बाढ़ यानि सालाना त्रासदी

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। असम में बाढ़ की ख़बर से मनोज का पूरा परिवार परेशान है। वो कहते हैं, "रोजाना अख़बार में बाढ़ से हो रही तबाही की ख़बर पढ़कर घबराहट होने लगती है। राज्य में सभी नदियों का पानी लगातर बढ़ रहा है। लेकिन धनश्री नदी में अभी ज्यादा पानी नहीं हुआ है। मैं रोज सुबह जल्दी उठकर नदी में पानी का स्तर देखता हूं। पता नहीं कब अचानक नदी में पानी आ जाए।" मनोज के घर के सामने से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी एक पक्की सड़क निकलती है जो महज 30 मीटर आगे जाकर धनश्री नदी में ख़त्म हो जाती है।

ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में से एक धनश्री के किनारे अब केवल पांच परिवार रहते हैं। अधिकतर लोग इस जगह को छोड़कर जा चुके हैं लेकिन इन पांच परिवारों के पास दूसरी कोई जमीन नहीं है, इसलिए वो वहीं रहने को मजबूर हैं। यह स्थिति भारत के कई राज्यों के कई गांवों में बस रहे लोगों की है, जहां भारी बारिश आएं या बाढ़ आए लोग उसी जगह रहने को मजबूर है। मजबूरी ऐसी जिससे जान जाने की भी परवाह नहीं है। मनोज का कहना है कि वैसे भी जान का डर किसे है नदी के किनारे घर होने से हर रोज़ रात को सोते वक्त ऐसा कई बार मन में आता है कि रात को सोने के बाद दोबारा सुबह देख भी पाउंगा कि नहीं। इसी डर के साथ हम कई वर्षों से जिंदगी गुज़र-बसर कर रहे हैं। देश में बाढ़ से हर साल तबाही होती है और इस बाढ़ से जानमाल का भी बहुत नुकसान होता है। देश में कम से कम दस ऐसे क्षेत्र हैं, जहां प्रतिवर्ष बाढ़ का आना लगभग तय माना जाता है लेकिन अगर बाढ़ के कारण सारे देश में हाहाकार मचा हो तो इन क्षेत्रों में मौसमी विनाश की कल्पना कर पाना भी संभव नहीं है। पिछले कुछ दशकों के दौरान उत्तर और मध्य भारत जैसे क्षेत्र में भी लोग मूसलाधार बारिश और एकाएक बड़ी मात्रा में बारिश होने, बादल फटने की घटनाओं से सामना करने लगे हैं। देश में ज्यादातर नदी के किनारों और नदियों के डेल्टाओं में बाढ़ भारी कहर बरपाती है। खबरों के मुताबिक, इस वर्ष असम और बिहार में आई बाढ़ से करीब 80 लोगों की मौत हो चुकी है। भारत तीन ओर से समुद्रों (अरब सागर, हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी) से घिरा है। भारत के ज्योलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया का कहना है कि इस कारण यह देश बाढ़ की विभीषिका को लेकर संवेदनशील है और समूचे देश में ऐसे इलाके हैं, जो कि हर वर्ष बाढ़ का सामना करते हैं। देश में ऐसे कुल इलाकों की संख्या 12.5 प्रतिशत है। भारतीय मौसम विभाग से जुड़े वैज्ञानिक डॉक्टर मृत्युंजय मोहापात्रा कहते हैं, "बाढ़ के लिए कई कारक ज़िम्मेदार होते हैं। इनमें जलाशयों की संचयन क्षमता, ज़मीन में नमी की मात्रा, नदी में अलग-अलग जगहों पर पानी का स्तर, नदी रोकने के लिए बनाए गए बांधों की मज़बूती और नदी के तंत्र में आने वाली कृत्रिम रुकावटें शामिल हैं।" मौसम का पूर्वानुमान करने के मामले में भारत की क्षमता अपने पड़ोसी देशों की तुलना में कहीं ज़्यादा है। भारतीय मौसम विभाग अपने उपग्रहों और रडार स्टेशनों की मदद से आगामी पांच दिनों तक के मौसम का पूर्वानुमान करने में सक्षम है। इसके साथ ही बारिश की मात्रा से जुड़े आंकड़े भी हासिल हो जाते हैं। सरकार के पूर्वानुमान और निगरानी विभाग के अंतर्गत 226 फील्ड स्टेशन हैं, जो बड़ी-बड़ी नदियों के जल स्तर पर नज़र रखते हैं। लेकिन इन विभागों का ज़्यादातर काम 19 बड़ी नदी घाटियों पर केंद्रित है।

भ्रष्टाचार करने का एक और उपाय, बाढ़ 

लगभग हर साल की तरह इस साल भी कई राज्यों में बाढ़ ने दस्तक दे दी है। पिछले क़रीब दो हफ़्तों से लगातार हो रही बारिश के कारण नदियां उफ़ान पर हैं। नेपाल से सटे सीमावर्ती ज़िलों में हाहाकार मचा हुआ है। असम और बिहार में पिछले साल भी बाढ़ आई थी। हालांकि, असर उतना ज़्यादा नहीं था। पर उससे एक साल पहले यानी साल 2017 में बाढ़ ने पूरे उत्तर बिहार में भीषण तबाही मचायी थी। कोसी क्षेत्र में तटबंधों से सटे कुछ इलाक़े तो ऐसे हैं, जहां हर साल बाढ़ आती है। लाखों के जान-माल का नुक़सान होता है। ऐसा लगता है मानो बाढ़ यहां के लोगों की नियति बन चुकी हो। बिहार में बाढ़ कब से आ रही है, कहना संभव नहीं है। लेकिन भारत के आज़ाद होने के बाद पहली बार 1953-54 में बाढ़ को रोकने के लिए एक परियोजना शुरू की गई। नाम दिया गया 'कोसी परियोजना।' 1953 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा शुरू हुई इस परियोजना के शिलान्यास के समय यह कहा गया था कि अगले 15 सालों में बिहार की बाढ़ की समस्या पर क़ाबू पा लिया जाएगा। देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने साल 1955 में कोसी परियोजना के शिलान्यास कार्यक्रम के दौरान सुपौल के बैरिया गांव में सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि, "मेरी एक आंख कोसी पर रहेगी और दूसरी आंख बाक़ी हिन्दुस्तान पर।" 1965 में लाल बहादुर शास्त्री द्वारा कोसी बराज का उद्घाटन किया गया। बैराज बना कर नेपाल से आने वाली सप्तकोशी के प्रवाहों को एक कर दिया गया और बिहार में तटबंध बनाकर नदियों को मोड़ दिया गया। परियोजना के तहत समूचे कोसी क्षेत्र में नहरों को बनाकर सिंचाई की व्यवस्था की गई। कटैया में एक पनबिजली केंद्र भी स्थापित हुआ जिसकी क्षमता 19 मेगावॉट बिजली पैदा करने की है।  लेकिन सवाल ये उठता है कि कोसी परियोजना जिन उद्देश्यों के साथ शुरू की गई थी, क्या वे उद्देश्य पूरे हुए? पहला जवाब मिलेगा, "नहीं।" कहां तो 15 साल के अंदर बिहार में बाढ़ रोक देने की बात कही गई थी, वहीं आज 66 साल बाद भी बिहार लगभग हर साल बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है। बिहार में बाढ़ तभी आता है जब नदियों का जलस्तर बढ़ने लगता है और तेज़ बहाव के कारण तटबंध टूटने लगते हैं। बीते 66 सालों के दरम्यान कई बार ऐसी भी बाढ़ आयी है जो सबकुछ बहा ले गयी। अगस्त 1963 में डलवा में पहली बार तटबंध टूटा था। फिर अक्तूबर 1968 में दरभंगा के जमालपुर में और अगस्त 1971 में सुपौल के भटनिया में तटबंध टूटे। सहरसा में तीन बार अगस्त 1980, सितंबर 1984 और अगस्त 1987 में बांध टूटे। जुलाई 1991 में भी नेपाल के जोगिनियां में कोसी का बांध टूट गया था। 2008 में फिर से कुसहा में बांध टूटा, जिसने भारी तबाही मचाई। इस बार अब तक दो जगहों पर कमला बलान तथा झंझारपुर में तटबंध टूटे हैं। इस तरह कोसी परियोजना अपने सबसे बड़े उद्देश्य को साधने में अब तक नाकाम रही है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या तटबंध बनाकर नदियों को मोड़ने का फ़ैसला ही ग़लत था? 2017 में बागमती के किनारे बनाए जा रहे तटबंध को रुकवाने के लिए आंदोलन करने वाले पर्यावरण कार्यकर्ता अनिल प्रकाश कहते हैं, "बांध बनाकर नदी को मोड़ना हमेशा से ख़तरनाक रहा है।" "अंग्रेजों के समय में भी यह प्रस्ताव आया था। मगर उन्होंने इस पर अमल नहीं किया। क्योंकि वे जानते थे कि तटबंध तोड़कर आया पानी सीधे नदी से आ रहे पानी से ज़्यादा ख़तरनाक है।" वो कहते हैं, "नदी को बांध कर नहीं रख सकते। तटबंध तब टूटते हैं जब वे कमज़ोर होते हैं और जलस्तर बढ़ने के बाद बहाव को सह नहीं पाते। जहां तक बैराज की बात है तो लगातार सिल्ट और गाद आने से वहां की सतह उथली होती चली गई है।" "जलस्तर पहले से बढ़ा हुआ है। नेपाल में जम कर पहाड़ काटे जा रहे हैं। इसी तरह अगर चलता रहा तो अभी तो तटबंध टूट रहे हैं, कल को बैराज भी उखड़कर बह जाएगा।" अररिया ज़िले के डीएम वैजनाथ प्रसाद कहते हैं, "कोई मतलब नहीं है। अब तो पानी आ गया है। तटबंधों की मरम्मती तो तब की जानी थी जब पानी प्रवेश नहीं कर पाया था। हमारे यहां तटबंधों पर काम नहीं चल रहा है। हम राहत और पुनर्वास के काम पर फोकस किए हैं।" स्थानीय पत्रकार दिनेश चंद्र झा कहते हैं, "यही तो घोटाला है। जहां तक पानी पहुंच गया है वहां कंक्रीट और बालू के बैग डालकर क्या मतलब है। किसी को कैसे दिखाइएगा कि कितने बैग डाले गए। क्योंकि सब तो पानी के नीचे है। 100 बैग डालकर हज़ार का भी एस्टिमेट बनाएं तो कोई जांच करने वाला नहीं है। अगर कोई जांच करेगा भी तो क्या? कॉन्ट्रैक्टर के लिए यह कहना बड़ा आसान हो जाता है कि मैंने सबकुछ किया था मगर धार सब बहा ले गई।" इस प्रोजेक्ट का एक मुख्य उद्देश्य यह भी है कि कोसी के पानी को नहरों के ज़रिए निकाल कर सिंचाई की सुविधा सुनिश्चित की जाए। इसके लिए दो कैनालों (पूर्वी से पश्चिमी) से वितरणी नहरें निकालनी थी। फिलहाल तो सब जगह पानी ही पानी है क्योंकि बाढ़ आई है। लेकिन स्थानीय निवासी कहते हैं कि वितरणी में अब पानी नहीं आता। कैनाल में तो पानी रहता है लेकिन उन कैनालों से जो छोटी नहरें निकाली गईं थीं, उनपर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया। कृष्ण नारायण मिश्र पानी में डूबे एक पंपिंग सेट को दिखाते हुए कहते हैं, "अगर वितरणी में पानी ही आता तो पंपिंग सेट लगाने की क्या ज़रूरत पड़ती।" कोसी परियोजना के अंतर्गत कटैया में जो पनबिजली घर बनाया गया था, उसकी भी हाल बेहाल ही है। कहां तो इसे 19 मेगावॉट बिजली का उत्पादन करना था, वहीं अब उत्पादन तो दूर, इसके मोटर और संयत्र को चालू रखने के लिए बाहर से 20 मेगावॉट बिजली लेनी पड़ती है। स्थानीय इंजीनियर कहते हैं कि कुछ सालों पहले इसे दोबारा चालू किया गया था. 12 मेगावॉट बिजली का उत्पादन भी होने लगा, लेकिन फिर रख रखाव और मेंटेनेंस नहीं हो पाया। कोसी परियोजना को लेकर सबसे ख़राब बात यह है कि इसकी नाकामियों पर कोई बात नहीं करना चाहता। अब जबकि बाढ़ से हाहाकार मचा है, अधिकारी सवालों का जवाब देने से बच रहे हैं। अपने ऊपर के अधिकारियों पर थोपने लगे हैं। जब हमने बात की जल संसाधन विभाग में तो चीफ़ इंजीनियर राजेश कुमार ने कहा कि इसके लिए आपदा विभाग से बात करिए। आपदा प्रबंधन विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी कहते हैं, "इस वक़्त हमारा सारा ध्यान बाढ़ से निपटने पर फोकस करने पर है। इसके पहले क्या हुआ, नहीं हुआ, इसका हिसाब तो बाद में किया ही जाएगा।" कोसी परियोजना पर सवालों का जवाब देने से प्रत्यय अमृत बचते नज़र आए। साफ़ कहा कि परियोजना के अंतर्गत काम जल संसाधन विभाग के तहत होता है, हिसाब उनसे लिया जाए।" प्रत्यय अमृत जिन बातों का हिसाब लेने के लिए कहते हैं, उसका एक सच और भी है। कोसी नवनिर्माण मंच के महेंद्र यादव कहते हैं, "आज तक 2008 के हज़ारों बाढ़ पीड़ितों को मुआवज़ा नहीं मिल पाया है।" "कुसहा की त्रासदी के समय जो जांच कमेटी बनाई गई थी, उसने अपने रिपोर्ट में कहा था कि यह सबकुछ सिस्टम के फेलियर और लापरवाही की वजह से हो रहा है। लेकिन किसी पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।" स्पष्ट है कि कोसी परियोजना के नाम पर बेहिसाब पैसा ख़र्च हुआ है। अभी भी हो रहा है। लेकिन इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जिन कामों के लिए पैसा ख़र्च किया गया वो आज तक नहीं हो पाए।

हम क्यों नहीं लेते बाढ़ संबंधी एहतियात

बाढ़ प्राकृतिक आपदा हो सकती है। विकास प्रक्रिया के कतिपय दोषों के कारण इसका स्वरूप विकराल भी हो सकता है, लेकिन इस पर नियंत्रण करने का कार्य कठिन होते हुए भी, असंभव नहीं है। सुव्यवस्थित आयोजन एवं कार्यनीति को अपना कर ऐसी परिस्थितियां पैदा की जा सकती हैं कि बाढ़ एवं जल आप्लावन की स्थिति उत्पन्न ही न हो। अब तो ऐसी टेक्नोलाॅजी का विकास हो गया है जिसका प्रयोग करके दो या तीन दिन पूर्व ही अधिकाधिक वर्षा होने या बाढ़ आने की चेतावनी देकर लोगों को बाढ़ के खतरों से बचाया जा सकता है तथा बहुत बड़ी सीमा तक बाढ़ से होने वाली क्षति को न्यूनतम किया जा सकता है। लेकिन देश की सरकार और राज्य सरकारों द्वारा बाढ़ पर काबू करने संबंधी एहतियात केवल योजनाओं का रूप लेकर ठप हो जाती है। प्रत्येक वर्ष बजट के वक्त बाढ़ नियंत्रण और उस पर काहबू पाने संबंधी योजनाओं उल्लेख किया जाता है लेकिन इनमें से ज्यादातर योजनाएं कागजों पर भी रह जाती है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग हर वर्ष बाढ़ की वजह से हजारों लोगों की मौत हो जाती है। बाढ़ की चपेट में आकर मरने वालों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बस इतनी है कि मृतकों के परिवार वालों को मुआवज़ा दे दिया जाता है। 

भारत में बाढ़-नियंत्रण हेतु किये गये उपाय

भारत सरकार एवं राज्य सरकारें बाढ़ की विभीषिका को कम-से-कम करने के लिये योजना काल से ही कई प्रयास करती रही हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में अलग से धन की व्यवस्था की जाती है। इस दिशा में किये गये प्रयासों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है :

राष्ट्रीय बाढ़ - प्रबंधन कार्यक्रम : सन 1954 की भीषण बाढ़ के बाद भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय बाढ़-प्रबंधन कार्यक्रम की घोषणा की। यह कार्यक्रम तीन चरणों में विभाजित किया गया है, तात्कालिक, अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक। तात्कालिक बाढ़ प्रबंधन, बाढ़ से सम्बंधित आँकड़ों के संकलन तथा आपातकालीन बाढ़ सुरक्षा उपायों तक सीमित है। अल्पकालिक चरण में कुछ चुने हुए क्षेत्रों में नदियों के किनारे तटबंधों का निर्माण किया जाता है, जबकि, दीर्घकालिक चरण में वर्षा के पानी का भंडारण; नदियों, सहायक नदियों पर जलाशयों के निर्माण कार्य आदि किये जाते हैं।। इन कार्यक्रमों पर पहली योजना में 133.77 करोड़, रुपये, दूसरी योजना में 49.15 करोड़ रुपये, तीसरी योजना में 86 करोड़ रुपये, चौथी योजना में 171.8 करोड़ रुपये, पाँचवीं योजना में 298.61 करोड़ रुपये, छठीं योजना में 596.07 करोड़ रुपये तथा सातवीं योजना में 941.58 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है। सन 1954 से मार्च 1989 तक लगभग 15,600 किलोमीटर लम्बे तटबंधों का निर्माण किया जा चुका है, 33,100 किलोमीटर लम्बी जल-निकासी नालियाँ खोदी गयी हैं, 765 नगर-बचाव हेतु वनरोपण कार्य किया गया है तथा 4,705 ग्रामों को ऊँचाई वाले सुरक्षित स्थानों पर बसाया गया है।

जलाशयों का निर्माण : जिन नदियों की निचली धाराओं में सर्वाधिक एवं विनाशकारी बाढ़ आती थी, उन पर बड़े-बड़े बाँध बनाकर जलाशयों में वर्षा के पानी को रोकने की व्यवस्था की गयी है। इन वृहत-स्तरीय परियोजनाओं में महानदी पर हीराकुंड बाँध, दामोदर नदी घाटी परियोजनाओं सतलुज पर भाखड़ा बाँध, व्यास पर पोंग बाँध तथा ताप्ती पर उकाई बाँध प्रमुख हैं।

समुद्री क्षेत्रों में बाढ़ - नियंत्रण : केरल, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश के समुद्र-तटीय क्षेत्रों में समुद्री बाढ़ आती है। समुद्री तटों पर क्षरण को रोकने की कई परियोजनाएँ प्रारम्भ की गयी हैं। केरल राज्य में सर्वाधिक प्रभावित 320 किलोमीटर लम्बे समुद्री तट में से 311 किलोमीटर लम्बे तट को मार्च, 1990 के अंत तक प्रतिरक्षित कर लिया गया है। इसके अतिरिक्त 42 किलोमीटर लम्बी सामुद्रिक दीवार को मजबूत बनाया गया है। इसी प्रकार कर्नाटक राज्य में मार्च 1990 के अंत तक 73.3 किलोमीटर लम्बे समुद्री तट को सामुद्रिक क्षरण से रोकने हेतु बचाव कार्य किये गये हैं।

बाढ़ का पूर्वानुमान एवं चेतावनी : बाढ़ प्रबंध हेतु पूर्वानुमान लगाना और पहले से चेतावनी देना महत्त्वपूर्ण तथा किफायती उपायों में से एक है। भारत में यह कार्य सन 1959 से ही किया जा रहा है। केन्द्रीय जल आयोग ने देश की अधिकांश अन्तरराज्यीय नदियों पर कई बाढ़ पूर्वानुमान तथा चेतावनी केन्द्र स्थापित किये हैं। इस समय 157 बाढ़ पूर्वानुमान केन्द्र कार्यरत हैं, जो देश की 72 नदी बेसिनों में हैं। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 5,500 बाढ़ सम्बंधी पूर्वानुमान जारी किये जाते हैं। इनमें से 95 प्रतिशत अनुमान शुद्धता की स्वीकृत सीमान्तर्गत होते हैं।

ब्रह्मपुत्र बाढ़ - नियंत्रण बोर्ड : ब्रह्मपुत्र और बारक नदी घाटी देश में बाढ़ से प्रभावित होने वाला प्रमुख क्षेत्र है। इस क्षेत्र में बाढ-नियंत्रण का मास्टर प्लान तैयार करने और इसे कार्यान्वित करने के लिये भारत सरकार ने संसद के एक अधिनियम द्वारा सन 1980 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड गठित किया है।

ठप होती परिवयोजनाएं

कोसी परियोजना शुरू में 100 करोड़ रुपए की परियोजना थी। जिसे 10 सालों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। सुपौल के वीरपुर के पास रहने वाले कृष्ण नारायण मिश्र कहते हैं, "कोसी परियोजना को लेकर जो भी असल में काम हुआ था, इन्हीं 10 सालों के दौरान हुआ। चाहे वह कोसी के दो तरफ़ तटबंध बनाकर पानी को मोड़ना हो, पूर्वी और पश्चिमी कैनाल बनाकर सिंचाई की व्यवस्था करनी हो, या फिर कटैया में पनबिजली घर का निर्माण।" लेकिन कृष्ण नारायण मिश्र यह भी कहते हैं कि, "उसके बाद के सालों में मरम्मत, नए निर्माण, बाढ़ राहत और बचाव के नाम पर जम कर पैसे का बंदरबांट हुआ। लगभग हर साल इस मद में फंड पास होता है, एस्टिमेट बनता है, लेकिन काम क्या होता है? यदि तटबंधों का मरम्मत और बाढ़ से निपटने की तैयारियां पहले कर ली जाए तो फिर वे टूटेंगे कैसे?" सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार अगर पिछले कुछ सालों के दौरान कोसी परियोजना के अंतर्गत बड़े कामों का ज़िक्र करें तो दो योजनाएं बनायी गईं। पहली योजना बाढ़ राहत और पुनर्वास की थी। जिसके तहत विश्व बैंक से 2004 में ही 220 मिलियन अमरीकी डॉलर का फंड मिला था। उससे तटबंधों के किनारे रहने वाले बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए पक्का घर बनाए जाने थे और ज़मीन देनी थी। कुल दो लाख 76 हज़ार लोगों को चिह्नित किया गया था जिनके मकान बनने थे। बिहार सरकार के योजना विकास विभाग ने इस काम को करने का लक्ष्य 2012 रखा। पहले चरण में कुल 1 लाख 36 हज़ार मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन 2008 में कुसहा के समीप तटबंध टूटने से त्रासदी आ गई। पहले चरण का काम 2012 तक भी पूरा नहीं हो पाया। पिछले साल यानी 2018 तक काम चलता रहा। लेकिन मकाम बन पाए मात्र 66 हज़ार के क़रीब। पहले चरण के बाद अब उस योजना को बंद कर दिया गया है। बाक़ी का पैसा क्या हुआ? बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कृष्ण नारायण मिश्र कहते हैं, "किसी को नहीं पता क्या हुआ पैसा? हां, 2008 की त्रासदी के बाद वीरपुर में कौशिकी भवन का निर्माण किया गया।" "मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस आलीशान भवन से उद्घाटन के समय कहा था कि यहीं से पूरे कोसी क्षेत्र के बाढ़ पर नज़र रखी जाएगी, लेकिन आप जा कर देखिए कौशिकी भवन में तो आपको समझ में नहीं आएगा कि आख़िर इतनी बड़ी इमारत किसके लिए बनायी गई थी। कोई काम करने वाला ही नहीं है उधर।"

हम जब कौशिकी भवन पहुंचे तो सच में हमें वहां कोई अधिकारी नहीं मिला। इक्के-दुक्के कर्मचारी थे जो इधर-उधर घूम रहे थे। पूछने पर पता चला कि साहेब लोग साइट पर गए हैं। कोसी नवनिर्माण मंच के संस्थापक महेंद्र यादव कहते हैं कि, "वास्तव में कौशिकी भवन 2008 की कुसहा त्रासदी के बाद मरे हुए लोगों के लिए बनाया गया एक स्मारक है। जो बनाया तो गया था बाढ़ रोकने के लिए और पुनर्वास सुचारू करने के लिए, मगर अब केवल नाम के लिए रह गया है।" वर्ल्ड बैंक की वेबसाइट से पता चला कि अभी भी कोसी क्षेत्र में बिहार कोसी बेसिन डेवलेपमेंट प्रोजेक्ट नाम से एक योजना चालू है। 2015 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य 2023 रखा गया है। यह कुल 376 मिलियन अमरीकी डॉलर का प्रोजेक्ट है।" इसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ के संभावित ख़तरे से निपटना है तथा जल का वितरण कर कोसी क्षेत्र के किसानों के लिए सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करानी है। रिपोर्टिंग के दौरान कई जगहों पर तटबंधों की मरम्मती होती दिखी। स्थानीय इंजीनियरों ने बताया कि यह काम इसी योजना के अंतर्गत चल रहा है। ऐसे में जब कोसी का पानी तटबंधों को तोड़ने लग गया हो, सभी जगह तटबंधों के पानी ने छू लिया है, तब मरम्मत का काम करने का मतलब क्या है?

इन राज्यों में होता है बाढ़ का अधिक असर 

भारत में बंगाल, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, केरल, असम, बिहार, गुजरात, उत्तरप्रदेश, हरियाणा और पंजाब ऐसे राज्य हैं जिनमें बाढ़ का ज्यादा असर होता है। ऐसा कई बार हुआ है कि सूखे के लिए जाना जाने वाला राजस्थान भी बाढ़ की चपेट में आ गया। मानसून की होने वाली बहुत अधिक बरसात दक्षिण पश्चिम भारत की नदियां जैसे ब्रहमपुत्र, गंगा, यमुना आदि बाढ़ के साथ इन प्रदेशों के किनारे बसी बहुत बड़ी आबादी के लिए खतरे और विनाश का पर्याय बन जाते हैं। इन सभी बड़ी नदियों के आसपास या किनारों पर बसे शहर, गांव और कस्बे इसका सबसे ज्यादा शिकार बन जाते हैं। 

भारत की इन नदियों में आता है बाढ़

भारत की कई नदियां ऐसी हैं, जहा हर साल भारी बारिश के बाद बाढ़ की स्थिति बन जाती है। देश की इन नदियों में रावी, यमुना-साहिबी, गंडक, सतलज, गंगा, घग्गर, कोसी तीस्ता, ब्रह्मपुत्र महानदी, महानंदा, दामोदर, गोदावरी, मयूराक्षी, साबरमती शामिल है। इनकी सहायक नदियों में पानी किनारों को छोड़-छोड़कर बड़ी दूर तक पानी फैल जाता है। राज्य के राज्यवार बाढ़ प्रवृत क्षेत्रों को समझा जा सकता है। ज्यादातर राज्यों में बाढ़ प्रवृत्त इलाका भी इस प्रकार है। विभिन्न राज्यों के बाढ़ प्रवृत क्षेत्रों का इलाका ज्यादा बढ़ता जा रहा है। उत्तरप्रदेश में ऐसे क्षेत्र की संख्या इस प्रकार है। उत्तर प्रदेश में 7.336 लाख हैक्टेयर, बिहार में 4.26 लाख हैक्टेयर, पंजाब में 3.7 लाख हैक्टेयर, राजस्थान में 3.26 लाख हैक्टेयर, असम 3.15 लाख हैक्टेयर, बंगाल 2.65 लाख हैक्टेयर, उड़ीसा का 1.4 लाख हैक्टेयर और आंध्र प्रदेश का 1.39 लाख हैक्टेयर, केरल का 0.87 लाख हैक्टेयर, तमिलनाडु का 0.45 लाख हैक्टेयर, त्रिपुरा 0.33 लाख हैक्टेयर, मध्यप्रदेश का 0.26 लाख हैक्टेयर का क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित होता है।

देश में बाढ़ की कुछ प्रमुख घटनाएं - 

6 अप्रैल - जम्मू-कश्मीर की कश्मीर घाटी के कई हिस्सों और श्रीनगर में भारी बारिश के बाद पानी भरा और लोगों को 2005 की भारी तबाही की यादें एक बार फिर ताजा हो गईं। तब झेलम में आई बाढ़ ने 44 जिंदगियों को लील लिया था और 12,565 घर क्षतिग्रस्त हो गए थे।

21 अप्रैल- भारी बारिश के बाद मेघालय के दक्षिण पश्चिम गारो हिल्स जिले के निचले इलाकों में पानी भर गया। करीब 20 लोग बेघर हो गए।

5 जून- लगातार कई दिनों की बारिश के कारण असम के 3 जिलों लखीमपुर, करीमगंज और दारंग में करीब 60,000 लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया।

4 जुलाई- असम में स्थिति और गंभीर हुई और कुल 2.70 लाख लोगों का जीवन प्रभावित हो गया। केवल करीमगंज जिले में 15,000 लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा और उन्होंने 112 राहत शिविरों में शरण ली। करीब 500 गांव जलमग्न हो गए और 8,000 हेक्टेयर में खड़ी फसलें तबाह हो गईं। ताजा स्थिति के अनुसार 24 जुलाई तक असम में बाढ़ से 76 लोगों की मौत हो चुकी है।

15 जुलाई- भीषण बारिश के बाद उड़ीसा के रायगढ़ और कालाहांडी जिलों में करीब 12 गांव पूरी तरह बाहरी दुनिया से कट गए। रेल, रोड क्षतिग्रस्त हो गए और कम से कम 5 पुल बह गए।

गुजरात के बनासकांठा में बाढ़ का पानी भर जाने के कारण 25,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है। धनेरा में केवल 6 घंटों में हुई 235 एमएम बारिश के बाद धनेरा, डीसा और थराड में हालात बदतर हो गए और घरों में पानी घुस गया।

असम और बिहार में बाढ़, सालाना त्रासदी

बाढ़ की घटनाओं की ये फेहरिस्त बढ़ती ही जा रही है। इसमें दोनों ही तरह के इलाके हैं। असम जैसे राज्य भी हैं, जहां बाढ़ एक सालाना त्रासदी है, लेकिन कश्मीर, राजस्थान, गुजरात जैसे राज्य भी हैं, जो हाल के वर्षों में भीषण बारिश और बाढ़ के हालात से रूबरू हो रहे हैं। इस वर्ष असम में बाढ़ ने भारी मात्रा में तबाही मचाई है। प्रदेश की स्थिति काफी खराब है। 33 में से 30 जिले इससे प्रभावित हैं। जानकारी के मुताबिक, असम में बाढ़ और लैंडस्लाइड से तकरीबन 15 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 52 लाख लोग इससे प्रभावित हैं। असम राज्य आपदा प्रबंधन के एक अधिकारी के मुताबिक 4,663 गांव के 52.6 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं। असम के अलावा बिहार के कई इलाके भी बाढ़ से ग्रस्त हैं। असम में बाढ़ से हालात बहुत खराब हैं। अब तक बारिश से यहां बहुत नुकसान हुआ है। बाढ़ का असर 4663 गांवों पर असर पड़ा है। करीब 52.6 लाख लोग बाढ़ की चपेट में आए गए हैं। करीब 1.47 लाख रिलीफ कैंप में रहने को मजबूर हैं। साथ 1,63969 हेक्टेयर फसल पर असर पड़ा है। असम में बाढ़ से 2007 लेकर 2017 तक 742 लोगों की मौत हो चुकी हैं। इस दौरान केंद्र सरकार ने प्रदेश को 2043 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देने का वादा किया। लेकिन असल में प्रदेश को 812 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद ही मिल सकी। वहीं 2007-2017 के बीच प्रदेश में बाढ़ से फसल और संपत्ति का नुकसान 23, 493 करोड़ रुपये रहा। इस बीच संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भारत और क्षेत्र के अन्य बाढ़ प्रभावित देशों को सहायता की पेशकश की है। यूएन के उप-प्रवक्ता फरहान हक ने मानसून सीज़न में प्रभावित हो रहे लोगों की मदद के संबंध में कहा, 'संयुक्त राष्ट्र प्रभावित देशों में अधिकारियों के साथ काम करने के लिए तैयार है। फरहान ने कहा, 'मानसून में आई भारी बारिश के कारण दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया जिसमें भारत, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार शामिल है, बाढ़ से जूझ रहे हैं। इसमें लोगों ने अपनी जान गंवाई है। लोग बेघर हुए हैं और काफी संपत्ति का नुकसान हुआ है। इस विनाश से गुटेरेस काफी दुखी हैं।'

क्या कहते हैं आंकड़े ?

गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से पिछले साल सितंबर में जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में बाढ़ के कारण 1.09 करोड़ लोग प्रभावित हुए। 850 लोगों को जान गंवानी पड़ी, जिनमें 184 मध्य प्रदेश में, 99 उत्तराखंड में, 93 महाराष्ट्र में 74 उत्तरप्रदेश में और 61 गुजरात में थे। बिहार में 31 जिलों के 86 लाख लोगों पर मुसीबत का पहाड़ टूटा, जिनमें से 249 लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे। कुछ ऐसा ही हाल असम में रहा, जहां 35 में से 30 जिलों में बाढ़ के कहर ने करीब 35 लाख लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान के लिए खून के आंसू रुला दिया। पिछले करीब डेढ़ दशकों से हालात ये बनने लगे हैं कि लगभग हर दूसरे-तीसरे साल किसी न किसी राज्य या शहर में भारी बारिश और बाढ़ के कारण त्रासदी इतिहास का हिस्सा बन रही है। वर्ष 2004- बिहार के 20 जिलों में 2.10 करोड़ लोगों को प्रभावित करने वाली बाढ़ ने 3272 पशुओं और 885 लोगों की बलि ली। वर्ष 2005, 26 जुलाई को मुंबई में हुई भारी बारिश ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। मुंबई में औसतन 242 एमएम बारिश होती है, लेकिन उस दिन 24 घंटे में शहर में 994 एमएम वर्षा दर्ज की गई। पूरी मुंबई जहां के तहां ठहर गई। लोग 2-2 दिन तक ऑफिस से घर नहीं जा सके। जो जहां था, वहीं ठहर गया। वर्ष 2005, इस साल गुजरात ने भी अपने इतिहास की भीषणतम बाढ़ देखी। बहुत कम समय में हुई 505 एमएम बारिश के बाद करीब 7200 गांवों में पानी घुस गया और 1.76 लाख लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा।  वर्ष 2008, एक बार फिर बिहार में 23 लाख लोग बाढ़ की चपेट में आए, जिनमें से 250 तो मौत के मुंह में ही समा गए। कुल 8.4 लाख हेक्टेयर जमीन पूरी तरह धुल गई और 3 लाख मकान क्षतिग्रस्त हो गए। वर्ष 2010, लद्दाख में छह विदेशियों सहित 255 लोग बाढ़ की भेंट चढ़ गए। वर्ष 2012, ब्रह्मपुत्र में आई बाढ़ ने न केवल 60 लोगों को बेघर किया, बल्कि 124 लोगों की जान भी ले ली, साथ ही काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क में 540 जानवर भी काल-कवलित हो गए। वर्ष 2014, जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ़ में 280 लोग मारे गए और करीब 400 गांव पूरी तरह डूब गए। वर्ष 2015, चेन्नई ने पिछले 100 सालों की सबसे भीषण बाढ़ देखी। जब दिसंबर के पहले हफ्ते में हुई करीब 500 एमएम बारिश के बाद पूरा शहर डूब गया। इस बाढ़ से 20,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

क्या कहते हैं दुनिया के वैज्ञानिक?

आंकड़ों को हासिल करने की क्षमताएं हर देश में अलग-अलग होती हैं और कुछ देश सामान्य नियमों का पालन भी नहीं करते हैं। इसके साथ ही कुछ देशों के पास ऊंची क्षमता वाले कंप्यूटर भी नहीं होते हैं, जिससे वह ठीक-ठीक पूर्वानुमान लगा सकें। हालांकि, वैज्ञानिकों के मुताबिक़, ज़्यादातर देशों के पास मौसम, हाइड्रोलॉजी और इंसानी गतिविधियों के प्रभाव से जुड़ी जानकारी होती है लेकिन वे हमेशा इन सभी पहलुओं को मिलाकर एक बड़ी तस्वीर नहीं देखते हैं। सयुंक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 1995 से 2015 तक प्राकृतिक आपदाओं से मारे गए 1,57,000 लोगों में से आधे लोगों की मौत के लिए बाढ़ ज़िम्मेदार थी। ऐसे में बाढ़ का पूर्वानुमान लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठोस क़दम उठाए जा रहे हैं, जिससे बाढ़ प्रभावित देशों की मदद की जा सके। विश्व मौसम विभाग इस समय 60 देशों के साथ मिलकर बाढ़ पूर्वानुमान क्षमताओं का विकास करने के काम पर लगा हुआ है। हर साल बाढ़ की वजह से पांच हज़ार लोगों की जान जाती है। विश्व मौसम विभाग की हाइड्रोलॉजिकल फोरकास्टिंग एंड रिसोर्स डिविज़न के प्रमुख अधिकारी पॉल पिलन कहते हैं, "हम कई उपग्रहों से बारिश के आंकड़े और मौसम का पूर्वानुमान देंगे और हमारी इस परियोजना से जुड़े सदस्य देश इस जानकारी को स्थानीय स्तर पर हासिल किए गए आंकड़ों से मिला सकते हैं, ताकि ठीक आकलन किया जा सके। हाई रिजोल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरें स्थानीय प्रशासन को नदी के रास्ते में हो रहे परिवर्तन की जानकारी देंगी।" इस परियोजना का उद्देश्य बारिश, तापमान, जल के बहाव, मिट्टी में नमी के स्तर और दूसरे कारकों से जुड़े आंकड़े देना और सदस्य देशों से ट्रांसनेशनल नदियों से जुड़ी जानकारी साझा करना है। इस परियोजना पर अभी काम चल रहे है और ये छह महीने में शुरू होगी।

भारत में ये क्षेत्र होते हैं प्रभावित 

इस सूची में हिमाचल प्रदेश का 0.23 लाख हैक्टेयर, महाराष्ट्र का 0.23 लाख हैक्टेयर, जम्मू और कश्मीर 0.1 लाख हैक्टेयर, मणिपुर का ऐसा क्षेत्र 0.08 लाख हैक्टेयर और  दिल्ली का 0.08 लाख हैक्टेयर नोट किया गया था। इस मामले में कर्नाटक का 0.02 लाख हैक्टेयर, मेघालय का 0.02 लाख हैक्टेयर क्षेत्र और पांडिचेरी के 0.01 लाख हैक्टेयर क्षेत्र को बाढ़ प्रभावित करती है।‍ इस तरह देश में लगभग प्रतिवर्ष 33.516 लाख हैक्टेयर का इलाका इससे प्रभावित क्षेत्र में शामिल होता है, लेकिन जब बहुत अधिक बरसात होती है तो बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का इलाका भी बढ़ जाता है। सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है। हालांकि उत्तर भारत के बाढ़ से प्रभावित होने वाले भागों में तीन डिवीजन प्रमुख हैं। गंगा बेसिन का क्षेत्र : अपनी उत्तरी सहायक नदियों की अधिकता के कारण गंगा बेसिन का ज्यादातर क्षेत्र बाढ़ को झेलता है लेकिन इन इलाकों में  सर्वाधिक बुरी तरह प्रभावित  होने वाले क्षेत्र, बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश हैं। गंगा बेसिन के प्रभावित राज्यों में इन  बड़ी नदियों की सहायक नदियों  जैसे सारदा, राप्ती, गंडक और घाघरा नदियां पूर्वी उत्तरप्रदेश को बाढ़ग्रस्त बनाती हैं। इसी तरह हरियाणा और दिल्ली में बाढ़ का प्रमुख कारण यमुना नदी है। बिहार में प्रतिवर्ष बाढ़ अपनी पूरी भयंकरता के साथ लोगों को निशाना बनाती है, पर गंगा बेसिन के सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले राज्यों में बिहार सबसे पहले है और प्रतिवर्ष बाढ़ का तांडव लाने में बूड़ी गंगा, महानंदा, भागीरथी, दामोदर आदि नदियां अपर्याप्त पानी निकलने के रास्तों के कारण बाढ़ को भयानक रूप देती है।  ब्रह्मपुत्र और बराक के बेसिन : जब कभी ब्रह्मपुत्र और बराक बेसिन में अतिरिक्त पानी आ  जाता है तो यह अपने साथ तबाही भी लाता है। ये नदियां अपनी सहायक नदियों के  साथ उत्तर-पूर्व के राज्यों जैसे बंगाल, असम और सिक्किम में कहर बरपाती हैं। जलदाखा तीस्ता और तोरसा पूर्वी बंगाल में और मणिपुर की नदियों में बाढ़ लाती है और बरसात के दौरान सभी नदियां अपने किनारों को तोड़कर बहने लगती हैं। मध्य भारत और दक्षिणी नदियों के बेसिन : उड़ीसा में बाढ़ का प्रमुख कारण महानदी, बैतरणी और ब्राह्मणी जैसी नदियां हैं जो इस राज्य में तबाही के लिए जिम्मेदार हैं। इन तीनों नदियों के डेल्टाओं में बहुत अधिक और घनी आबादी निवास करती है। केरल में भी नदियां और समीपवर्ती पहाड़ों से गिरकर बहने वाली नदियां विनाश की लीला लिखती हैं, लेकिन दक्षिणी और मध्य भारत में बाढ़ का प्रमुख कारण नर्मदा, गोदावरी, तापी, कृष्णा और महानदी है जिनमें भारी वर्षा के दौरान पानी बहुत बढ़ जाता है। गोदावरी के डेल्टाई क्षेत्रों में तूफानी चक्रवात गोदावरी, महानदी और कृष्णा में बाढ़ लाने का काम करते हैं और इनके कारण आंध्र प्रदेश के समुद्र तटीय इलाकों में, उड़ीसा और तमिलनाडु में बाढ़ आती है। अब यह भी जान लीजिए कि बाढ़ इन क्षेत्रों को कितना ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।  औसत वार्षिक बाढ़ से प्रतिवर्ष 1953 से 1999 तक इतनी अधिक मात्रा में नुकसान हुआ है। इस बाढ़ से राज्यों और बाढ़ग्रस्त होने वाले इलाके का नुकसान इस प्रकार है। प्रत्येक वर्ष बाढ़ कम से कम 13 अरब 40 करोड़ का नुकसान पहुंचाती है और यह नुकसान 81.11 लाख हैक्टेयर जमीन को प्रभावित करता है। इस बाढ़ के कारण 35.7 लाख हैक्टेयर में खड़ी फसलें बर्बाद होती हैं। बाढ़ के प्रकोप से कम से कम 1600 लोगों की मौत होती है और 95 हजार जानवरों की मौत हो जाती है। बाढ़ का वर्ष 2017 और पहले मात्र एक वर्ष के आंकड़ों से देश में आने वाली बाढ़ों की ‍भयावहता का अंदाजा लगा सकते हैं। यह बाढ़ का समाजवादी चेहरा है कि इसने देश के ज्यादातर हिस्सों में तबाही मचाई है और देश का कोई कोना इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा है।

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