लाल किला : भारत की शान

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प्राचीन किलों से है भारत की पहचान बेंगलूरु, (परिवर्तन)। प्राचीनकाल में विशालकाय महल और मंदिर बनते थे। नगर को चारों ओर से सुरक्षित करने के लिए परकोटे बनते थे अर्थात चारों ओर विशालकाय पत्थरों की दीवारें होती थीं और उन दीवारों में चारों दिशाओं में चार अलग-अलग दरवाजे होते थे। मध्यकाल में विदेशी आक्रमण के चलते भव्य किले बनाए जाने लगे। किले को 'दुर्ग' कहा जाता है। ऐसे किले हमारे गौरवशाली इतिहास और युद्ध को दर्शाते हैं। हर साल विदेशों से आने वाले लाखों सैलानियों का कहना है कि इन प्राचीन किलों से यह पता चलता है कि भारत का इतिहास कितना प्राचीन और कितना भव्य है। इनमें से ‍कुछ किलों को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में भी शामिल किया गया है। आज हम आपको भारत के कुछ ऐसे किलों के बारे में बता रहे हैं जिनका इतिहास जानकार आप हैरान रह जाएंगे।

जब किलों की बात होती है ‍तो जुबान पर लाल किले का नाम सबसे पहले आता है। यह किला दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यह किला दिल्ली में स्थित है। इस किले के अंदर देखने लायक कई चीजें हैं। मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास देखने के लिए काफी लोग रोज ही आते हैं। यह किला यमुना नदी के किनारे है। यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है, जहां से देश के प्रधानमंत्री देश के लोगों को संदेश देते हैं और स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराते हैं। लाल किले का निर्माण तोमर शासक राजा अनंगपाल ने 1060 में किया था। बाद में पृथ्वीराज चौहान ने इसका पुनर्निर्माण कराया और फिर मुगलों के शासन के दौरान इस किले को मुगल बादशाह शाहजहां ने तुर्क लुक दिया।

लाल कोट अर्थात लाल रंग का किला, जो कि वर्तमान दिल्ली क्षेत्र का प्रथम निर्मित नगर था। इसकी स्थापना तोमर शासक राजा अनंगपाल ने 1060 में की थी। साक्ष्य बताते हैं कि तोमर वंश ने दक्षिण दिल्ली क्षेत्र में लगभग सूरजकुंड के पास शासन किया, जो 700 ईस्वी से आरंभ हुआ था। फिर चौहान राजा पृथ्वीराज चौहान ने 12वीं सदी में शासन ले लिया और उस नगर एवं किले का नाम किला राय पिथौरा रखा था। राय पिथौरा के अवशेष अभी भी दिल्ली के साकेत, महरौली, किशनगढ़ और वसंतकुंज क्षेत्रों में देखे जा सकते हैं।

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