महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का जुड़ता-टूटता गठबंधन

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। आने वाले कुछ दिनों के अंदर महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में सबकी नज़रें भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के गठबंधन पर है। वो इसीलिए क्योंकि समय समय पर दोनों ही पार्टियों ने चुनावी फायदों एवं सत्ता की सेज के लिए एक दूसरे का समर्थन किया है। यही कारण है कि आज पूरे देश की निगाहें इनके जुड़ते - टूटते गठबंधन पर है। जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी देश की एक सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है वहीं मुंबई का एक मध्यम वर्गीय इलाक़ा परेल शिव सेना का गढ़ है। भाजपा का इतिहास भी काफी पुराना है और बीते एक दशक में भाजपा एक मजबूत पार्टी बनने में सफल रही है। यूं तो पार्टी ने देश भर में अपने कार्यों का ढंका बजाया है लेकिन महाराष्ट्र की क्षेत्रिय पार्टी यानी शिवसेना को टक्कर देने में कई बार नाकाम साबित हुई है। महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए भाजपा ने अक्सर क्षेत्रिय पार्टियों के साथ समझौता किया है, जिनमें शिवसेना प्रमुख है। अब आने वाले विधानसभा चुनाव में यह देखना रोमांचक होगा कि भाजपा और शिवसेना में यह जुड़ता - टूटता गठबंधन बना रहता है या फिर कोई नया समीकरण बनता है।

शिवसेना के कार्यों का लेखा-जोखा

पार्टी की शाखा के प्रमुख सुनील गौकर के अनुसार 1966 में स्थापित हुई पार्टी की पहली शाखा है। गौकर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। वहां मौजूद सभी फरियादी हैं। गौकर कहते हैं, "यहाँ लोग स्कूल में एडमिशन से लेकर अस्पताल में मरीज़ों को खून देने तक, सभी तरह की ज़रुरत वाले लोग आते हैं। हमसे जहाँ तक संभव होता है हम उनकी मदद करते हैं।" शिवसेना केवल एक राजनितिक पार्टी ही नहीं है। इसकी जड़ें समाज में गहरी हैं क्योंकि इसकी शाखाओं में आम लोगों की मदद करने की कोशिश की जाती है। ये मुंबई और महाराष्ट्र की अपनी पार्टी है। कभी हिंदुत्व विचारधारा पर आधारित शिव सेना समान विचारधारा वाली भारतीय जनता पार्टी से बड़ी पार्टी मानी जाती थी लेकिन अब बीजेपी हर तरह से शिव सेना का बड़ा भाई बन चुका है।

किसको किसकी जरूरत

क्या बीजेपी को आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना से साझीदारी की ज़रुरत है? पार्टी के बुलंद आत्मविश्वास के परिपेक्ष में ये सवाल ख़ुद पार्टी के अंदर कुछ लोग उठा रहे हैं लेकिन फ़िलहाल दबे शब्दों में। ये सवाल खास तौर से एक ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब बीजेपी और शिवसेना के बीच गठबंधन को लेकर तनातनी कई दिनों से चल रही है। बीजेपी के नेता माधव भंडारी के अनुसार पार्टी में "युति" (गठबंधन) को लेकर हमेशा से दो राय रही है लेकिन शिवसेना से उनका दार्शनिक और वैचारिक रिश्ता रहा है। "शिवसेना हमारी सब से पुरानी भागीदार पार्टी है। सीट शेयरिंग से बढ़ कर हमारा संबंध दार्शनिक और वैचारिक है"  इस में कोई संदेह नहीं कि महाराष्ट्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में आज कहीं ज़्यादा है। कम से कम इस साल हुए आम चुनाव के नतीजों से ऐसा ही लगता है। बीजेपी को महाराष्ट्र की 48 सीटों में से 25 सीटें मिलीं।

पार्टी में कुछ ऐसे लोग हैं जो समझते हैं कि चुनाव जीतने के लिए बीजेपी को किसी गठबंधन की ज़रुरत नहीं, पार्टी के सूत्रों का दावा है कि इस बार चुनाव में इसे 160 से अधिक सीटें हासिल हो सकती हैं। सूत्रों के अनुसार अगर पार्टी शिवसेना से गठबंधन करती है तो इसका फायदा ये होगा कि एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन 30-35 सीटों पर सिकुड़ कर रह जाएगा।

महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टी है शिवसेना

साधारण गणित के अनुसार 288 सीटों वाले महाराष्ट्र विधानसभा में 145 सीटें जीतने वाली पार्टी सरकार बनाने का दावा कर सकती है। पिछले चुनाव में बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ते हुए 122 सीटें जीतीं थीं, जो बहुमत के निशान से थोड़ा ही कम थी। इससे काफ़ी फ़ासले पर दूसरे नंबर पर खड़ी शिव सेना को 63 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। दूसरे शब्दों में, विजय चोरमरे के अनुसार, बीजेपी का स्ट्राइक रेट शिव सेना से काफ़ी बेहतर था। बीजेपी ने 260 सीटों पर उमीदवार खड़ा कर के 122 सीटें जीतीं जबकि शिव सेना ने 282 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद केवल 63 सीटें हासिल कीं। बहुमत से कुछ कम सीटें हासिल करने के बावजूद 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पहले अल्पसंख्यक सरकार गठित की जिसे एनसीपी ने बाहर से समर्थन दिया था। बाद में शिवसेना सरकार में शामिल हो गई।शिवसेना बीजेपी से सौदेबाजी करने में जुटी ज़रूर है लेकिन उसे अपनी बेबसी का एहसास ज़रूर हो रहा होगा। परेल शाखा में मौजूद शिवसेना के सदस्यों का मानना था कि पार्टी के पास अब विकल्प कम हैं। गौकर कहते हैं, "हम बीजेपी के साथ सहज नहीं हैं, लेकिन हमारी मजबूरी है कि हमें उनके साथ चुनाव लड़ना पड़ेगा।" 

बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता और चुनावी कामयाबी

बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता और चुनावी कामयाबी से शिवसेना के सदस्यों में नाराज़गी भी है और जलन भी। लेकिन साथ ही उन्हें इस बात का एहसास भी कि इस समय बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना ही अकलमंदी है। बीजेपी के सूत्र कहते हैं कि "शिवसेना की मानसिकता सत्ता में रह कर भी विपक्ष की है। इसकी ये सब से बड़ी कमी है लेकिन शिवसेना को अब हमारी ताक़त का अंदाज़ा हो गया है।" पिछले पांच सालों में गठबंधन की सरकार में शामिल होने के बावजूद शिव सेना ने बीजेपी की कई बार आलोचना की है। कभी तो ऐसा भी लगा कि राज्य में सब से बड़ा विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी नहीं, बल्कि शिव सेना है। इनके बीच तनाव बढ़ाने का काम विपक्षी दलों ने भी किया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता विद्या चौहान कहती हैं कि उनकी पार्टी ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की ताक़त को कमज़ोर करने के लिए ये सुनिश्चित किया है कि शिवसेना-बीजेपी में फासले बढ़ते जाएँ, वे कहती हैं, "भाजपा-शिव सेना में झगड़ा लगाने का काम हमने किया, हमारी कोशिश थी ये एक दूसरे के साथ नहीं रह सकें और ऐसा ही होता नज़र आता है।" कुछ विश्लेषकों के मुताबिक़ शिवसेना ने चुनावों के दौरान अपने गढ़ पर बीजेपी का कब्जा होते देखा है जो पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे के लिए बहुत निराशाजनक है। इसका इज़हार पिछले कुछ सालों में शिव सेना द्वारा बीजेपी पर करारी आलोचना के दौरान हुआ।

1989 में पहली बार हुआ था दोनों दलों का गठजोड़

शिवसेना भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी है। दोनों दलों के बीच पहली बार साल 1989 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में गठबंधन हुआ था। इसके बाद से विधानसभा और लोकसभा के सभी चुनाव दोनों दलों ने मिलकर लड़े। दोनों ने साल 1995 में मिलकर सरकार बनाई थी। इसमें शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने थे लेकिन यह दोस्ती साल 2014 में सीटों के बंटवारे को लेकर टूट गई। तब भाजपा की ताकत महाराष्ट्र समेत पूरे देश में बढ़ रही थी और पार्टी मोदी लहर के बल पर महाराष्ट्र चुनाव भी जीतना चाहती थी।

पिछला चुनाव अलग लड़ा पर मिलकर बनाई सरकार

साल 2014 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। भाजपा को 122 जबकि शिवसेना को 63 सीटें मिलीं। पूर्ण बहुमत से 20 सीट दूर रहने की वजह से भाजपा ने शिवसेना की मदद से सरकार बनाई। दोनों के बीच तनावपूर्ण संबंध साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कुछ सामान्य हुए जब दोनों पार्टियों ने राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से 24-24 सीटें बांटने का फैसला किया। तब विधानसभा चुनाव में भी बराबर सीटें लड़ने पर बात हुई थी लेकिन भाजपा के दबाव के आगे इस बार शिवसेना को झुकना पड़ा।

कैसे बदली क़िस्मत

साल 1995 में हुए विधानसभा चुनाव में शिव सेना-बीजेपी गठबंधन में शिव सेना बड़ा भाई था। इसने मैदान में 169 उमीदवार उतारे थे और इसने 73 सीटें जीती थीं। बीजेपी को शिव सेना ने केवल 116 सीटें दी थीं जिनमे से इसने 65 पर जीत हासिल की। परेल शाखा में मौजूद पार्टी के एक सदस्य ने कहा, "हमारा दल आज बीजेपी का एक छोटा भाई बनकर रह गया है।" पिछले चुनावों में जो क्षेत्र कभी शिव सेना का गढ़ होते थे आज वहां बीजेपी छा गई है। वो नगर पालिकाएं और पंचायतें जहाँ कभी शिव सेना के उम्मीदवार जीतते थे आज वहां बीजेपी के लोग चुन कर आए हैं।" इन दिनों शिव सेना और बीजेपी के बीच गठबंधन पर ज़ोर-शोर से बातचीत जारी है लेकिन ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं कि 2014 की तरह इस बार भी दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ें। सूत्रों के अनुसार शिव सेना को बीजेपी ने केवल 106 सीटें ऑफर की हैं जो इसे स्वीकार नहीं। स्थानीय मीडिया के अनुसार इस साल हुए आम चुनाव से पहले हुई एक मीटिंग में दोनों पार्टियों के बीच सीटों की बराबर संख्या पर समझौता हुआ था और शिव सेना का ज़ोर है कि बीजेपी इस समझौते पर अमल करे। लेकिन बीजेपी के सूत्र कहते हैं कि बीजेपी एक बड़ी पार्टी है और पिछले चुनाव से भी अधिक सीटें जीतने की क्षमता रखती है।

बीजेपी के पक्ष में कई बातें हैं। पहला ये कि जो नेता कांग्रेस पार्टी और एनसीपी से बाहर हो रहे हैं उन में से अधिकतर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं, जिससे पार्टी का मनोबल आसमान को छू रहा है। एनसीपी के नेता गणेश नाइक और कांग्रेस नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री हर्षवर्धन पाटिल 11 सितंबर को भाजपा में शामिल हो गए। कुछ विशेषज्ञ ये भी जताते हैं कि बीजेपी उन्हीं नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करती है जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं और जो अपने साथ अपने कार्यकर्ताओं को भी ले आते हैं। लेकिन एनसीपी की प्रवक्ता विद्या चौहान कहती हैं कि राज्य में बीजेपी के मज़बूत होने के पीछे जो कारण हैं उन से बीजेपी को खुश नहीं होना चाहिए, "बीजेपी मज़बूत इसलिए है क्योंकि उनके पास ईवीएम हैं; उनके पास पैसा बहुत है। दबंगों की फ़ौज उनके पास है।" बीजेपी के प्रवक्ता माधव भंडारी इस इलज़ाम को ठुकराते हुए मुख्यमंत्री फडणवीस की पांच साल की साफ़ सुथरी सरकार की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि उनकी सरकार का रिकॉर्ड सब के सामने है।

लेकिन आम राय ये है कि महाराष्ट्र में बीजेपी एक बढ़ती ताक़त है जिसे रोकना आसान नहीं होगा, लेकिन पत्रकार विजय चोरमरे बीजेपी को होशियार करना चाहते हैं, "बीजेपी के एक पूर्व विधायक एनसीपी में शामिल हो गया है। अगर कांग्रेस और एनसीपी के लोगों को बीजेपी में स्थान दिया जाएगा, उन्हें टिकट दिया जाएगा तो बीजेपी में सालों से इंतज़ार कर रहे लोग पार्टी का ढोल थोड़े ही बजाएंगे, वो पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टियों में जाएंगे।" यही आशा एनसीपी और कांग्रेस पार्टी को है। इन पार्टियों के कुछ नेताओं ने दावा किया है कि एक बार चुनाव की तारिख आ जाए और बीजेपी-शिवसेना अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर कर दें तो इन पार्टियों में जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा वो एनसीपी और कांग्रेस में शामिल ज़रूर होंगे। एनसीपी के एक नेता नवाब मालिक ने कहा, हमारा ख्याल है कि जब टिकेटों का बंटवारा हो जाएगा तो बीजेपी और शिवसेना में विद्रोह होगा, वो लोग जो सालों से टिकट का इंतज़ार कर रहे हैं वो हमारे पास आएंगे। कुछ लोग तो हमारे संपर्क में भी हैं।

क्या दोहरेगा 2014 का इतिहास

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए तारीख़ों का एलान हो चुका है। 288 सीटों वाले महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में मत 21 अक्तूबर को डाले जाएंगे, जबकि मतों की गिनती 24 अक्तूबर को होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसे विपक्षी दल बीजेपी और शिवसेना को चुनौती देंगे या फिर पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव परिणामों की तरह ही महाराष्ट्र विधानसभा के भी नतीजे देखने को मिलेंगे। क्या बीजेपी और शिवसेना अपना प्रदर्शन दोहरा पाएंगी या सालों से महाराष्ट्र की सत्ता में रही कांग्रेस-एनसीपी इस बार चूकेंगी नहीं। साल 2014 में दिल्ली में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली 'एनडीए' की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद वही प्रभाव छह महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था। महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व में सरकार बनी और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने।

हालांकि बीजेपी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला लेकिन उसने शिवसेना के साथ गठबंधन करके सरकार तो बना ही ली। वैसे चुनावों से पहले ही सीटों के बंटवारे को चलते 25 साल पुराना शिवसेना-बीजेपी का गठबंधन टूट चुका था। दोनों पार्टियों ने स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़ा था। लेकिन चुनाव के बाद तीन महीनों में ही शिवसेना ने, जिसके 63 विधायक चुन कर आए थे बीजेपी से समझौता कर लिया और वह सरकार में शामिल हो गई। इससे पहले सिर्फ़ 1995 में शिवसेना-बीजेपी की सरकार महाराष्ट्र में बन सकी थी, जो राज्य की पहली ग़ैर-कांग्रेसी सरकार थी। इससे पहले महाराष्ट्र में साल 1999 से 2014 तक, यानी 15 साल तक कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की ही सरकार रही। लेकिन 2014 में बीजेपी के मुकाबले वो पीछे रह गईं।

बीते पांच सालों में क्या हुआ?

शिवसेना-बीजेपी के गठबंधन से महाराष्ट्र में सरकार तो बनी लेकिन ये दोनों दल हमेशा आपसी झगड़ों की वजह से सुर्खियों में रहे। शिवसेना सत्ता में शामिल रही मगर बीजेपी की राजनैतिक और आर्थिक नीतियों के ख़िलाफ़ हमेशा आक्रामक रही, जितना शायद विपक्षी दल भी नहीं हैं। चाहे वह नोटबंदी का फ़ैसला हो या फिर मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन लाने का निर्णय या फिर मुंबई मेट्रो के आरे कारशेड का विरोध, शिवसेना कई बार बीजेपी के विरोध में दिखाई दी। पिछले पांच सालों में राज्य में हुए लगभग सभी चुनावों में बीजेपी और शिवसेना ने जीत हासिल की। पंचायत के चुनाव हों, या फिर नगरपालिका और महानगरपालिका के चुनाव, शिवसेना-बीजेपी ने स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़े. लेकिन विपक्षी दलों को मौका नहीं मिला। मुंबई महानगपालिका में दोनों का कड़ा मुक़ाबला हुआ। ऐसा लगा कि सालों से सत्ता में रही शिवसेना की मुंबई की सत्ता चली जाएगी। मगर शिवसेना के 2 पार्षद ज़्यादा चुन कर आ गए और मुंबई उन्हीं के हाथों में रह गयी। हालांकि, इन झगड़ों के बावजूद शिवसेना सरकार में बनी रही। सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे और उससे राजनीतिक उथल-पुथल भी मची। सरकार में नंबर दो रहे और राज्य में बीजेपी के वरिष्ठ नेता एकनाथ खडसे को ज़मीन घोटाले के आरोपों के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा। पंकजा मुंडे, विनोद तावडे़ जैसे मंत्रियों पर भी विपक्षी दलों ने आरोप लगाए, मगर उनकी कुर्सी बनी रही।

मराठा आरक्षण आंदोलन, किसान आंदोलन और भीमा कोरेगांव

महाराष्ट्र की बीजेपी-शिवसेना सरकार की असली परीक्षा तब हुई जब इन पांच सालों में मराठा आरक्षण के मुद्दे को लेकर जनआंदोलन हुए। महाराष्ट्र की आबादी में मराठाओं की संख्या सबसे अधिक है। मराठा लंबे समय से ओबीसी आरक्षण की मांग कर रहे हैं। लाखों लोग सड़कों पर उतरे, कुछ जगह हिंसा भी भड़की और आत्महत्या भी हुई। आखिरकार सरकार को आरक्षण की मांग मंजूर करनी पड़ी। सरकार ने मराठाओं को आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ा घोषित करते हुए 18 फ़ीसदी आरक्षण दिया। उच्च न्यायालय ने भी यह आरक्षण बरकरार रखा।

इस सरकार के कार्यकाल में बडे़ किसान आंदोलन भी हुए। दबाव में आकर राज्य सरकार को किसानों के कर्ज़ माफ़ी की घोषणा करनी पडी। हालांकि आरोप है कि योजना किसानों तक पहुंच नहीं रही। राज्य सरकार पर सबसे अधिक दबाव तब बना जब 1 जनवरी 2018 को पुणे के नजदीक भीमा-कोरेगांव में हज़ारों दलित कार्यकर्ता एकजुट हुए। ये एक ऐतिहासिक युद्ध के 200 साल पूरे होने का जश्न था। लेकिन वहां हिंसा भड़की। पत्थरबाजी और आगजनी में काफ़ी नुकसान हुआ।

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