महाकालेश्वर के दर्शन से होती है मोक्ष की प्राप्ति

Total Views : 213
Zoom In Zoom Out Read Later Print

बेंगलूरु, (परिवर्तन)।महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित, महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है।

स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यन्त पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। १२३५ ई. में इल्तुत्मिश के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंस किए जाने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया, इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है।

मंदिर का इतिहास

इतिहास के जानकारों से पता चलता है कि उज्जैन में सन् ११०७ से १७२८ ई. तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में अवंति की लगभग ४५०० वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थी। लेकिन १६९० ई. में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और २९ नवंबर १७२८ को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन १७३१ से १८०९ तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में यहाँ दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटीं - पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।

मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुँचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर शिवलिंग स्थापित है। महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा-सा जलस्रोत है जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन १९६८ के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया था। लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा १९८० के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया। महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है जिसके निर्देशन में यहाँ की व्यवस्था सुचारु रूप से चल रही है। हाल ही में इसके ११८ शिखरों पर १६ किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है। अब मंदिर में दान के लिए इंटरनेट सुविधा भी चालू की गई है।

महाकालेश्वर उज्जैन दर्शन का समय

महाकालेश्वर मंदिर सुबह 4 बजे से रात के 11 बजे तक खुला रहता है। पर्यटक सुबह 8 बजे से 10 बजे तक, फिर 10:30 से शाम के 5 बजे तक महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद शाम 6 से 7 बजे तक और फिर रात 8 से 11 बजे तक यहां आखिरी दर्शन किए जा सकते हैं।

महाकालेश्वर की भस्म आरती प्रमुख आकर्षण है। किस्मत वालों को ही ये आरती देखने को मिल पाती है। भस्म आरती काउंटर मंदिर के मेन गेट पर ही बना हुआ है। यहां सुबह 10:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक आधार कार्ड दिखाकर एक फॉर्म लेना होगा। इस फॉर्म को भरकर इसके साथ आधार कार्ड की फोटो कॉपी लगाएं और सुबह 11:30 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक काउंटर पर जमा कर दें। भस्म आरती का चयन पहले आओ पहले पाओ के आधार पर होता है। जिसमें केवल 400 से 500 लोगों को ही एंट्री मिलती है।

अगर आप भस्म आरती के लिए चयनित हो गए हैं तो शाम 7 बजे तक आपके पास मैसेज आ जाएगा। इसके बाद शाम 7:30 बजे से 10 बजे के बीच मैसेज और ऑरिजनल आधार कार्ड  दिखाकर आप भस्म आरती के टिकट ले सकते हैं। भस्म आरती के दौरान पुरूषों को धोती और महिलाओं को साड़ी पहनना जरूरी है। बता दें कि भस्म आरती सुबह 4 बजे शुरू होती है, जिसके लिए आपको कुछ देर पहले वहां पहुंचना पड़ता है।

कैसे पहुंचे महाकालेश्वर

उज्जैन महाकालेश्वर पहुंचने के लिए भारत के सभी प्रमुख शहरों से ट्रेनें मिल जाती हैं। जबकि अगर आप फ्लाइट से महाकालेश्वर जाना चाहते हैं तो आपको पहले इंदौर के देवी अहिल्याबाई एयरपोर्ट पर विजिट करना होगा। यहां से उज्जैन 60 किमी दूर है। फरवरी से मार्च का महीना महाकालेश्वर आने के लिए अच्छा माना जाता है।

कब जाएं महाकालेश्वर

महाकाल के दर्शन करने के लिए सर्दियों का समय सबसे अच्छा है, क्योंकि साल के इस  समय के दौरान यहां का मौसम हल्का और सुखद होता है। नवंबर से फरवरी के समय तापमान 3 डिग्री रहता है और 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। इसके अलावा श्रावण माह में दूर दूर से श्रद्धालु महाकाल के दर्शन करने आते हैं।

See More

Latest Photos