दलबदल का मर्ज

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आम चुनाव की घोषणा होते ही दलबदल शुरू हो जाना कोई नई-अनोखी बात नहीं, लेकिन यह भी साफ है कि अब यह काम बिना किसी शर्म-संकोच के हो रहा है। दो दिन पहले तक दल विशेष की भयंकर आलोचना करने वाले नेता जिस तरह बिना किसी हिचक के उसी दल में शामिल हो जा रहे हैं, वह हैरानी भरा है। भाजपा में शामिल हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टॉम वडक्कन का मामला ऐसा ही है। यह अजीब है कि वह जब तक कांग्रेस में थे, तो पार्टी नेतृत्व के करीबी लोगों में गिने जाते थे, लेकिन भाजपा में जाते ही उनके पुराने साथियों की ओर से यह कहा जा रहा है कि वह तो कोई बड़े नेता ही नहीं थे। यह झेंप मिटाने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं।


कुछ ऐसा ही मामला जनता दल (एस) के नेता दानिश अली का है। वह कल तक अपनी पार्टी और कांग्रेस के बीच तालमेल बैठा रहे थे, लेकिन अचानक बसपा में शामिल हो गए। टॉम वडक्कन और दानिश अली का मामला तो एक बानगी भर है। ऐसे दलबदल लगातार सामने आ रहे हैं और यह तय है कि इसमें अभी और तेजी आनी है। ज्यादातर दलबदल इसीलिए हो रहे हैैं, क्योंकि चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं को या तो प्रत्याशी नहीं बनाया जा रहा है या फिर उन्हें मनपसंद सीट नहीं मिल रही है। कुछ नेता ऐसे भी हैं, जो केवल बेहतर मौके की ताक में रहते हैं। इस कारण वे हर बार किसी नए दल से चुनाव लड़ते हैं। आखिर ऐसे नेता किस तरह विचारधारा आधारित राजनीति को बल दे सकते हैं?

मुश्किल यह है कि राजनीतिक दल भी जिताऊ उम्मीदवार की तलाश में या फिर विरोधी दल के मनोबल या समीकरण को प्रभावित करने के लिए दलबदलुओं को खुशी-खुशी गले लगाना पसंद करते हैं। इस क्रम में वे यह भी नहीं देखते कि कल का जो विरोधी आज उनके दल में शामिल हो रहा है, वह परसों तक उन्हें समाज और देश के लिए खतरा बताया करता था। नि:संदेह नेता अपने राजनीतिक हित की परवाह करेंगे ही, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उन्हें यह ढोंग करने की सुविधा भी मिले कि वे मूल्य-मर्यादा की राजनीति कर रहे हैं? इस ढोंग का कोई इलाज खोजा ही जाना चाहिए, क्योंकि भारतीय राजनीति एक ऐसे युग में प्रवेश करती जा रही है, जिसका कोई नियम नहीं दिखता। बड़ी संख्या में हो रहे दलबदल से यह भी पता चल रहा है कि विचारधारा के आधार पर राजनीति करने के नाम पर जनता को बेवकूफ ही बनाया जाता है। आखिर विचारधारा कोई ऐसी चीज नहीं कि रातोंरात बदल जाए।

यह समझ में आता है कि कोई नेता समान विचारधारा वाले किसी दल में शामिल हो जाए, लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि खुद को कांग्रेस का सिपाही बताने वाला अचानक भाजपा में चला जाए या फिर भाजपा की विचारधारा को अपने जीवन का लक्ष्य बताने वाला रातोंरात पाला बदलते हुए कांग्रेसी बन जाए? आखिर जब वस्त्र बदलने की तरह से राजनेताओं द्वारा यूं विचारधारा बदली जाए तो यह समझ लिया जाना चाहिए कि केवल संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों को महत्ता दी जा रही है। इससे राजनीति और अधिक अनैतिक ही होगी।

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