जिद की राजनीति

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

महाराष्ट्र में सत्ता साझा करने को लेकर भले ही शिवसेना के तेवर तल्ख हैं पर बीजेपी को उम्मीद है कि वह सरकार में शामिल होने के लिए राजी हो जाएगी। महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर गतिरोध जारी है। इसका मतलब यह है कि शिवसेना अपनी जिद छोड़ने और भाजपा उसे मनाने के लिए तैयार नहीं। अब तो भगवान ही जानें आगे क्या होगा, लेकिन शिवसेना की ओर से सरकार बनाने लायक बहुमत का दावा किया जाना यही संकेत कर रहा है कि महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरण बदल भी सकते हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस के नेताओं की ओर से भी ऐसे बयान आने लगे हैं कि उन्हें शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाने में कोई परहेज नहीं। इन दलों का यह रवैया कोई गुल खिला सकता है।

हालांकि शिवसेना की न तो राजनीति व विचारधारा कांग्रेस से मेल खाती है और न ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से, लेकिन उसकी ओर से सत्ता के लिए मनमाफिक तर्क खोजे जा सकते हैं। वैसे भी राजनीतिक दलों के लिए पाला और रवैया बदलना बाएं हाथ का खेल है। वे अपनी सुविधा के लिए नए-अनोखे तर्क गढ़ने में माहिर हो गए हैं। वास्तव में इसी कारण अपने देश में गठबंधन बनते और बिगड़ते ही रहते हैं। ऐसा न जाने कितनी बार हो चुका है जब एक-दूसरे के कट्टर विरोधी राजनीतिक दलों ने आपस में हाथ मिलाया। ऐसा करते हुए वे एक साथ जीने-मरने जैसी कसमें खाते हैं, लेकिन कई बार उनका साथ चुनाव नतीजे आते ही खत्म हो जाता है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन का बनना और बिगड़ना इसका हालिया उदाहरण है।

कहना कठिन है कि महाराष्ट्र में क्या होगा, लेकिन यह ध्यान रहे कि भाजपा और शिवसेना के बीच तनातनी नई नहीं है। फिलहाल शिवसेना की ओर से भाजपा के खिलाफ जैसे तेवर दिखाए जा रहे हैं, वैसे पहले भी दिखाए जा चुके हैं। सच तो यह है कि अभी शिवसेना की ओर से भाजपा को वैसी जली-कटी नहीं सुनाई जा रही, जैसी लोकसभा चुनाव के पहले सुनाई जा रही थी। शिवसेना नेता भाजपा के प्रति आक्रामकता दिखाने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन उन्हें यह याद रहे तो बेहतर कि जिद के रास्ते पर जरूरत से ज्यादा आगे जाने पर पीछे लौटना मुश्किल हो सकता है। यह मुश्किल शिवसेना की जगहंसाई का कारण ही बनेगी। और जहां तक बात कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेताओं की बात है तो उनको भी यह याद रखना चाहिए कि शिवसेना का साथ उन्हें सत्ता तो दिला देगा, लेकिन वह उनकी साख को गिराने का काम करेगा। दूसरी ओर भाजपा सत्ता की लालच में आंखों पर पट्टी लगाई बैठी है। भाजपा नेताओं को यकीन है कि आने वाले दिनों में समाकरण बदलेंगे और वे फिर से महाराष्ट्र में सरकार बनाएंगे। खैर जो भी हो, इसमें दोराय नहीं कि शिवसेना की जिद महाराष्ट्र को ऐसे रास्ते की ओर ले जा रही है, जो राजनीतिक अस्थिरता से घिरा ही दिखता है। और अगर शिवसेना ने एनसीपी व कांग्रेस से हाथ मिला लिया तो भी वे महाराष्ट्र को स्थिर सरकार देने में असफल साबित होंगे। 

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