मणिपुर में ६८ हथियारबंद विद्रोहियों ने अपने हथियार डाल दिए और अब उन्हें संस्थान की ओर से पुनर्वास के लिए सहायता प्रदान की जा रही है।

सीरिया और इराक़ के अत्यंत तनावपूर्ण क्षेत्रों में, श्री श्री का संस्थान अकल्पनीय हिंसा से पीड़ित लोगों के लिए मानसिक आघात से राहत और पुनर्वास प्रदान कर रहा है।यह संस्थान उन क्षेत्रों में कार्य कर रहा है, जहां किसी भी मानवतावादी संस्थान का कार्य करना बहुत कठिन है। आर्ट ऑफ लिविंग के स्वयंसेवक येजिदी समुदाय के लोगों के साथ भी काम कर रहे हैं, जो इराक़ में एक अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय है। इस समुदाय ने आईएसआईएस द्वारा किए गए नरसंहार और उत्पीड़न का सामना किया।

श्री श्री २००८ में,इराक़ संकट के दौरान सभी पक्षों (अन्य के अलावा शिया,सुन्नी और कुर्द) से भी मिले। वह विश्व के ऐसे बहुत कम नेतृत्वकर्ताओं में से एक हैं, जिन्होंने संकट की इस घड़ी में भी साहस दिखाया। उन्होंने तीन बार इराक़ की यात्रा की और वह एकमात्र ऐसे भारतीय नेतृत्वकर्ता हैं, जिन्हें इराक़ के प्रधानमंत्री ने विवाद से क्षत - विक्षत देश की यात्रा करने का निमंत्रण दिया।

श्री श्री का दृष्टिकोण यह रहा है कि उनके द्वारा दी गई शिक्षा को ध्यान में रखकर सामाजिक उत्थान किया जाए,जिसे वह "गतिशीलता के साथ शांति" कहते हैं। पूर्व इराक़ी प्रधानमंत्री, नूरी - अल - मलिकी, श्री श्री के बारे में कहते हैं, "बहुत बड़ी शक्तियां हैं, जो बड़ी हो सकती हैं, लेकिन वे लोगों के दिलों और मन को नहीं जोड़ सकती हैं। यह कार्य केवल एक आध्यात्मिक नेतृत्वकर्ता के द्वारा ही किया जा सकता है।"

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