प्रदेश में गठबंधन की सरकार के पुर्ज़े ढीले

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बेंगलुरु, (परिवर्तन)। कर्नाटक की राजनीति में घमासान छिड़ा है। 2018 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद से ही यहां की राजनीति में उथल - पूथल जारी है। क्योंकि चुनाव के परिणाम में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिली थी इसी वजह से प्रदेश की एक बड़ी पार्टी होने के नाते गवर्नर ने भाजपा को 105 सीटों के साथ सत्ता सीट पर बैठने के लिए आमंत्रित किया।

भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार यानी बीएस येदियुरप्पा ने गरिमामय पद की शपथ भी ली। लेकिन इसके चंद घंटों के बाद ही कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा की पार्टी यानी जनता दल (सेक्यूलर) के साथ गठबंधन कर लिया और बहुमत की संख्या हासिल की, जिसके बाद भाजपा के येदियुरप्पा को महज एक दिन के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। कांग्रेस और जेडी(एस) के गठबंधन पर मुख्यमंत्री के पद पर एचडी  कुमारस्वामी ने शपथ ग्रहण किया। हालांकि शुरुआत से ही कांग्रेस और जेडी(एस) के गठबंधन से दोनों ही पार्टी के दिग्गज नेता और कार्यकर्ता नाखुश थे और समय के साथ साथ इनमें असंतोष का माहौल बढ़ता चला गया। जिसका नतीजा आज यह हुआ कि दोनों ही पार्टी के कई बड़े कैबिनेट के नेताओं से पिछले दिनों विधानसभा के स्पीकर को अपना इस्तीफा सौंप दिया है।

एक ओर जहां यह आशंका लगाई जा रही है कि दिग्गज नेताओं के इस्तीफे के पीछे भारतीय जनता पार्टी का हाथ व "ऑपरेशन कमल" है, वहीं दूसरी ओर सूत्रों की मानों तो इन नेताओं का कहना है कि यह फैसला उन्होंने किसी के दवाब में नहीं लिया, बल्कि वे पार्टी प्रमुख द्वारा लिए गए फैसले से नाखुश थे, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा देने का निर्णय़ लिया।


अंतोष का कारण बना गठबंधन

सच्चाई यह है कि कर्नाटक में यह सरकार अपने गठन के बाद से लगातार किसी न किसी विवाद में घिरी रही है और हमेशा अस्थिर ही नजर आई है। पिछले साल राज्य विधानसभा के चुनाव में बीजेपी ने 104 सीटें जीतीं और बहुमत से मात्र 9 सीटें दूर रह गई। कांग्रेस को 80 और जेडीएस को 37 सीटें मिली थीं। 17 मई 2018 को बीजेपी के नेता बीएस येदियुरप्पा ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा वे नहीं जुटा सके और 19 मई 2018 को इस्तीफा दे दिया। इसके बाद जेडीएस और कांग्रेस ने मिलकर राज्य में गठबंधन सरकार बनाई। जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री और कांग्रेस के जी परमेश्वर उप-मुख्यमंत्री बने। लेकिन जल्द ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया इस गठबंधन से नाराज हो गए और उन्होंने राहुल गांधी को इसे तोड़ने की सलाह दी। सिद्धारमैया की सलाह को राहुल गांधी ने नहीं माना। कहा जा रहा है कि वर्तमान संकट की जड़ में सिद्धारमैया ही हैं क्योंकि इस्तीफा देना वाले ज्यादातर एमएलए उन्हीं के समर्थक हैं। सच कहें तो कांग्रेस-जेडीएस सरकार बनाने के पीछे कोई सैद्धांतिक आधार या विचार नहीं था। 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सियासी जमीन गंवा चुकी कांग्रेस लोकसभा चुनाव 2019 में किसी भी तरह अपनी राजनीतिक वापसी के लिए आतुर थी। उस माहौल में अपने समर्थन से एक गैर बीजेपी सरकार बनवा कर उसने अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना चाहा और इसे अपनी सियासी जमीन की वापसी के रूप में प्रचारित किया लेकिन इस क्रम में कई जमीनी बातों को नजरअंदाज किया गया। 

स्थानीय नेताओं के लिए इसका महत्व सत्ता में टांग फंसाए रखने से ज्यादा कुछ भी नहीं था। जिन्हें अच्छा पद मिला वे संतुष्ट रहे और जिन्हें नहीं मिला वे बागी होते गए। गठबंधन बन जरूर गया लेकिन दोनों दलों में अच्छी अंडरस्टैंडिंग बनाने की कोशिश दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व ने नहीं की। यह कुमारस्वामी की भी असफलता कही जाएगी कि वे अपने पक्ष के विधायकों का विश्वास नहीं जीत पाए। बहरहाल, इस तरह के संकट पहले भी आए हैं और उनका समाधान निकाला गया है। कर्नाटक में चुनाव बमुश्किल एक साल पहले हुए हैं। इतनी जल्दी दोबारा चुनाव की नौबत आए, यह जनादेश का अपमान होगा। कांग्रेस और जेडीएस, दोनों के आलाकमान को सरकार और गठबंधन बचाने की आखिरी कोशिश जल्दी करके देखना चाहिए। 


गठबंधन वाली सरकारों का हाल 

कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) और कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार के एक दर्जन से ज़्यादा विधायकों के इस्तीफ़ा देने की वजह से राज्य सरकार संकट में घिर गई है। माना जा रहा है कि बारह जुलाई से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र के दौरान भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव भी ला सकती है। इन परिस्थतियों में एक और सवाल सामने है कि क्या कर्नाटक में गठबंधन सरकार की खस्ता हालत देश में गठबंधन सरकारों की बुरी स्थिति और उनकी समाप्ति की ओर इशारा कर रही है? हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और मज़बूत राजनीतिक दल बनकर उभरी है। जिस तरह साल 1971 में पाकिस्तान से युद्ध जीतने के बाद सत्ता का केंद्र इंदिरा गांधी हो गई थीं ठीक उसी तरह मौजूदा समय में मोदी ने सत्ता का एकीकरण कर दिया है। इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद सत्ता में आईं थीं और बहुत कम वक़्त ही बीता था कि उन्हें 'गूंगी गुड़िया' बता दिया गया। यह वो वक़्त था जब कांग्रेस पार्टी बहुत कमज़ोर नज़र आ रही थी और साल 1967 में भारत में गठबंधन की राजनीति की शुरुआत भी हुई। गठबंधन की सरकारें बनने का दूसरा चरण 1989 में शुरू हुआ। यह वो वक़्त था जब कई गठबंधन पार्टियों का उदय हुआ। इन पार्टियों ने न केवल राज्य स्तर पर सत्ता का स्वाद चखा बल्कि केंद्रीय स्तर पर भी सत्ता में रहीं। 1989 से शुरू हुआ गठबंधन का ये दौर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए के बनने तक रहा जिसने साल 2004 और 2009 में केंद्रीय स्तर पर दो सफल कार्यकाल पूरे किये। यह सिलसिला मोदी सरकार के साल 2014 में जीत तक भी बना रहा और अब तो हाल ही में हुए चुनावों में उन्होंने अपनी स्थिति को और मज़बूत कर लिया है। मई में हुए चुनावों से एक साल पहले जब बीजेपी कर्नाटक विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तो कांग्रेस ने बीजेपी के कांग्रेस मुक्त भारत के कैंपेन को समाप्त करने का फ़ैसला किया। इसका नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस पार्टी ने कुछ ऐसे फ़ैसले लिए जिस पर यक़ीन करना मुश्किल था, मसलन पार्टी ने जेडीएस के एचडी कुमारास्वामी को मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव दे दिया। इस्तीफे के पीछे राज्य में बीजेपी के ऑपरेशन कमल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। जो सदस्य इस्तीफ़ा देकर आएंगे उन्हें भविष्य में बीजेपी के टिकट से चुने जाने का वादा किया गया है। ठीक ऐसा प्रयोग 2008 में भी हुआ था, जब कर्नाटक में बीजेपी सत्ता में चुनकर आई थी। तो ऐसे में जो परिस्थितियां बन रही हैं क्या उनके आधार पर ये कहा जा सकता है कि ये देश मज़बूत एकल राजनीतिक पार्टी की ओर बढ़ रहा है? क्या इसका मतलब ये निकाला जाना चाहिए कि गठबंधन सरकारों का दौर ख़त्म होने की कगार पर है? धारवाड़ विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर हरीश रामास्वामी कहते हैं "एक लिहाज़ से ऐसा है। साल 2019 का लोकसभा चुनाव और उसके नतीजों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में राजनीतिक पार्टियों ने अपनी साख गंवाई है और साथ ही बीजेपी से मुक़ाबला करने की क्षमता भी मौजूदा समय में ऐसा कोई नेतृत्व नहीं है जो मोदी के नेतृत्व के समकक्ष खड़ा हो सके और या फिर उसे चुनौती दे सके।" राजनीतिक मामलों के जानकार महादेव प्रकाश कर्नाटक में साल 1983 में हुए पहले गठबंधन की ओर इशारा करते हैं। यह गठबंधन रामकृषण हेगड़े के नेतृत्व वाली जनता पार्टी-क्रांतिरंग के बीच हुआ था। इसे बीजेपी और कम्यूनिस्ट पार्टी का भी समर्थन था। लेकिन जब साल 1984 में लोकसभा के चुनाव हुए तो यह गठबंधन बुरी तरह पिछड़ गया क्योंकि कांग्रेस को 28 लोकसभा सीटों में से 24 सीटें मिली थीं। इसके बाद जब साल 2004 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में सामने आई तो कांग्रेस-जेडीएस का गठबंधन भी बिखर गई। एचडी कुमारस्वामी ने गठबंधन की सरकार चलाने के लिए साल 2006 में बीजेपी के साथ हाथ मिलाया यह भी बिखर गई। महादेव प्रकाश कहते हैं जेडीएस और कांग्रेस का गठबंधन, गठबंधन सरकारों के संदर्भ में तीसरा प्रयोग रहा है। अगर बात साल 2019 के लोकसभा चुनावों की करें तो पूरे देश की जनता ने गठबंधन को पूरी तरह से नकार दिया। लोगों ने तय किया कि एक पार्टी की सरकार ही सबसे अच्छी होगी क्योंकि गठबंधन लोगों को शासन नहीं दे पाता।" वहीं मैसूर यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र अस्सादी महादेव प्रकाश की बातों से सहमति नहीं रखते हैं। वो कहते हैं "गठबंधन की सरकार तमाम राजनीतिक और अन्य दूसरे मतभेदों के बादवूद काम करने में सक्षम थी। वैचारिक रूप वे धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में थे। यह तमाम पिछली राजनीतिक लड़ाइयों और अहंकार का टकराव ही है जिसने मतभेद पैदा किए हैं।" हालांकि प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फ़र अस्सादी ये ज़रूर मानते हैं कि मौजूदा गठबंधन सफल नहीं रहा है, लेकिन वो इसके पीछे बीजेपी को मानते हैं। उनका कहना है "बीजेपी हिंदू जाति समूहों का संगठन बनाने में कामयाब रही है। बीजेपी ने सभी हिंदू जातियों को एक मंच पर लाने का काम किया है। जो कि बीजेपी के हिंदुत्व से बिल्कुल अलग है। कर्नाटक में अब पहले से कहीं ज़्यादा हिंदूकरण हुआ है। हालांकि जब मैं ये कहता हूं तो मेरा मतलब हिंदू धर्म से बिल्कुल भी नहीं है। भाजपा का विभिन्न जातियों को एक मंच पर लेकर आना कांग्रेस और जेडीएस के सामाजिक आधार के ख़िलाफ़ गया।"


विचारों के मतभेद से सरकार को खतरा

कांग्रेस के अंदर मतभेद है। कांग्रेस और जेडीएस के बीच मतभेद है। बीजेपी के अंदर मतभेद है। तो आज के दिन जो विधान सभा है, वो इतने हिस्सों में बंटा हुआ है कि आप अंदाज़ा नहीं कर सकते। शायद इसलिए अमित शाह ने कुछ महीने पहले कहा था कि हम वहां नया चुनाव चाहते हैं। जिसके चलते वहां के विधायक डरे हुए हैं। वो सरकार चाहे बदलना चाहें, लेकिन नया चुनाव नहीं चाहते। बीजेपी लगातार पूरे घटनाक्रम में अपना हाथ होने से इनकार कर रही है। किसी पर आरोप नहीं लगाया जा सकता लेकिन जब सरकारें गिरती हैं तो बहुत से लोगों का हाथ होता है। हर तरफ़ से कोशिश होती है। अंदर के विरोधाभास से सरकार गिरती है, बाहर के प्रोत्साहन से सरकार गिरती है। इसलिए हमें ये देखने के लिए इंतज़ार करना होगा कि सरकार रहेगी या जाएगी। 

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