होली पर पर्यटन

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हर राज्य में होता है होली का अलग अंदाज बेंगलूरु, (परिवर्तन)। होली के दिन हर वर्ग के लोग टोलियां बनाकर अपने घर से निकलते हैं और दूसरों के घर जाकर रंग लगाते हैं, मिठाई खाते, खिलाते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं प्रदान करते हैं। कई जगह तो इन टोलियों की ओर से सांस्कृतिक आयोजन भी किये जाते हैं। यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुलेंडी कहा जाता है, लोग एक दूसरे को रंग लगाते हैं और ढोल या डीजे बजा कर होली के गीत गाये और बजाये जाते हैं।

ब्रज की होली की बात है निराली

ब्रज क्षेत्र में तो होली पूरे 9 दिनों के त्योहार के रूप में मनाई जाती है। धुलेंडी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है। होली के इन 9 दिनों का उल्लास और मस्ती ब्रज क्षेत्र में देखते ही बनती है। बरसाने की लठमार होली काफी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। मथुरा और वृंदावन में तो 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है।


लड्डुओं से भी खेली जाती है होली

यूं तो होली का त्योहार भारत सहित अन्य देशों में विभिन्न नामों से मनाया जाता है, लेकिन उन सभी में ब्रज की होली का अपना अलग महत्व है। ब्रज में होली वसंत पंचमी से चैत्र कृष्ण पंचमी तक मनाई जाती है। ब्रज की होली देशभर में प्रसिद्ध है। ब्रज में खेली जाने वाली होली में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य होली की झलक हमें मिलती है। यही कारण है कि इसे देखने के लिए हर साल हजारों लोग ब्रज मंडल में इकट्‌ठा होते हैं। ब्रज के सभी मंदिरों में हर रोज भगवान श्रीकृष्ण के साथ अबीर, रंग, गुलाल की होली खेली जाती है। ब्रज के सभी क्षेत्र के मंदिरों में, जिनमें मथुरा का द्वारकाधीश मंदिर, जन्मभूमि मंदिर, वृंदावन का बांकेबिहारी मंदिर और इस्कॉन का हरे रामा-हरे कृष्णा मंदिर आदि शामिल हैं, में प्रतिदिन चंग (एक प्रकार का वाद्य यंत्र) बजा कर रास गीत गाए जाते हैं और नृत्य होता है। होली के पहले लड्डू मार होली खेली जाती है। जिसमें पुजारी श्रद्धालुओं पर लड्डू बरसाते हैं।

ब्रज की होली में प्रेम और भक्ति के रंग चारों तरफ बिखरे दिखाई देते हैं। ब्रजवासी जहां भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम में मग्न दिखाई देते हैं, वहीं बाहर से आए श्रद्धालु भी भक्ति-भाव में डूब जाते हैं। ब्रज में खेली जाने वाली होली में प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। फूलों और अन्य प्राकृतिक पदार्थों से बनाए गए रंगों के उपयोग से होली की मर्यादा बनी रहती है और आनंद बढ़ जाता है।


होली के दूसरे दिन यहां किया जाता है शक्ति प्रदर्शन

सिक्खों के पवित्र धर्मस्थान श्री आनंदपुर साहिब में होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते हैं। सिक्खों के लिये यह धर्मस्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहां पर होली पौरुष के प्रतीक पर्व के रूप में मनाई जाती है। इसीलिए दशम गुरू गोविंदसिंहजी ने होली के लिए पुल्लिंग शब्द होला मोहल्ला का प्रयोग किया। गुरुजी इसके माध्यम से समाज के दुर्बल और शोषित वर्ग की प्रगति चाहते थे। होला मोहल्ला का उत्सव आनंदपुर साहिब में छ: दिन तक चलता है। इस अवसर पर, भांग की तरंग में मस्त घोड़ों पर सवार निहंग, हाथ में निशान साहब उठाए तलवारों के करतब दिखा कर साहस, पौरुष और उल्लास का प्रदर्शन करते हैं। पंज प्यारे जुलूस का नेतृत्व करते हुए रंगों की बरसात करते हैं और जुलूस में निहंगों के अखाड़े नंगी तलवारों के करतब दिखते हुए बोले सो निहाल के नारे बुलंद करते हैं। आनंदपुर साहिब की सजावट की जाती है और विशाल लंगर का आयोजन किया जाता है। कहते हैं गुरु गोविंद सिंह ने स्वयं इस मेले की शुरुआत की थी। यह जुलूस हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहती एक छोटी नदी चरण गंगा के तट पर समाप्त होता है।


कुमाऊं मंडल में होली पर सजती हैं महफिलें

होली में जिस तरह रंगों की विभिन्नता देखने को मिलती है उसी प्रकार इसको मनाये जाने के प्रकार में भी देश के विभिन्न प्रांतों में भिन्नता देखने को मिलती है। इस दिन उत्तराखंड के कुमाउं की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं तो हरियाणा में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने का सब आनंद लेते हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल की सरोवर नगरी नैनीताल और अल्मोड़ा जिले में होली के अवसर पर गीत बैठकी का आयोजन किया जाता है। इसमें होली के गीत गाए जाते हैं। यहां होली से काफी पहले ही मस्ती और रंग छाने लगता है। इस रंग में सिर्फ अबीर-गुलाल का टीका ही नहीं होता बल्कि बैठकी होली और खड़ी होली गायन की शास्त्रीय परंपरा भी शामिल होती है।बरसाने की लट्ठमार होली के बाद अपनी सांस्कृतिक विशेषता के लिए कुमाऊंनी होली को याद किया जाता है। शाम के समय कुमाऊं के घर-घर में बैठक होली की सुरीली महफिलें जमने लगती हैं। गीत बैठकी में होली पर आधारित गीत घर की बैठक में राग-रागिनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं। इन गीतों में मीराबाई से लेकर नज़ीर और बहादुर शाह जफऱ की रचनाएं सुनने को मिलती हैं। गीत बैठकी की महिला महफिलें भी होती हैं। महिलाओं की महफिलों का रुझान लोक गीतों की ओर होता है। होली गाने की ये परंपरा सिर्फ कुमाऊं अंचल में ही देखने को मिलती है। महाराष्ट्र में सूखा गुलाल खेलने और गोवा में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है तथा पंजाब में होला मोहल्ला में सिखों की ओर से शक्ति प्रदर्शन किये जाने की परंपरा है।


मालवा अंचल में होली पर होता है भगोरिया उत्सव

भगोरिया मध्य प्रदेश के मालवा अंचल (धार, झाबुआ, खरगोन आदि) के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। भगोरिया के समय धार, झाबुआ, खरगोन आदि क्षेत्रों के हाट-बाजार मेले का रूप ले लेते हैं और हर तरफ फागुन और प्यार का रंग बिखरा नजर आता है। भगोरिया हाट-बाजारों में भील समाज के युवक-युवती बेहद सज-धज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूंढने आते हैं। इनमें आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीका भी बेहद निराला होता है।

सबसे पहले लड़का लड़की को पान खाने के लिए देता है। यदि लड़की पान खा ले तो लड़की की हां समझी जाती है। इसके बाद लड़का लड़की को लेकर भगोरिया हाट से भाग जाता है और दोनों विवाह कर लेते हैं। इसी तरह यदि लड़का लड़की के गाल पर गुलाबी रंग लगा दे और जवाब में लड़की भी लड़के के गाल पर गुलाबी रंग मल दे तो भी रिश्ता तय माना जाता है।


ऐसे मनाते हैं गोवा में होली

गोवा का नाम सुनते ही मन में बरबस ही समुद्र की लहरें, दूर तक फैला रेतीला तट तथा वहां के खुशनुमा माहौल की याद आ जाती है। गोवा में किसी समय पुर्तगालियों का शासन था। जिसके कारण वहां की परंपराएं व त्योहार आज भी प्रभावित नजर आती हैं। होली का उत्सव भी वहां अलग ही अंदाज में मनाया जाता है।

गोवा के निवासी होली को कोंकणी में शिमगो या शिमगोत्सव कहते हैं। वे इस अवसर पर वसंत का स्वागत करने के लिए रंग खेलते हैं। इसके बाद भोजन में तीखी मुर्ग या मटन की करी खाते हैं, जिसे शगोटी कहा जाता है। मिठाई भी खाई जाती है। गोवा में शिमगोत्सव की सबसे अनूठी बात पंजिम का वह विशालकाय जलूस है, जो होली के दिन निकाला जाता है। यह जलूस अपने गंतव्य पर पहुँच कर सांस्कृतिक कार्यक्रम में परिवर्तित हो जाता है। इस कार्यक्रम में नाटक और संगीत होते हैं, जिनका विषय साहित्यिक, सांस्कृतिक और पौराणिक होता है। हर जाति और धर्म के लोग इस कार्यक्रम में उत्साह के साथ भाग लेते हैं।


छत्तीसगढ़ में खेली जाती है ‘होरी’

छत्तीसगढ़ में होली को होरी के नाम से जाना जाता है। इस पर्व पर लोक गीतों की परंपरा है। वसंत के आते ही छत्तीसगढ़ की गली-गली में नगाड़े की थाप के साथ राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंग भरे गीत जन-जन के मुंह से बरबस फूटने लगते हैं। किसानों के घरों में होली से पहले ही नियमित रूप से हर दिन पकवान बनने की परंपरा शुरू हो जाती है, जिसे तेलई चढऩा कहते हैं।छत्तीसगढ में लड़कियां विवाह के बाद पहली होली अपने माता-पिता के गांव में ही मनाती है एवं होली के बाद अपने पति के गांव में जाती हैं। इसके कारण होली के समय गांव में नवविवाहित युवतियों की भीड़ रहती है। गांव के चौक-चौपाल में फाग के गीत होली के दिन सुबह से देर शाम तक निरंतर चलते हैं। रंग भरी पिचकारियों से बरसते रंगों एवं उड़ते गुलाल में मदमस्त छत्तीसगढ़ के लोग अपने फागुन महाराज को अगले वर्ष फिर से आने की न्यौता देते हैं। छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्य प्रदेश के मालवा अंचल तथा दक्षिण गुजरात के आदिवासी इलाकों में यह पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। बिहार में फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में इस दिन डीजे और ढोल की थापों पर लोग नाचते गाते और एक दूसरे को गुजिया खिलाते नजर आते हैं।



बरसाना में पुरुषों को डंडे से पीटा जाता है

भारत में होली के मौके पर कई अनोखी परंपराएं देखने को मिलती हैं। बरसाना की लट्ठमार होली देश में ही नहीं विदेश में भी प्रसिद्ध है। राधाकृष्ण की लीलाएं इसी गांव से संबंधित हैं। बरसाने की लट्ठमार होली फल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इस दिन नंद गांव के ग्वाल-बाल होली खेलने के लिए राधा के गांव बरसाने जाते हैं और बरसाना गांव के लोग नंद गांव में जाते हैं। इन पुरूषों को ‘होरियारे’ कहा जाता है। जब नाचते, झूमते लोग गांव में पहुंचते हैं तो औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते हैं, लेकिन खास बात यह है कि यह सब मारना, पीटना हंसी-खुशी के वातावरण में होता है।

औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं। बाकी आस-पास खड़े लोग बीच-बीच में रंग बरसाते हुए दिखते हैं। इस होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग बरसाना आते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब श्रीकृष्ण होली के लिए गोपियों को प्रतीक्षा करवाते थे, तब गोपियां उन पर गुस्सा होकर लाठियां बरसाती थीं। यही लट्ठमार होली आज भी बरसाना की लड़कियों और नंद गांव के लड़कों के बीच खेली जाती है।



बंगाल में बसंत पर्व

बंगाल में होली को 'दोल यात्रा' व 'दोल पूर्णिमा' कहते हैं और होली के दिन श्री राधा और कृष्ण की प्रतिमाओं को डोली में बैठाकर पूरे शहर में घुमाया जाता है। बंगाल में होली को 'बसंत पर्व' भी कहते हैं। इसकी शुरुआत रवीन्द्र नाथ टैगोर ने शान्ति निकेतन में की थी। उड़ीसा में भी होली को 'दोल पूर्णिमा' कहते हैं और इस दिन भगवान जगन्नाथ जी की डोली निकाली जाती है।


राजस्थान की माली होली

राजस्थान में मुख्यतः तीन प्रकार की होली होती है। माली होली- इसमें माली जात के मर्द, औरतों पर पानी डालते हैं और बदले में औरतें मर्दों की लाठियों से पिटाई करती हैं। इसके अलावा गोदाजी की गैर होली और बीकानेर की डोलची होली भी काफी चर्चित हैं।


कर्नाटक का कामना हब्बा

कर्नाटक में यह त्योहार कामना हब्बा के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र से जला दिया था। इस दिन कूड़ा-करकट फटे वस्त्र, एक खुली जगह एकत्रित किए जाते हैं तथा इन्हें अग्नि को समर्पित किया जाता है।

सामाजिक जुड़ाव होता है

ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व से सामाजिक जुड़ाव काफी गहरा देखने को मिलता है क्योंकि होली के पंद्रह बीस दिन पहले से ही गोबर के पतले पतले उपले और अंजुलि के आकार की गुलेरियां बनाना प्रारम्भ हो जाता है। इनके बीच में बनाते समय ही उंगलि से एक छेद बना दिया जाता है। इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं। होलिका दहन के दो तीन दिन पूर्व खुले मैदानों और अन्य निर्धारित स्थानों पर होली के लकड़ी कण्डे आदि रखना प्रारम्भ कर दिया जाता है। उनमें ही रख दी जाती हैं मालाएं। अनेक क्षेत्रों में इन सामूहिक होलिकाओं के साथ−साथ एक मकान में रहने वाले सभी परिवार मिलकर अतिरिक्त रूप से भी होलियां जलाते हैं। होली की अग्नि में पौधों के रूप में उखाड़े गए चने, जौ और गेहूं के दाने भूनकर परस्पर बांटने की भी परम्परा है।

बनते हैं पकवान

होली के दिन घरों में गुजिया, खीर, पूरी और गुलगुले आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। बेसन के सेव और दही बड़े भी उत्तर प्रदेश में इस दिन खूब बनाये जाते हैं। इस पर्व पर कांजी, भांग और ठंडाई विशेष पेय होते हैं।

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