चांद मिशन पर भारत के कदम

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चंद्रयान-1 और उसके बाद चंद्रयान-2 अभियान को सफलता के साथ चलाने वाली अंतरिक्ष एजेंसी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान यानी इसरो एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है।

यह एक अच्छा उदाहरण है कि किस तरह सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी शोध और विकास के कार्य को बेहतर तरीके से अंजाम दे सकती है, बल्कि जटिल लक्ष्यों को सटीक ढंग से हासिल भी कर सकती है। हालांकि अंतरिक्ष के क्षेत्र में सक्रिय कंपनियों में इसरो सार्वजनिक क्षेत्र की अकेली कंपनी नहीं है। इस क्षेत्र की ज्यादातर या ऐसी कंपनियां, जिनके नाम बड़ी सफलताएं दर्ज हैं, वे सब सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा है, जिसके नाम न सिर्फ सबसे ज्यादा उपलब्धियां दर्ज हैं, बल्कि अंतरिक्ष अभियानों में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर तकनीक भी उसी ने विकसित की है। इतना ही नहीं, अंतरिक्ष शोध के ज्यादातर मानक भी उसी ने तैयार किए हैं। कुछ ऐसी ही बातें सोवियत संघ के अंतरिक्ष कार्यक्रम के बारे में कही जा सकती हैं, जो बाद में सोवियत संघ के विघटन के बाद रॉसकॉसमॉस नाम की एजेंसी में बदल गया। यही बात चीन की स्पेस एजेंसी के बारे में भी कही जा सकती है, जापान की स्पेस एजेंसी के बारे में भी, इजरायल की इसा के बारे में भी और दुनिया के तमाम दूसरे देशों की स्पेस एजेंसियों के बारे में भी। ऐसा नहीं है कि इनके कार्यक्रमों में निजी क्षेत्र की कोई भूमिका ही नहीं रही। अंतरिक्ष कार्यक्रमों के बहुत सारे उपकरणों और अन्य साजो-सामान की आपूर्ति निजी क्षेत्र हमेशा से ही करता रहा है। तब इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं थी, क्योंकि यह ऐसा क्षेत्र नहीं था, जिसमें निजी क्षेत्र की कंपनियां बड़े लाभ की उम्मीद बांधें। जब उपग्रहों का व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू हुआ, तब कुछ कंपनियों ने इनके निर्माण और प्रक्षेपण का जिम्मा संभाला। ऐसी बहुत सी कंपनियां यह काम अब बहुत अच्छे ढंग से कर भी रही हैं। एरियनस्पेस इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जिसका इसरो के साथ करार भी है। इसके आगे यह मान लिया गया था कि अंतरिक्ष का बाकी कारोबार सरकारी कंपनियों के हवाले ही रहना चाहिए। लेकिन पिछले कुछ समय में नई संभावनाओं ने पंख फैलाए हैं, तो निजी क्षेत्र की कई कंपनियां इस क्षेत्र में उतरती दिख रही हैं। खासकर अंतरिक्ष पर्यटन की संभावनाएं उन्हें आकर्षित कर रही हैं। कई कंपनियां तो चांद पर उतरने की योजनाएं बना रही हैं। इनमें विमान बनाने वाली बोइंग, एयरबस और लॉकहीड मार्टिन जैसी कंपनियां तो हैं ही, साथ ही विमान सेवा देने वाली वर्जिन एयरलाइन्स भी है। गूगल ने भी इस कारोबार में उतरने का करार किया है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में है स्पेस-एक्स, जिसने न सिर्फ एक उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया, बल्कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने अपने काम का ठेका भी उसे दिया है। क्या सचमुच इन कंपनियों को अंतरिक्ष के क्षेत्र में मुनाफा दिख रहा है? अभी किसी को ठीक से नहीं पता कि अंतरिक्ष कारोबार में कमाई का मॉडल क्या होगा। ज्यादातर इसमें दीर्घकालिक निवेश के इरादे से उतरी हैं, जिसमें पहली नजर मुनाफे पर नहीं, भविष्य की तकनीक पर पकड़ बनाने की होती है। इस सबसे अंतरिक्ष क्षेत्र में सक्रियता काफी बढ़ गई है, जो अपने आप में स्वागतयोग्य है। 

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