देश की आर्थिक स्थिति क्या है ?

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। पिछले दिनों झारखंड के स्टील सिटी कहे जाने वाले शहर जमशेदपुर से एक दिल दुखाने वाली खबर आई। टाटा मोटर्स के ब्लॉक क्लोजर का असर मोटर पार्ट्स बनाने वाली वहां की कई छोटी बड़ी कंपनियों पर पड़ी जिसकी वजह से हजारों की तादाद में न केवल कंपनियां बंद हो गई बल्कि हजारों लोगों की नौकरियां भी चली गई। नौकरी जाने के डर से स्थानीय भाजपा नेता बारीडीह मंडल आइटी सेल प्रभारी व बस्ती विकास समिति के मीडिया प्रभारी कुमार विश्वजीत के बेटे 25 वर्षीय आशीष कुमार ने पंखा के सहारे फंदे से लटक कर आत्महत्या कर ली। आशीष कुमार टेल्को खड़ंगाझार स्थित एक कंपनी में कंप्यूटर ऑपरेटर था। वह पिछले कुछ दिनों से नौकरी जाने की आशंका की वजह से तनाव में था।

उपरोक्त घटना को जानकर हर कोई हैरान है। नौकरी जाने के डर से देश के युवा अगर इस रास्ते पर चलेंगे तो देश का भविष्य क्या होगा। दरअसल, पिछले दिनों आई कई रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि देश की आर्थिक स्थिति कमजोर है और मंदी की चपेट में है। देश विदेश में किए गए कई अध्ययनों के अनुसार रिपोर्ट जारी किए गए, जिनमें कहा गया कि भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ी है। अर्थव्यवस्था की हालातों में इस स्लो-डाउन का असर देश के विभिन्न सेक्टरों में पड़ रहा है, जिनमें मुख्य रूप से ऑटो सेक्टर, कपड़ा सेक्टर, ईलेक्टॉनिक्स गुड्स सेक्टर आदि मुख्य हैं। 

पिछले दिनों नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा, ‘पिछले 70 वर्षों में किसी को भी इस तरह की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा था, जहां पूरी वित्तीय प्रणाली ही खतरे में हो।’ हालांकि वह समस्या की जड़ यूपीए-2 के कार्यकाल में देखते हैं : ‘पूरे प्रकरण की शुरुआत 2009-14 के दौरान अंधाधुंध कर्ज बांटे जाने से हुई थी, जिसके फलस्वरूप 2014 के बाद से बुरे कर्ज या गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में वृद्धि हुई है।’ मनमोहन सिंह ने 2014 में अर्थव्यवस्था को बुरे हाल में ला छोड़ा था, ये सबको मालूम है। यदि सब कुछ ठीक रहता तो लोग यूपीए को सत्ता से बेदखल क्यों करते? मोदी की जिम्मेवारी अर्थव्यवस्था को ठीक करने की ही तो थी, और उन्होंने 2014 का चुनाव इसी मुद्दे पर लड़ा भी था। उन्होंने वादा किया था कि अच्छे दिन वापस आएंगे। आज हमारे सामने मौजूद आर्थिक संकट का एक ही कारण है, देश के लिए गए कई खराब फैसले, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट की स्थिति में लाने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं।

आर्थिक वृद्धि दर 7 फीसदी रहने का अनुमान

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने भारत में मजबूत घरेलू खपत और निवेश से आर्थिक वृद्धि दर 2019 में 7।0 फीसदी और 2020 में 7।1 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। यूएन की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की यह वृद्धि दर बीते साल (7।2 फीसदी) के मुकाबले जरूर कुछ कम है, लेकिन विश्व की वर्तमान आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह काफी बेहतर कही जाएगी। हालांकि, यूएन की हालिया रिपोर्ट में जताया गया अनुमान इस साल जनवरी में जारी अनुमान से कम है। उस समय 2019 और 2020 में आर्थिक वृद्धि दर क्रमश: 7।6 और 7।4 फीसदी रहने की संभावना जतायी गयी थी। यूएन के विशेषज्ञों के मुताबिक भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया की आर्थिक वृद्धि में बुनियादी ढांचा क्षेत्र से जुडी बाधाएं चुनौती बनी हुई हैं। पीटीआई के मुताबिक इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने भी मानसून पर अल नीनो के प्रभाव तथा वैश्विक चुनौतियों के कारण चालू वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को कम कर 7।2 फीसदी कर दिया था। केंद्रीय बैंक ने पहले इसके 7।4 फीसदी रहने की संभावना जतायी थी। 

यूएन के विशेषज्ञों ने चीन की आर्थिक वृद्धि दर 2018 के मुकाबले घटने की बात कही है। जहां 2018 में चीन की आर्थिक वृद्धि दर 6।6 फीसदी थी वहीं, 2019 में इसके 6।3 फीसदी और 2020 में 6।2 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है। यूएन की रिपोर्ट में वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर के बारे में कहा गया है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार विवाद, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत अनिश्चितता और कंपनियों के कमजोर आत्मविश्वास, वैश्विक आर्थिक वृद्धि के लिये चुनौती हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में वैश्विक सकल उत्पाद वृद्धि दर 3।0 प्रतिशत रही थी। वहीं, 2019 में इसके 2।7 प्रतिशत और 2020 में 2।9 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

ऑटो सेक्टर में गहराती मंदी

हाल ही में ऑटो सेक्टर में ज़ोरदार मंदी और बिक्री के 30-35 प्रतिशत तक कम होने की ख़बरें आती रही थीं। देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुज़ुकी समेत ह्यूंडई, महिंद्रा, हॉन्डा कार और टोयोटा किर्लोस्कर मोटर्स जैसी प्रमुख वाहन कंपनियों की बिक्री में जुलाई में दहाई अंक की गिरावट दर्ज की गई थी, और यह भी बताया गया था देशभर में सैकड़ों डीलरशिप बंद हो गई हैं। ऑटो सेक्टर में गहराती मंदी और ऑटो इंडस्ट्री के विरोध की वजह से सरकार अब ई-व्हीकल को अपनाने में तेजी लाने से हिचकने लगी है। अगले कुछ महीनों में सरकार ई-व्हीकल पर जोर देने के अपने अभियान को धीमा कर सकती है। ऑटो इंडस्ट्री का कहना है कि अभी इस सेक्टर की हालत बेहद खराब है, नौकरियां जा रही हैं, ऐसे में सरकार को थोड़ा सहानुभूतिपूर्वक रवैया अपनाना चाहिए। पिछले दिनों एक अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने सरकारी सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि साल 2023 के बाद इंटर्नल कम्बशन इंजन वाले थ्री व्हीलर और 1500 सीसी इंजन क्षमता वाले टू व्हीलर्स की बिक्री पर रोक लगाने के प्रस्ताव पर भी अब शायद आक्रामक तरीके से आगे न बढ़ा जाए। अब सरकार का एक वर्ग मानता है कि पूरे सेक्टर को 'बाधित करने' की जगह इलेक्ट्र‍िक वाहनों को धीरे-धीरे अपनाया जा सकता है। गौरतलब है कि ऑटो सेक्टर जीडीपी और रोजगार में सबसे ज्यादा योगदान करने वाले सेक्टर में से है। इलेक्ट्र‍िक वाहनों को बढ़ावा देने के पैकेज पर काम कर रहे सरकारी विभागों से कहा गया है कि वे अभी आईसीई वाहनों की बिक्री को हतोत्साहित करने वाले कदमों पर विराम लगाएं। इसमें पेट्रोल और डीजल वाहनों पर रजिस्ट्रेशन चार्ज बढ़ाने जैसे कदम थे।

हाल में ऑटो सेक्टर के प्रतिनिधि‍यों की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ बैठक हुई थी, जिसमें ऑटो कंपनियों ने रजिस्ट्रेशन फीस बढ़त का मसला उठाया था। कंपनियों ने यह मसला भी उठाया था कि सरकार इलेक्ट्र‍िक वाहनों पर जिस तरह से जोर दे रही है उससे समस्या और बढ़ सकती है। गौरतलब है कि जुलाई में ऑटो सेल्स की थोक बिक्री में करीब 30 फीसदी की गिरावट आई है। यह पिछले 18 साल की सबसे ज्यादा गिरावट है। पिछले महीने सड़क परिवहन मंत्रालय ने एक नोटिफिकेशन का प्रारूप जारी किया था जिसमें यह प्रस्ताव है कि नए आईसीई कारों पर रजिस्ट्रेशन फीस 600 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये किया जाए। गौरतलब है कि कारों की बिक्री में लगातार जारी गिरावट से ऑटो सेक्टर की हालत पतली होती जा रही है और छंटनी का दौर शुरू हो गया है। पिछले तीन महीने में ऑटो इंडस्ट्री से करीब दो लाख लोगों को नौकरियों से निकाला गया है।

टेक्सटाइल सेक्टर में मंदी की मार, जा रही नौकरियां

देश का टेक्सटाइल सेक्टर भी मंदी की चपेट में आता नज़र आ रहा है, और टेक्सटाइल मिलों के संगठन का दावा है कि न सिर्फ बड़ी तादाद में नौकरियां खत्म हो रही हैं, बल्कि देशभर में एक-तिहाई मिलें बंद हो चुकी हैं। नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल मिल्स कॉरपोरेशन का दावा है कि भारतीय स्पिनिंग उद्योग इस वक्त सबसे बड़े संकट से गुज़र रहा है, जिसके कारण बड़ी संख्या में नौकरियां खत्म हो रही हैं। अंग्रेज़ी समाचारपत्र 'इंडियन एक्सप्रेस' में बीते मंगलवार को आधे पेज का एक बड़ा-सा विज्ञापन छपा है, जिसमें नौकरियां खत्म होने के बाद फैक्टरी से बाहर आते लोगों का स्केच बनाया गया है। इसके नीचे बारीक आकार में लिखा है कि देश की एक-तिहाई धागा मिलें बंद हो चुकी हैं, और जो चल रही हैं, वे भारी घाटे में हैं। उनकी स्थिति ऐसी भी नहीं है कि वे भारतीय कपास ख़रीद सकें, सो, कपास की आगामी फ़सल का कोई ख़रीदार नहीं होगा। अनुमान है, 80,000 करोड़ रुपये का कपास उगने जा रहे है, सो, इसका असर कपास के किसानों पर भी होगा।" फरीदाबाद टेक्सटाइल एसोसिएशन के अनिल जैन ने बताया था कि टेक्सटाइल सेक्टर में 25 से 50 लाख के बीच नौकरियां गई हैं। इस संख्या पर यक़ीन नहीं हुआ था, लेकिन आज टेक्सटाइल सेक्टर ने विज्ञापन देकर कलेजा ही दिखा दिया है। धागों की फैक्टरियों में एक और दो दिन की बंदी होने लगी है, धागों का निर्यात 33 फीसदी कम हो गया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने वर्ष 2016 में 6,000 करोड़ रुपये के पैकेज और अन्य रियायतों का ज़ोर-शोर से ऐलान किया था, और दावा किया था कि तीन साल में एक करोड़ रोज़गार पैदा होंगे। उल्टा नौकरियां चली गईं। खेती के बाद सबके अधिक लोग टेक्सटाइल में रोज़गार पाते हैं, और वहां का संकट इतना मारक है कि विज्ञापन देना पड़ रहा है।

कैसे घटी भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि 

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि नोटबंदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि घटा दी। उन्होंने कहा कि ऐसे समय जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था वृद्धि दर्ज कर रही है, भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर पर नोटबंदी की वजह से काफी बड़ा असर पड़ा। राजन ने कहा कि उन्होंने ऐसे अध्ययन देखे हैं जिनसे पता चलता है कि नवंबर, 2016 में ऊंचे मूल्य के नोटों को बंद करने से भारत की वृद्धि दर पर काफी असर पड़ा। उन्होंने कहा, ‘पक्के तौर पर मेरी राय है कि नोटबंदी ने हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। अब मैंने ऐसे अध्ययन देखे हैं जिनसे इसकी पुष्टि होती है। हमारी वृद्धि दर सुस्त पड़ी है।’ राजन ने पिछले दिनों एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘वैश्विक अर्थव्यवस्था 2017 में अधिक तेज रफ्तार से बढ़ी, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ी।’ उन्होंने कहा कि सिर्फ नोटबंदी ही नहीं माल एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू करने से भी हमारी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा। वित्त वर्ष 2017-18 में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6।7 प्रतिशत रही।

राजन ने कहा, ‘नोटबंदी और जीएसटी के दोहरे प्रभाव से हमारी वृद्धि दर प्रभावित हुई। कोई मुझे जीएसटी विरोधी करार दे उससे पहले मैं कहना चाहूंगा कि दीर्घावधि में यह अच्छा विचार है। लघु अवधि में इसका असर पड़ा है।’ यह पूछे जाने पर कि क्या रिजर्व बैंक गवर्नर के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान उनसे नोटबंदी को लागू करने को कहा गया था, पूर्व गवर्नर ने कहा कि उनसे ऊंचे मूल्य की करेंसी को प्रतिबंधित करने पर राय पूछी गई थी। उन्होंने कहा कि उनकी सोच में नोटबंदी ‘खराब विचार’ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को टेलीविजन पर दिए अपने संबोधन में 500 और 1,000 रुपये के नोट को बंद करने की घोषणा की थी। उस समय सरकार ने दावा किया था कि नोटबंदी से कालेधन, जाली मुद्रा और आतंकवाद के वित्तपोषण पर लगाम कसी जा सकेगी। राजन सितंबर, 2013 से सितंबर, 2016 तक रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे। 

जीएसटी पर विस्तार से अपनी राय रखते हुए राजन ने कहा कि इस सुधारात्मक कर प्रणाली को अधिक बेहतर तरीके से लागू किया जाना चाहिए था। यह पूछे जाने पर कि क्या जीएसटी में पांच अलग स्लैब के बजाय एक कर होना चाहिए थी, राजन ने कहा कि यह बहस का विषय है। ‘मेरे विचार में, जो एक वैकल्पिक विचार है, आप एक बार जो काम करते हैं तो आपको समस्याओं का पता लगता है। उसके बाद उसे एक-एक करके ठीक करते हैं। इसलिए यह (प्रारंभिक समस्या) होनी ही थी।’ बैंकों के साथ घपलेबाजी करने वालों की सूची के बारे में राजन ने कहा कि एक सूची थी जिसमें बड़े-बड़े घोटालेबाजों के नाम थे। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को सौंपी गई बड़े कर्ज धोखेबाजी की सूची के बारे में राजन ने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि ये मामले अब कहां हैं। एक बात को लेकर मैं चिंतित हूं कि यदि एक को छूट मिलती है तो और दूसरे भी उसी राह पर चल सकते हैं।’ उन्होंने कहा कि कर्ज चूककर्ता और धोखेबाजों में अंतर है। यदि आप डिफॉल्टरों को जेल भेजना शुरू कर देते हैं तो कोई भी जोखिम नहीं उठाएगा। इस साल सितंबर में राजन ने संसदीय समिति को नोट में कहा था कि बैंकिंग धोखाधड़ी से संबंधित चर्चित मामलों की सूची पीएमओ को समन्वित कार्रवाई के लिए सौंपी गई थी। प्राक्कलन समिति के चेयरमैन मुरली मनोहर जोशी को सौंपी गई सूची में राजन ने कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग प्रणाली में धोखाधड़ी बढ़ रही है। हालांकि, यह कुल गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) के मुकाबले अभी काफी कम है।

आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का खुलासा

कई चौंकाने वाली खबरों के बीच पिछले दिनों भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का भी बयान सामने आया। उन्होंने कहा है, काफ़ी मुमकिन है कि भारत अपनी आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा हो। एक भारतीय अख़बार के लिए लिखे लेख में सुब्रमण्यम ने कहा है कि रिसर्च बताती है कि भारत ने आर्थिक वद्धि मापने का तरीक़ा बदल दिया है इसलिए इसकी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) असलियत से लगभग 2।5 फ़ीसदी ज़्यादा दर्ज की गई। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकारों के समूह ने सुब्रमण्यम के इस निष्कर्ष को ख़ारिज कर दिया है और कहा है कि वो उनके दावों का 'पॉइंट टु पॉइंट' जवाब देगा। लेकिन इसके बावजूद सुब्रमण्यम की बातों ने भारत की आर्थिक वृद्धि के दावों की विश्वसनीयता पर एक बार फिर सवाल तो ज़रूर खड़े कर दिए हैं। साल 2018 तक भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था माना जाता था लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना था कि भारत में आर्थिक विकास मापने का तरीक़ा सही नहीं है और इससे अर्थव्यवस्था की सही स्थिति का पता नहीं चलता। साल 2015 में भारत ने जीडीपी की गणना का तरीक़ा बदल दिया था। इनमें एक बड़ा बदलाव ये किया गया कि जीडीपी बाज़ार मूल्य के बजाय आधारभूत मूल्य के ज़रिए मापी जाने लगी। सीधे शब्दों में कहें तो पहले जीडीपी थोक मूल्य के आधार पर तय होती थी लेकिन अब कंज़्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी ग्राहकों द्वारा भुगतान किए गए बाज़ार मूल्य से तय होती है। इसके अलावा तिमाही और सालाना वृद्धि के आंकड़ों की गणना के लिए 'बेस इयर' (आधार वर्ष) भी 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया गया। इसके बाद से ही जीडीपी की गणना का ये तरीक़ा कई अर्थशास्त्रियों की पैनी नज़रों में आ गया।

अरविंद सुब्रमण्यम ने एक बार फिर जीडीपी गणना के इस तरीक़े पर बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा है कि वित्त वर्ष 2011-12 और 2016-17 में आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है। आधिकारिक अनुमान के अनुसार इस अवधि में आर्थिक विकास दर 7 फ़ीसदी रही है जबकि सुब्रमण्यम मानते हैं कि इस दौरान वृद्धि दर 4।5 फ़ीसदी के लगभग रही है। सुब्रमण्यम के ये दावे उनके ख़ुद के शोध पर आधारित हैं जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय के 'सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट' में प्रकाशित किया जा चुका है।

साल 2015 से यानी जीडीपी गणना के नए तरीक़े लागू होने के बाद से एक-एक करके कई विशेषज्ञों ने मोदी सरकार में आर्थिक वृद्धि दर के आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं। मोदी सरकार में उच्च और तेज़ आर्थिक विकास दर के बावजूद साल 2017-18 के बीच भारत में बेरोज़गारी दर पिछले 45 सालों में सबसे ज़्यादा रही। भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी बेरोज़गारी की ऊंची दर को देखते हुए आर्थिक वृद्धि के सकारात्मक आंकड़ों पर संदेह ज़ाहिर किया है। वहीं दूसरी ओर भारत सरकार ने जीडीपी गणना के नए तरीक़े का बचाव किया है। भारतीय सांख्यिकी मंत्रालय ने अपने एक बयान में कहा है, "भारत अपनी अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों के योगदान को निष्पक्ष रूप से शामिल करता है। भारत की जीडीपी की गणना मान्य और स्वीकृत तरीक़ों से होती है।" ये पहली बार नहीं जब भारत सरकार द्वारा पेश किए आंकड़ों पर सवाल उठाया गया है। सांख्यिकी मंत्रालय ने अपने एक अध्ययन में पाया कि जून 2016 में पूरे होते वित्त वर्ष में जिन कंपनियों के डेटाबेस का इस्तेमाल जीडीपी की गणना के लिए किया गया था उसमें से 36% कंपनियों को ट्रेस ही नहीं किया जा सका। सरकार ने ख़ुद भी स्वीकार किया है कि इसके आंकड़े इकट्ठे करने के तरीक़ों में कमियां हैं।

भारत पर क्या असर पड़ेगा?

अरविंद सुब्रमण्यम ने भारत के जीडीपी की गणना के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक समिति बनाए जाने की ज़रूरत बताई है जिसमें भारतीय और विदेशी अर्थशास्त्री शामिल हों। ये मोदी सरकार को बड़ा झटका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी बार चुनाव जीतकर सत्ता में आए हैं लेकिन उन पर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दबाव है। भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ भारत अब सबसे तेज़ी से विकसित अर्थव्यवस्था नहीं रहा है। भारत की ये जगह अब चीन ने ले ली है क्योंकि भारत की हालिया आर्थिक वृद्धि दर पिछले पांच वर्षों में सबसे कम रही है।

आख़िर क्यों लगातार तीन बार ब्याज दरें घटाई गईं?

इन सबसे न सिर्फ़ भारत की छवि को धक्का लग सकता है बल्कि इससे ये भी पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में लागू की गई आर्थिक नीतियों ने कैसे देश की अर्थव्यवस्था की ग़लत तस्वीर सामने रखकर आर्थिक विकास को नुक़सान पहुंचाया है। मिसाल के तौर पर, भारत ने महंगाई को क़ाबू में करने के लिए ब्याज दरें ऊंची रखीं लेकिन इससे कारोबार बढ़ाने में ही दिक़्क़तें पैदा होने लगीं। इससे कारोबारियों को ऊंचे दरों पर ख़रीद के लिए मजबूर होना पड़ा। और इन सब के बीच हालात और ख़राब किया बैंकों को वापस न मिलनी वाले भारी भरकम क़र्ज़ की धनराशियों ने। नतीजा ये हुआ कि लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक को इस साल लगातार तीसरी बार ब्याज दरें घटानी पड़ीं। नौकरियों की कमी और कृषि संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। जानकारों का कहना है कि भारत के सामने अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के अलावा, आंकड़ों को जुटाने और सांख्यिकी व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत है ताकि नीतियों का सही विश्लेषण हो सके। भारत सरकार ने भी कहा है कि वो आंकड़े जुटाने के आधुनिक तरीक़ों को लागू करने के लिए विश्व बैंक के साथ मिलकर काम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोज़गार पैदा करने और निवेश आकर्षित करने के लिए योजनाओं पर काम करने लिए विभिन्न समितियां बनाई हैं। अरविंद सुब्रमण्यम का मानना है कि देश की कमज़ोर पड़ती अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार को तेज़ी से कार्रवाई करने की ज़रूरत है।

जब देश की आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ा चढ़ाकर आंका गया

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर ने अर्थव्यवस्था में इस समय दिख रहे धीमेपन को 'बहुत चिंताजनक' करार देते हुए कहा कि सरकार को ऊर्जा एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्रों की समस्याओं को तत्काल सुलझाना चाहिए। उन्होंने कहा कि निजी निवेश प्रोत्साहित करने को सरकार को नये कदम उठाने चाहिए। वर्ष 2013-16 के बीच गवर्नर रहे राजन ने भारत में जीडीपी की गणना के तरीके पर नये सिरे से गौर करने का भी सुझाव दिया है। इस संदर्भ में उन्होंने पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम के शोध निबंध का हवाला दिया जिसमें निष्कर्ष निकाला गया है कि देश की आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ा चढ़ाकर आंका गया है। राजन ने बातचीत में कहा, ''निजी क्षेत्र के विश्लेषकों की ओर से आर्थिक वृद्धि को लेकर कई तरह के अनुमान लगाये जा रहे हैं, जिनमें से कई संभवतः सरकार के अनुमान से काफी नीचे हैं। मेरा मानना है कि आर्थिक सुस्ती निश्चित रूप से बहुत चिंताजनक है।'' उल्लेखनीय है कि वित्त वर्ष 2018-19 में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार 6।8 प्रतिशत पर रह गयी, जो 2014-15 के बाद से सबसे कम रहा। विभिन्न निजी विशेषज्ञों और केंद्रीय बैंक का अनुमान है कि इस साल जीडीपी वृद्धि सात प्रतिशत के सरकारी अनुमान से कम रहेगी। राजन ने कहा, ''आप सभी तरफ देख सकते हैं, कि कंपनियां चिंतित हैं और जोर-शोर से कह रही हैं कि उन्हें कुछ न कुछ प्रोत्साहन दिया जाए।'' पूर्व गवर्नर ने कहा कि अर्थव्यवस्था एवं वृद्धि दर को गति देने के लिए नये तरह के सुधारों की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से कर्ज लेना सुधार नहीं है बल्कि एक ' मौके की कार्रवाई भर है। राजन ने कहा, ''हमें असल में यह समझने की जरूरत है कि हम किस प्रकार दो या तीन प्रतिशत अधिक वृद्धि हासिल कर सकते हैं।'' उन्होंने ऊर्जा एवं गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र को लेकर तत्काल कदम उठाने की वकालत की। राजन ने कहा कि निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने को नये सुधार लागू किये जाने चाहिए। राजन से जब पूछा गया कि क्या 2008 के वित्तीय संकट जैसी स्थिति पून: खड़ी होने जा रही है तो उन्होंने कहा, 'क्या मैं यह भविष्यवाणी कर रहा हूं कि (वैश्विक स्तर पर) एक भारी गिरावट आने जा रही है? मैं नहीं जानता पर मैं यह जरूर सोचता हूं कि यह (संकट) दूसरे स्रोतों से आएगा और पुरानी समस्याओं का समाधान कर देने मात्र से नये संकट की रोकथाम नहीं की जा सकती।

अर्थव्यवस्था की सुस्ती से ऐसे निपटेगी सरकार

सुस्त अर्थव्यवस्था और अलग अलग सेक्टर में लोगों की नौकरी का जाना पूरे देश में चिंता का विषय बना हुआ है। इन्हीं चिंताओं के बीच बीते शुक्रवार को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार को देश की मौजूदा आर्थिक हालत का पूरा अंदाज़ा है और देश की विकास का एजेंडा सबसे ऊपर है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के दौरान फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टमेंट की आय पर आयकर सरचार्ज बढ़ाने का फ़ैसला वापस ले लिया। साथ ही घरेलू निवेशकों के लिए भी आयकर सरचार्ज को बढ़ाने का निर्णय भी रद्द कर दिया। वित्त मंत्री ने शेयर बाज़ार में लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन पर सरचार्ज को बढ़ाने के सरकार के फ़ैसले की वापसी की भी घोषणा की। वित्त मंत्री के साथ इस प्रेस वार्ता में केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर, वित्त सचिव राजीव कुमार, राजस्व सचिव अजय भूषण पांडेय, आर्थिक सचिव अतनु चक्रवर्ती, एक्सपेंडिचर सचिव गिरीश चंद्र मुर्मू भी मौजूद थे।

सरकार की घोषणाएं

  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए 70 हज़ार करोड़ के बेलआउट पैकज की मंज़ूरी दी गई।

  • बैंकों को रेपो रेट की कटौती का फ़ायदा ब्याज में कमी कर ग्राहकों को देना होगा।

  • लोन सेटलमेंट की शर्तें आसान हुईं। लोन की अर्ज़ी की ऑनलाइन मॉनिटरिंग होगी। कर्ज़ वापसी के 15 दिनों के भीतर बैंकों को ग्राहकों को दस्तावेज़ देने होंगे।

  • टैक्स के लिए किसी को परेशान नहीं किया जाएगा। टैक्स असेसमेंट तीन महीने में पूरा किया जाएगा। आयकर से जुड़े ऑर्डर 1 अक्तूबर से सेंट्रलाइज़्ड सिस्टम के ज़रिए जारी किए जाएंगे।

  • जीएसटी रिफंड आसान होगा, सभी जीएसटी रिफंड 30 दिन में किए जाएंगे। एमएसएमई की अर्जी के 60 दिनों के भीतर रिफंड दिया जाएगा।

  • इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए 100 करोड़ रुपये का पैकेज़ दिया जाएगा। इस सेक्टर के कामकाज पर नज़र रखने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाई जाएगी।

  • सीएसआर उल्लंघन को क्रिमिनल नहीं सिविल अपराध माना जाएगा।

  • स्टार्टअप टैक्स निपटारे से जुड़े मामलों के लिए अलग सेल बनेगा। स्टार्टअप पंजीकरण में आयकर की धारा 56 2 (बी) लागू नहीं होगी। स्टार्टअप्स में एंजेल टैक्स ख़त्म।

  • 31 मार्च 2020 तक ख़रीदे गए बीएस-IV वाहन अपने रजिस्ट्रेशन पीरियड तक बने रहेंगे और उनके वन टाइम रजिस्ट्रेशन फ़ीस को जून 2020 तक के लिए बढ़ा दिया गया।

  • ऑटोमोबाइल सेक्टर में स्क्रैपेज पॉलिसी (पुरानी गाड़ियां का सरेंडर) लाएगी सरकार। गाड़ियों की ख़रीद बढ़ाने के लिए सरकार कई योजनाओं पर काम कर रही है।

  • अमरीका और चीन के बीच ट्रेड वॉर से हालात पर नकारात्मक असर पड़ा है।

  • अमरीका और चीन जैसे देशों में मांग में कमी के आसार हैं लेकिन हमारा विकास दर उनकी तुलना में आगे है।

  • अमरीका और जर्मनी विपरीत यील्ड कर्व्स का सामना कर रहे हैं, यानी इन देशों में मांग में कमी आई है।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है। यहां कारोबार करना आसान हुआ। हम लगातार व्यापार को आसान कर रहे हैं। इसके लिए सभी मंत्रालय साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

  • प्रधानमंत्री ने कहा कि हम वेल्थ क्रिएटर का आदर करते हैं। हमने अलग-अलग सेक्टर के लोगों से मुलाक़ात की। सरकार के एजेंडे में सुधार सबसे ऊपर है।

  • मूडीज़ ने भारत के जीडीपी ग्रोथ को घटाकर 6।2 फ़ीसदी कर दी है जो पहले 6।8 फ़ीसदी थी।

  • 2019 में वैश्विक विकास 3।2 फ़ीसदी से नीचे रह सकता है।

  • इनकम टैक्स भरना पहले से बहुत आसान हुआ है। हम जीएसटी को और आसान बनाएंगे।

  • इज़ ऑफ़ डूइंड बिज़नेस के मामले में यह सरकार पिछली सरकारों की तुलना में बहुत आगे है।

  • अगले हफ़्ते होम बायर्स और अन्य मामलों को लेकर भी कुछ घोषणाएं की जाएंगी।

'रिजर्व' में आई अर्थव्‍यवस्‍था को रिजर्व बैंक का साहारा

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को मंदी के दलदल में धंसने से बचाने के लिए हफ्ते भर में दो बड़े कदम उठाए जा चुके हैं। इस दिशा में भारतीय रिजर्व बैंक ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए केंद्र सरकार को 1।76 लाख करोड़ रुपये देने का फैसला किया। कदम इसलिए अभूतपूर्व है कि इसके तहत रिजर्व बैंक ने 2018-19 की अपनी सारी कमाई यानी नेट इनकम के 1।23 लाख करोड़ रुपये सरकार को दे दिए हैं। इस तरह एक तरफ सरकार ने बैंकों को पैसा दिया, तो दूसरी तरफ रिवर्ज बैंक से उससे ढाई गुनी रकम खुद हासिल कर ली है। इन दो कदमों के बाद आशा की जा रही है कि सरकार भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को नकदी के उस संकट से बाहर निकाल पाएगी जिसे कुछ दिन पहले नीति आयोग के उपाध्‍यक्ष राजीव कुमार ने 70 साल का सबसे भयानक नकदी संकट बताया था। इन दोनों कदमों को लेकर अर्थशास्‍त्री यही मान रहे हैं कि इससे अर्थव्‍यवस्‍था को मौजूदा संकट से राहत मिलेगी। लेकिन दूसरा कदम यानी आरबीआई से पैसा लेने वाले कदम की आगे समीक्षाएं होती रहेंगी। खासकर इसलिए कि रिजर्व बैंक के दो पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और उर्जित पटेल इसका विरोध करते रहे हैं। पटेल ने तो इसे लेकर बैंक से इस्‍तीफा ही दे दिया था। बहरहाल अब उन वजहों को देखते हैं जिनके चलते सरकार ने यह फैसला लिया और इन फैसलों का भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर क्‍या-क्‍या असर पड़ सकता है।

नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद से भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर लगातार दबाव बन रहा था। यह दबाव उस समय ज्‍यादा खुलकर दिखने‍ लगा जब मोदी सरकार चुनाव में जाने वाली थी। जब चुनाव सामने हों तो सरकारों को जनता के लिए लोकलुभावन फैसले करने ही होते हैं। खासकर तब जब मुख्‍य विपक्षी दल 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम' जैसा ठोस वादा लेकर चुनाव में उतर रहा हो और किसान कर्जमाफी के नाम पर तीन राज्‍यों का विधानसभा चुनाव जीत चुका हो। एक तरफ सरकार को लोक कल्‍याण की योजनाओं पर पैसा खर्च करना था, तो दूसरी तरफ बैंकों का कर्ज लगातार डूब रहा था। इसकी मुख्‍य वजह कंपनियों का दीवालिया होना और उद्योगपतियों का देश से भागना था। डूबते कर्ज के कारण बैंकों के डूबने का खतरा भी साफ दिखने लगा था, बैंकों के डूबने का मतलब है पूरी अर्थव्‍यवस्‍था का चौपट हो जाना। इसलिए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में बैंकों को करीब पौने तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज समाप्‍त करने के लिए प्रोत्‍साहित किया और बदले में अपनी जेब से इतनी रकम बैंको को दी। इससे बैंक तो बच गए, लेकिन सरकार की माली हालत और खराब हो गई।

एक तरफ सरकार आम आदमी और बैंको को बचाने के लिए पैसा खर्च कर रही थी, दूसरी तरफ उसकी आमदनी अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ रही थी। सरकार को मिलने वाले डायरेक्‍ट टैक्‍स और इनडायरेक्‍ट टैक्‍स, मोटे तौर पर कहें तो इनकम टैक्‍स और जीएसटी दोनों की वसूली लक्ष्‍य से कम हो रही थी। टैक्‍स वसूली में कमी का सीधा मतलब था कि सरकारी खजाने में आमदनी कम और खर्च ज्‍यादा हो रहा है। टैक्‍स की कम वसूली का दूसरा अर्थ यह भी है कि या तो टैक्‍स की बड़े पैमाने पर चोरी हो रही है या फिर मंदी के कारण लोगों और कंपनियों की आमदनी कम हो गई है, जिसके कारण वे कम टैक्‍स जमा कर रहे हैं। सुस्‍त जीडीपी ग्रोथ रेट और दूसरे आंकड़े देखकर यही समझ आ रहा था कि दूसरी बात ज्‍यादा सही है।

फिस्‍कल डेफिसिट में संतुलन की दरकार

इन चीजों से बचने का उपाय यह था कि सरकार अपनी आमदनी से ज्‍यादा खर्च करके अर्थव्‍यवस्‍था को चलाती, लेकिन ऐसा करने पर फिस्‍कल डेफिसिट यानी मौद्रिक घाटा बढ़ जाता। डेफिसिट बढ़ने का मतलब होता कि अंतरराष्‍ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग कम कर देतीं। ऐसे में पहले ही विदेशी निवेश के संकट से जूझ रहे देश में विदेशी निवेश आना और कम हो जाता। यानी दुनिया के बाजार में भारत की रेटिंग नीचे आ जाती, जो अंतत: मंदी के संकट को और बढ़ाता। ऊपर बताए गए सारे रास्‍ते बंद हो जाने के बाद सरकार के पास एक ही उपाय बचा था कि वह रिजर्व बैंक की शरण में जाए। आम आदमी को लग सकता है कि आरबीआई की शरण में जाने यानी उससे पैसा लेने में क्‍या बुराई है। आखिर को यह पैसा भी तो देश का ही है। यह बात बिल्कुल सही है। लेकिन यह पैसा उस तरह का है जैसे पारंपरिक भारतीय घरों में सोने का हाल होता है। घर की महिलाओं के पास सोना रखा रहता है और वह पीढ़ी दर पीढ़ी सास से बहू के हाथ में जाता रहता है। उसे बेचने के बारे में यानी पैसे के तौर पर उसका इस्‍तेमाल करने के बारे में शायद ही कभी सोचा जाता है। सोना तभी बेचा जाता है जब घर पर घनघोर आर्थिक संकट आ जाता है। ऐसे हालात में सोना एक बार तो घर को बचा लेता है, लेकिन इससे परिवार का अपनी आर्थिक ताकत के प्रति विश्‍वास कमजोर हो जाता है, दूसरे अगर जल्‍द ही पहले की तरह कमाई शुरू नहीं की जाती तो दोबारा बेचने के लिए सोना बचता नहीं है। यह एक तरह से कमाई के बजाय संचित धन पर निर्भर हो जाने जैसा होता है। इसीलिए दो पूर्व गवर्नर इसके खिलाफ थे। लेकिन लगता है कि अर्थव्‍यवस्‍था का संकट वाकई बहुत गहरा है, जिसके चलते आरबीआई के एक अन्‍य पूर्व गवर्नर विमल जालान की अध्‍यक्षता में बनी कमेटी ने इसकी सिफारिश की और मौजूदा अध्‍यक्ष शक्तिकांत दास ने उसे स्‍वीकार किया।

कैसे स्टार्ट हो अर्थव्‍यवस्‍था का स्‍कूटर

अगर आगे के रास्‍ते के बारे में देखें तो इसे इस तरह समझा जा सकता है कि पुराने चलन के स्‍कूटर का पेट्रोल रिजर्व में आ चुका है। रिजर्व बैंक ने इसे झुका कर पेट्रोल पाइप तक पहुंचा दिया है और इसे स्‍टार्ट भी कर दिया है। अब सरकार और उद्योगजगत की जिम्‍मेदारी है कि वे इसे जल्‍दी से पेट्रोल पंप पर ले जाएं और इसका टैंक फुल कर दें, ताकि यह दूर तक चलता रहे। इसके अलावा सरकार की एनफोर्समेंट एजेंसियों और टैक्‍स इंस्‍पेक्‍टर्स को भी धीरज से काम लेने की जरूरत है। अगर वे अपने पुराने टारगेट को हासिल करने के लिए हर कंपनी को चोर या बेईमान समझकर नोटिस भेजते रहे, तो उद्योग में व्‍याप्‍त अविश्‍वास का माहौल खत्‍म नहीं होगा। उन्‍हें एक ऐसे ट्रैफिक इंस्‍पेक्‍टर की तरह काम करना है जो गाडि़यों को रोक कर चालान काटने के बजाय, ट्रैफिक के निर्बाध संचालन पर ज्‍यादा ध्‍यान देता है। अगर वे ऐसा करेंगी तो अर्थव्‍यवस्‍था का स्‍कूटर समय रहते पेट्रोल पंप पर पहुंच सकता है। ऐसा न करने से अर्थतंत्र में झोंका गया पेट्रोल रास्‍ता तय करने के बजाय रेड लाइट पर ही फुंक जाएगा। सरकार को जो पैसा आरबीआई से मिला है उसका इस्‍तेमाल सरकार अपनी राजकोषीय जरूरतों के बजाय सीधे ऐसी परियोजनाओं में करे जो डिमांड जनरेट कर सकें। इस डिमांड से न सिर्फ ग्रोथ जनरेट हो, बल्कि रोजगार भी पैदा होने चाहिए। क्‍योंकि जॉबलेस ग्रोथ भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का दूसरा बड़ा संकट है। ऐसे में अगर बैंक उदारता से कर्ज दें, टैक्‍स कलेक्‍टर संयम से टैक्‍स वसूलें और सरकार टारगेटेड तरीके से सेक्‍टरों को आगे बढ़ने में मदद करे, तो भारतीय उद्योग जगत इस संकट से बाहर आ सकता है। एक बार पैसा एक हाथ से दूसरे हाथ में तेजी से जाने लगेगा तभी अर्थव्‍यवस्‍था पटरी पर आएगी, क्‍योंकि ये जो पौने दो लाख करोड़ रुपये अर्थव्‍यवस्‍था में झोंके जा रहे हैं, अगर वे घूमे नहीं तो जीरो हो जाएंगे। अगर वे दिनभर में दस हाथों में गए, तो 20 लाख करोड़ हो जाएंगे। क्‍योंकि पैसे का मतलब नोट नहीं होते, नोट की रफ्तार होती है। पैसे का एक हाथ से दूसरे हाथ में जाना ही उत्‍पादन है।

वहीं, मंदी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि पैसा जिसके पास पहुंचता है वही उसे दबाकर बैठ जाता है। यानी यह एक आर्थिक गतिविधि के साथ ही मानसिक गतिविधि भी है। नोटबंदी के बाद से लोगों की यह मनोदशा तेजी से बढ़ी है, टैक्‍स कलेर्क्‍स के नोटिसों ने इसे और तेज किया है। सरकार को अर्थव्‍यवस्‍था में पैसे के साथ भरोसा भी झोंकना होगा। और यह भी देखना होगा कि देश आर्थिक संकट से इस तरह बाहर आए कि दोबारा आरबीआई की तरफ न देखना पड़े। क्‍योंकि बार बार आरबीआई की तरफ देखा तो आरबीआई के पास देखने को कुछ बचेगा ही नहीं। पैसा आरबीआई की गुल्‍लक के बजाय जनता की मेहनत से आना चाहिए। फिलहाल सरकार यही करती नजर आ रही है। हालांकि उसे बहुत ज्‍यादा करते हुए भी नहीं दिखना होगा, क्‍योंकि अमेरिका के राष्‍ट्रपति रहे रोनाल्‍ड रीगन कहा करते थे - ‘‘दुनिया का सबसे खतरनाक वाक्‍य है- मैं सरकारी कर्मचारी हूं और आपकी मदद करने आया हूं।’’

बैंकिंग संकट को बढ़ने देना

रिज़र्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन के दबाव के बाद 2015 के उत्तरार्द्ध में आ कर बैंकों ने एनपीए से बोझिल अपनी बैलेंस शीट को साफ करना शुरू किया था। मोदी सरकार को ये खतरा नज़र आना चाहिए था, और सबसे पहले उन्हें इसी से निपटना चाहिए था। इसी तरह आगे चल कर शुरू किया गया बैंकों के पुनर्पूंजीकरण का काम भी बहुत पहले आरंभ हो जाना चाहिए था। राजन ने शीर्ष बकायेदारों या डिफॉल्टरों की एक सूची भी प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपी थी, पर उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। एनपीए के बोझ से त्रस्त बैंकों ने उद्योग जगत के लिए उपलब्ध ऋण की मात्रा कम कर दी, जिसने नकदी के संकट में योगदान दिया है। यूपीए-2 काल की ‘नीतिगत निष्क्रियता’ के कारण आधारभूत ढांचों और उद्योगों की अनेक परियोजनाएं रूकी पड़ी थीं। भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण संबंधी मंजूरी बड़े अवरोध साबित हो रहे थे। एक राजनेता की तरह मोदी को इन अवरोधों को दूर कर परियोजनाओं को चालू कराने का काम करना चाहिए था। पर, भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधनों से कदम पीछे खींच कर उन्होंने साफ कर दिया कि भारत की प्रगति के मुकाबले उनकी प्राथमिकता राजनीति है। शायद राहुल गांधी द्वारा उन्हें ‘सूट-बूट की सरकार’ कहे जाने के कारण। बुरे कर्ज का संकट पैदा करने में परियोजनाओं के स्थगन की बड़ी भूमिका रही है, खास कर बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए धन उपलब्ध कराने वाले आईएलएंडएफएस के मामले में।

नरेंद्र मोदी ने एक के बाद एक बड़ी योजनाएं शुरू कीं और हरेक को इतने शोरशराबे के साथ आरंभ किया गया मानो कोई क्रांति होने वाली हो। लेकिन उनमें से अधिकतर अप्रभावी रहीं। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, ये इंडिया, वो इंडिया… उनमें से कोई भी बदलाव के वादों पर खरा नहीं उतरा। ‘व्यवसाय करने की सहूलियत’ की रैंकिंग में हेरफेर की गई क्योंकि वास्तविकता से ज़्यादा महत्व रैंकिंग का हो गया है। अरुण शौरी की बातें हमेशा मोदीनॉमिक्स – आर्थिक प्रबंधन के बजाय सुर्खियों का प्रबंधन – पर भारी पड़ेंगी। ज़रूरी पहलकदमियों की बजाय मोदी ने 1।3 अरब लोगों पर आर्थिक नीमहकीमी थोपने का काम किया। काले धन को रातोंरात खत्म करने के लिए की गई नोटबंदी से चार-पांच लाख करोड़ रुपये जुटाने की उम्मीद लगाई गई थी, पर नाममात्र की रकम ही हाथ आ सकी। नोटबंदी ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को ठप करने, अरसे से चली आ रही आर्थिक व्यवस्थाओं को बाधित करने और परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में रोजगार को खत्म करने का काम किया। हम अभी तक दुष्परिणाम झेल रहे हैं, पर इससे फायदा कुछ भी नहीं हुआ। सरकार ने वही किया जो वह अच्छे से कर सकती है: उस रिपोर्ट को दबाने का काम, जिसमें कि नोटबंदी के साल कॉर्पोरेट निवेश में 60 प्रतिशत की गिरावट को दिखाया गया था। नोटबंदी ने निवेशकों में नीतिगत अनिश्चितता का भय भी पैदा किया: किसे पता मोदी कब टीवी पर अवतरित हो कर सब कुछ बदल डालें। बाज़ार में 2,000 के नोटों को बंद किए जाने की अफवाहें भी चलती रहती हैं। नोटबंदी के साथ ही बिज़नेस के तिरस्कार की प्रवृति का भी उभार हुआ। व्यवसाय जगत के लोगों को भ्रष्ट और बेईमान करार देते हुए कहा जा रहा था कि मोदी ने ऐसे लोगों को लाईन में लगने पर मजबूर कर दिया। सच तो ये है कि नोटबंदी के बहाने सबने अपने काले धन को सफेद किया, पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए व्यवसायियों को बदनाम किए जाने से निवेशकों ने बाज़ार से और भी दूरी बना ली। आपको नोटबंदी की तरफदारी करने वाले सनकी अब भी मिल जाएंगे, पर ये बताने वाला शायद ढूंढने पर भी नहीं मिले कि आखिर वस्तु एवं सेवा कर से भारतीय अर्थव्यवस्था कैसे लाभांवित हुई। नोटबंदी के विपरीत, जीएसटी का विचार सही था। पर यदि अच्छे प्रस्तावों को भयावह समस्या का रूप दिए जाने का उदाहरण देखना हो तो मोदी सरकार के जीएसटी लागू करने की प्रक्रिया पर गौर कर सकते हैं। मोदी ने इसे अच्छे और सरल कर के रूप में परिभाषित किया था, पर यह दोनों में से कुछ भी साबित नहीं हो सका। इसने छोटे और मध्यम आकार के व्यवसायों की मुश्किलों को बढ़ाने का ही काम किया। पांच अलग-अलग दरों और पहले ही दिन से नियमों के अनुपालन की अनिवार्यता वाले जीएसटी को इतनी जल्दबाज़ी में लागू किया गया कि इसके सॉफ्टवेयर का पूर्वपरीक्षण तक नहीं किया गया था। जिसके प्रावधानों में अनेकों बार बदलाव किए गए, मानो चार्टर्ड अकाउंटेंट कोई सुपरकंप्यूटर हों। जीएसटी में अब भी बहुत से सुधारों की ज़रूरत है।

मुद्रास्फीति को बहुत ही कम रखना

मोदी सरकार की नीति बुरे अर्थशास्त्र पर आधारित अच्छी राजनीति की है। सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्यों या नरेगा मेहनताने में वृद्धि कर ग्रामीण भारत में नकदी डालने की अनिच्छुक रही है। कम मुद्रास्फीति मोदी की चुनावी जीतों में मददगार होती है, पर इसका दुष्परिणाम घटी क्रयशक्ति और मांग में गिरावट के रूप में सामने आता है। लोग ना तो बचा पा रहे हैं और ना ही खर्च कर पा रहे हैं – क्योंकि उनकी आमदनी नहीं बढ़ रही है। भारत को सफेद हाथी साबित हो रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश का एक बड़ा आर्थिक सुधार कार्यक्रम चलाने की दरकार है। सार्वजनिक क्षेत्र की अनेक इकाइयां इस श्रेणी में आती हैं। इनमें से कई अपने नुकसानों को कम दिखान के लिए सरकारी बैंकों से कर्ज लेती रहती हैं। इससे पूंजी का गैर-उत्पादक परिसंपत्तियों में संग्रहण होता है। अटल बिहारी वाजपेयी के विपरीत, मोदी ने विनिवेश को अपनी प्राथमिकताओं में नहीं रखा है। बातें ज़रूर की जाती हैं और कुछ बाजीगरी भी, पर वास्तविक इरादा नहीं दिखा है। यदि मोदी का उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को बेचने की बजाय उन्हें पुनर्जीवित करने का है, तो इसके संकेत भी नहीं दिखे हैं। वास्तव में, प्रमुख सरकारी उपक्रम घाटे में जा रहे हैं।

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