'ट्रैफ़िक टेरर' से जनता परेशान

Total Views : 225
Zoom In Zoom Out Read Later Print

बेंगलूरु, (परिवर्तन)। अपनी जनता इन दिनों बहुत परेशान है। या तो वे 'प्रदूषण कंट्रोल' वाले के यहां चार-पाँच पांच घंटे लाइन में खड़ी हैं या फिर कहीं ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने या रिन्यू कराने में लगे है। कारों की बिक्री में गिरावट भले हो। इकोनॉमी नाक के बल भले खड़ी हो लेकिन हेलमेट का बाज़ार गर्म हो गया है। कहीं कोई हेलमेट ख़रीद रहा है तो कोई कार की पेटी कसवा रहा है। कहीं कोई अपनी आरसी खोज रहा है तो कोई नंबर प्लेट ठीक करा रहा है और कोई लाइटें ठीक करा रहा है। कोई सोचता है, अपनी गाड़ी तो जी का जंजाल है कोई कहता है अपनी गाड़ी क्यों ख़रीदूं और फिर ट्रैफ़िक पुलिस से ख़ौफ़ खाऊं? क्या पता किस बात पर चालान कर दे? क्यों न ओला-ऊबर से काम चलाऊं।

नए ट्रैफ़िक क़ानून को लागू करने वालों को कौन समझाए कि एक तो कार बाज़ार बैठा हुआ था और इस एक्ट ने उसे और ठंडा कर दिया. कर लो इकोनॉमी का इलाज! जब से नया ट्रैफ़िक क़ानून लागू हुआ है तब से जनता ने सड़क पर निकलना बंद कर दिया कि कहीं कोई ट्रैफ़िक पुलिस वाला 10-20 हज़ार का ज़ुर्माना न ठोक दे। कई लोगों ने इसे 'ट्रैफ़िक टेरर' कह रहे हैं। ट्रैफ़िक वाले वाक़ई 'टेरिफ़िक' नज़र आ रहे हैं। नए मोटर व्हीकल क़ानून के लागू होने के बाद अब यातायात नियमों के उल्लंघन पर दस गुना तक जुर्माना लगाया जा रहा है। यातायात के नियमों का उल्लंघन करने वाले कई वाहन चालकों को बीते दो हफ़्ते के दौरान इस नए क़ानून के तहत 500 सौ से लेकर 2 लाख रुपये तक का चालान भरना पड़ा है। चाहे लाल बत्ती का उल्लंघन हो या बिना हेलमेट के स्कूटर/बाइक चलाना या रॉन्ग साइड ड्राइव करना या रैश ड्राइव करना या शराब पी कर गाड़ी चलाना या एंबुलेंस को रास्ता न देना, सड़क पर यातायात के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए पकड़े जाने पर बहुत कम राशि देकर छूट जाने और ऐसे उल्लंघनों की संख्या में लगातार वृद्धि के साथ ही सड़क दुर्घटना के मामलों में बढ़ोतरी की वजह से केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का परिवहन मंत्रालय ट्रैफिक नियम को तोड़ने पर भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान लेकर आया है। यातायात नियमों के उल्लंघन पर पहली बार क़ानून 1988 में बना था लेकिन उसमें जुर्माने के तौर पर बहुत अधिक रकम नहीं ली जाती थी। अब नए मोटर व्हीकल क़ानून के तहत यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने की राशि कई गुना बढ़ा दी गई है। केंद्र का बनाया यह क़ानून राज्यों पर भी लागू होता है। नया क़ानून 1 सितंबर 2019 को लागू हुआ लेकिन 14 सितंबर तक जहां कई राज्यों ने जुर्माने की राशि को कम कर दिया वहीं कइयों ने इसे लागू करने से ही इनकार कर दिया है।

क्या सभी नियम केवल जनता के लिए

एक ओर जहां आम जनता की सुरक्षा के नाम पर उनके ऊपर सख्त जुर्माने की व्यवस्था बनाई गई, वहीं दूसरी ओर नेताओं को सरकारी खर्च पर भारी सुरक्षा मिलती है। आम जनता की असुविधा के बावजूद, सख्त सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर वीआईपी मूवमेंट के समय पूरी सड़क ही खाली करा ली जाती हैं। परन्तु चुनावों के समय नेता लोग सारे सुरक्षा प्रावधानों को ताक पर रख देते हैं। मंत्री जी का कहना है कि जनता की सुरक्षा के मद्देनज़र इस एक्ट को लागू किया गया है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या ये सभी नियम कानून केवल आम जनता के लिए है। क्या इन कानूनों का पालन नेताओं और आला अफसरों को नहीं करना चाहिए। 

चुनाव के मद्देनज़र भाजपा प्रशासित राज्यों में रियायत

आगामी कुछ ही महीनों में देश के कई प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस दौरान देश के कई भाजपा प्रशासित राज्यों में चुनाव के मद्देनज़र जनता को खुश करने के लिए ट्रैफिक नियमों के तहत लगाए जाने वाले जुर्माने में रियायत की घोषणा राज्य सरकारों ने कर दी है। मोटर व्हीकल के इस नए क़ानून के विरोध में सबसे पहले गुजरात सरकार खड़ी हुई जहां केंद्र की ही तरह बीजेपी का शासन है।गुजरात सरकार ने तो कई मामलों में जुर्माने की राशि में लगभग 90 फ़ीसदी तक की कटौती कर दी और साथ ही राज्य में नए नियमों को 16 सितंबर से लागू करने की घोषणा की। 

दूसरी तरफ झारखंड की बीजेपी सरकार ने भारी भरकम जुर्माना लगाए जाने पर तीन महीने की रोक लगा दी। रघुवर दास ने राज्य की जनता से ट्रैफिक के नियमों का पालन करने की अपील की है। झारखंड के परिवहन मंत्री सीपी सिंह ने बीबीसी को बताया, "हेलमेट की चेकिंग, शराब पीकर गाड़ी चलाने जैसे सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर तो कार्रवाई की जाएगी। लेकिन गाड़ी के कागजात को लेकर तीन महीने तक का समय दिया गया है और इस दौरान लोगों को शिक्षित भी किया जाएगा।" उन्होंने कहा, "तीन महीने तक का समय दे रहे हैं। परिवहन विभाग में कर्मचारी बढ़ाए जा रहे हैं। लोगों को जागरूक किया जाएगा।" परिवहन मंत्री ने बताया, "नए ट्रैफिक नियमों के अनुसार ट्रैफिक पुलिस अब कागजात नहीं होने पर चालान नहीं काटेगी बल्कि उस व्यक्ति को कागजों को पूरा करने के लिए समय देगी। साथ ही गाड़ियों के कागजात अपडेट कराने के लिए राज्य में अतिरिक्त सेवा केंद्र खोले जाएंगे।"

वहीं महाराष्ट्र की बीजेपी-शिवसेना सरकार ने भी इसे लागू करने से इनकार कर दिया।महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री दिवाकर रावते ने इस पर नितिन गडकरी को चिट्ठी लिखी थी लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद परिवहन मंत्री ने यह कहते हुए कि जुर्माने की राशि बहुत ज्यादा है और इसे इतनी बड़ी राशि के साथ राज्य में लागू नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ कहते हैं, वहां विधानसभा चुनाव होने हैं लिहाजा यह शिवसेना बनाम बीजेपी का मामला हो गया है। वहां कई मुद्दों को लेकर पहले से ही दोनों पार्टियों के बीच टकराव की स्थिति चल रही है। लेकिन राज्य बीजेपी के भी कई नेता ऐसी चीज़ नहीं चाहते हैं जिसे चुनाव से पहले लागू करने से लोगों में नाराज़गी हो।" वे कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि वर्तमान राज्य सरकार इसे लागू करेगी।"

यहां यह बताना ज़रूरी है कि महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं और राज्य सरकारें यह नहीं चाहतीं कि लोगों में नए मोटर व्हीकल क़ानून को लागू करने का बाद गुस्सा पैदा हो। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी अभी नया मोटर व्हीकल क़ानून लागू करने से इनकार किया है। साथ ही राज्य सरकार पूरे हरियाणा में ट्रैफिक नियमों को लेकर 45 दिनों तक जागरूकता अभियान भी चलाएगी। बीजेपी शासित राज्य उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी राज्य में नए मोटर व्हीकल क़ानून में संशोधन किया और कई जुर्माने की राशि आधी कर दी। कर्नाटक में भी इस क़ानून के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला हुआ है। बीजेपी शासित राज्यों के अलावा जहां पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस क़ानून को लागू करने से साफ़ इनकार कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस ने इस क़ानून का संसद में भी विरोध किया था। कांग्रेस शासित राज्यों पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकारों ने कहा है कि वे इस क़ानून की स्टडी करने के बाद ही इसे लागू करेंगे।

जुर्माने की राशि को घटा नहीं सकते हैं राज्य 

तो क्या राज्य सरकारें केंद्र के बनाए इस क़ानून में संशोधन कर सकती हैं या फिर इसे पूरी तरह लागू करने से ही मना कर सकती हैं। क्या कहता है देश का संविधान? संविधान की समवर्ती सूची या सातवीं अनुसूची में राज्य और केंद्र सरकार के साझा अधिकारों का वर्णन किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता कहते हैं, "समवर्ती सूची के अंतर्गत यह बताया गया है कि राज्य और केंद्र के पास क्या क्या अधिकार हैं। और उसके अनुसार उन विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार संसद या विधानसभा या दोनों को रहता है।" वे कहते हैं, "समवर्ती सूची में राज्य और केंद्र दोनों का अधिकार है। सड़क परिवहन को समवर्ती सूची में रखा गया है और केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची के तहत मिली शक्तियों के माध्यम से मोटर व्हीकल क़ानून में नए प्रावधानों को जोड़ा है।"

अपनी बातों में फंसे गडकरी

विशषज्ञ कहते हैं, "जब समवर्ती सूची में केंद्र कोई क़ानून बनाता है तो यह एक मॉडल क़ानून होता है और उसके अनुसार राज्य अपने क़ानून बना लेते हैं लेकिन मोटर व्हीकल क़ानून में एक नया प्रावधान यह भी आया है कि राज्य जुर्माने की राशि को कम नहीं कर सकते। इसका मतलब है कि राज्य जुर्माने की राशि को घटा नहीं सकते फिर भी वो इसे घटा रहे हैं।" पहले नितिन गडकरी कह रहे थे कि जुर्माने की राशि को राज्य घटा नहीं सकते लेकिन अब वो कह रहे हैं कि ये सिर्फ हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है क्योंकि मौतें राज्यों में हो रही है। फिर उन्होंने क़ानून मंत्रालय से लीगल राय मांगी है कि आप बताएं। विशेषज्ञ कहते हैं, "यह अराजक स्थिति है। जब केंद्र कोई क़ानून बनाता है तो अराजक स्थिति यह होती है कि जनता उसे नहीं माने और राज्य भी उसे नहीं माने तो यह संवैधानिक अराजकता है। अगर संस्थागत तौर पर राज्य ही केंद्र के बनाए क़ानून को न माने और केंद्र इसके लिए क़ानूनी सलाह मांग रहा हो तो यहां सवाल यह भी उठता है कि इस क़ानून पर राज्यों की सलाह क्यों नहीं ली गई।" नए ट्रैफिक क़ानून के तहत न्यूनतम और अधिकतम जुर्माने की राशि का प्रावधान है। लेकिन जुर्माना अधिकतम लगाया जा रहा है। यह भी सवालों के घेरे में है।

बुनियादी ढांचे को उन्नत किए बिना शुल्कों को बढ़ावा

कई राज्य सरकारों ने यातायात उल्लंघन दंड पर जुर्माना की मात्रा को कम करने, या यहां तक कि नए प्रावधानों को अस्वीकार करने का विरोध किया है। गुजरात ने जुर्माने में भारी कटौती की घोषणा की है। पश्चिम बंगाल ने उच्च दंड को अपनाने से इनकार कर दिया है। वहीं कर्नाटक और केरल प्रावधानों को कम कठोर बनाने की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं और अन्य सावधानी से आगे बढ़ रहे हैं। देश के कई हिस्से के मोटर चालकों ने पुलिस द्वारा जुर्माना लगाने पर नाराज़गी के साथ प्रतिक्रिया व्यक्त की है। जाहिर है कि राज्य सरकार द्वारा सड़क के बुनियादी ढांचे को उन्नत किए बिना शुल्कों को बढ़ावा देने और परिवहन दस्तावेजों के जारी करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था करने से नाराज़ हैं। 

बीते दिनों केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने अपने एक बयान में कहा है कि जुर्माने की मात्रा चुनने के लिए राज्य सरकारों को स्वतंत्रता दी गई है। क्योंकि यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे नागरिकों के जीवन की रक्षा की जिम्मेदारी स्वयं करें। गडकरी का तर्क मान्य है और मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन के पीछे की मंशा को गलत नहीं ठहराया जा सकता है। आखिरकार, भारत में दुनिया की कुछ सबसे घातक सड़क दुर्घटनाएं हुई हैं और 2017 के दौरान तकरीबन 1,47,913 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि अन्य निर्धारक, प्रशासनिक सुधार के बिना, क्या केवल बढ़ाए गए जुर्माने से इस रिकॉर्ड को बदला जा सकता है।

भ्रष्टाचार में डूबा है परिवहन मंत्रालय

ट्रैफिक नियमों में सुधार का मूल संशोधित कानून की धारा 198 (ए) में निहित है, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किए गए व्यक्तियों को इन प्रावधानों में सुधार करने की अनुमति है। इसके तहत वे सड़क के सुरक्षा मानकों के डिजाइन या निर्माण या रखरखाव के लिए जिम्मेदार किसी नामित प्राधिकारी, ठेकेदार, सलाहकार या रियायतकर्ता की आवश्यकता होती है। इस कानून को सभी राज्यों में सड़क उपयोगकर्ताओं द्वारा मुकदमेबाजी के माध्यम से लागू किया जा सकता है। चूंकि मानकों को निर्धारित किया गया है, इसलिए इसे साबित करने के लिए किसी सड़क दुर्घटना की प्रतीक्षा किए बिना नियमों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। कई लोग इस बात से अब तक अंजान है कि अगर बुनियादी ढांचा कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है तो जुर्माना और प्रवर्तन कार्रवाई को स्वाभाविक रूप से अदालतों में चुनौती दी जा सकती है। ये अभाव मुख्य रूप से सड़कों की हालत, ट्रैफिक सिग्नल, साइनेज और सावधानी के निशान की कमी होते हैं, जो मोटर चालकों, साइकिल चालकों और पैदल चलने वालों को प्रभावित करते हैं, यह सब इसके दायरे में आते हैं। राज्य सरकारें भी अपने क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरणों को सुधारने में विफल होने के लिए जिम्मेदारी से बच नहीं सकती हैं, क्योंकि ये कार्यालय आमतौर पर भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। परिवहन मंत्रालय अच्छी तरह से आरटीओ सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी को अनिवार्य बना सकता है। कुछ ऐसा जो यूपीए के जमाने के एक प्रस्तावित बिल का वादा करता था। इस पर अब कार्रवाई होनी चाहिए। अंततः, सरकारी वाहनों और वीआईपी को सड़क नियमों की अनदेखी करने की अनुमति देने वाली संस्कृति को समाप्त करने से औसत नागरिक को उनका पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव की सिफारिश करने और पेशेवर दुर्घटना जांच को सक्षम करने के लिए राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के गठन में कोई समय नहीं गंवाना चाहिए।


क्या कहते हैं मोटर चालक

पहले आरसी के बिना ही घर से ऑफिस अपनी कार से आती थी। जुर्माना बढ़ने के बाद मैंने अपनी कार से जाना बंद कर दिया है। अब मैं मेट्रो के द्वारा ऑफिस जाती हूं। इस सप्ताह मैं पहले अपनी कार की आरसी एकत्र करूंगी।

- सुलग्ना, आईटी कर्मचारी


मैं उत्तराखंड से हूं। मेरा लाइसेंस खो गया था। उसके बाद से नया लाइसेंस यहां बनने में मुश्किलें हो रहीं थी, इसीलिए मैंने वापस घर जाकर इसे बनवाने का सोचा था। हालांकि पुराने लाइसेंस की मेरे पास एक फोटोकॉपी ही है। नये ट्रैफिक नियमों के बाद मैं अब मेट्रो से आना जाना ही पसंद करती हूं। इतना भारी जुर्माना भला किसलिए देना।

- निखिला शर्मा, गृहिणी


यह भी जानें

  • आप अपनी गाड़ी के दस्तावेज डिजी लॉकर में भी रख सकते हैं। यह मान्य हैं। ट्रैफिक पुलिस आपको दस्तावेजों की मूल प्रति दिखाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।

  • अगर आपके पास गाड़ी के दस्तावेजों की मूल प्रति नहीं है तो कानून आपको अनुमति देता है कि आप चालान होने के 15 दिनों के भीतर इसे अदालत में प्रस्तुत कर सकें। यह केवल तभी के लिए है जब आपने चालान का मौके पर ही भुगतान नहीं किया हो

  • अगर आपको लगता है कि किसी यातायात नियम के उल्लंघन के लिए आपका गलत चालान किया गया है तो मौके पर चालान भरने के बजाय कोर्ट चालान किए जाने का आग्रह करें।

See More

Latest Photos