अपनी कमज़ोरी को हरा कर जीतने का मज़ा कुछ और ही है : गिरीश गौड़ा

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। हर किसी को कोई न कोई कमज़ोरी होती है, लेकिन उसे खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए। क्योंकि डट कर कमज़ोरी का सामना करने और उसे हराने के बाद जो जीत मिलती है उसका मज़ा ही कुछ और है। यह कहना है 10 बार राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता किक बॉक्सर एवं स्ट्रीट फाइटर के नाम से प्रसिद्ध बॉक्सर गिरीश गौड़ा का। वे कहते हैं कि मुश्किलें तो जीवन का अभिन्न हिस्सा है। वे जैसे आएंगे वैसे ही चले भी जाएंगे। बस मुश्किलों से डर कर अपना हौसला नहीं खोना चाहिए। गिरीश का कहना है कि जिंदगी हर मोड़ पर परीक्षा लेगी और आपको उसके लिए तैयार रहना पड़ेगा। एक बार फेल हो गए तो दोबारा खड़े होने की हिम्मत जुटाएं।

बेंगलूरु के आरटी नगर में एक साधारण से परिवार में गिरीश का जन्म 9 फरवरी 1986 में हुआ। यहां स्थानीय सरकारी स्कूल में उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। कक्षा सातवीं में पढ़ रहे गिरीश की उम्र तब महज 12 साल की थी, जब उनके पिता रामाचन्द्रा ने अपनी अंतिम सांस ली। गिरीश बताते हैं कि पिताजी के गुजर जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उठाना महत्वपूर्ण हो गया था। गिरीश ने डायरी सर्किल स्थित एक कॉलेज से आईटीआई की डिग्री प्राप्त की। जिसके बाद उन्होंने कुछ सालों तक शहर के विभिन्न जगहों पर वेल्डिंग और डिलीवरी बॉय के रूप में भी काम किया। गिरीश बताते हैं मेरे लिए कोई भी काम कभी भी छोटा नहीं था। कोई न कोई इंसान वह काम करता है और हमें उसकी इज्जत करनी चाहिए।  
छोटी सी उम्र में पिता को खोने के बाद आज गिरीश के छोटे से परिवार में उनके अलावा उनकी मां भाग्या समेत चार बड़ी बहनें, सुमित्रा, मंगल गौरी, मेनका और तेजस्विनी हैं। गिरीश बताते हैं परिवार के सभी सदस्य उपार्जन के लिए कोई न कोई काम करते हैं। बचपन से ही खेलकूद का शौक रखने वाले गिरीश अपने स्कूली दिनों में खो-खो एवं कबड्डी में चैंपियन रहे। उन्होंने स्कूल में पढऩे के दौरान कई जिला स्तरीय खेल प्रतियोगिताओं में पुरस्कार हासिल किया। 
एक डिलीवरी बॉय से लेकर किक बॉक्सर तक के सफर के बारे में बताते हुए गिरीश ने कहा कि एक रोज यूं ही अपने काम के बाद दोस्तों से मिलकर घर लौट रहा था, कि अचानक रास्ते पर पड़े एक राजनीतिक बैनर पर मेरा पैर चला गया, जो कि अनजाने में हुआ था। वे कहते हैं कि इस घटना के बाद संबंधित बैनर के पार्टी के एक प्रमुख नेता ने बीच सडक़ पर मेरी खूब बेइज्जती की। केवल इतना ही नहीं उस नेता ने मुझसे अनजाने में हुई उस ग़लती की वजह से मुझ पर हाथ भी उठाया। गिरीश बताते हैं कि मैं इस बेइज्जती को बर्दाश्त नहीं कर पाया और मैंने उनसे बदला लेने की ठानी। इसके बाद मैंने कराटे की ट्रेनिंग लेनी शुरू की। समय के साथ ही साथ बदला लेने का आक्रोश जीवन में कुछ हासिल करने के जोश में बदल गया। कराटे में ब्लैक बेल्ट मिलने के बाद गिरीश का हौसला और बढ़ गया, जिसके बाद उन्होंने भारत को गर्वित करने और किक बॉक्सिंग में शीर्ष पर पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत शुरू की। एक के बाद एक सफलता मिलती गई और किक बॉक्सिंग और स्ट्रीट फाइटरों में गिरीश का नाम शुमार हो गया। 
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतियोगिताओं में विजयी होने के बाद यह सिलसिला यूं ही चलता गया। एक दिन अचानक गिरीश की तबियत बिगड़ गई और कई विभिन्न अस्पतालों में जांच के बाद मार्च 2017 में पता चला कि उन्हें ब्लड कैंसर है। ब्लड कैंसर जैसी गंभीर और भयंकर बीमारी होने के बावजूद गिरीश में हार नहीं मानी और इस बीमारी से जंग लडऩे व जीतने की ठानी। करीब 43 दिनों तक कीमो थेरेपी लेने के बाद उनकी हालत में सुधार आने लगा। दिसंबर 2017 में अस्पताल से लौटने के बाद गिरीश को एहसास हुआ कि उनके इलाज में काफी पैसे खर्च हो गए हैं और घरवालों को मुफलिसी का सामना करना पड़ रहा है। हार न मानने की कसम खाए गिरीश ने एक बार फिर प्रैक्टिस की ओर ध्यान देना शुरू किया। डॉक्टरों के स्वस्थ घोषित करने के बाद गिरीश ने वापसी करते हुए जनवरी 2018 में दिल्ली में आयोजित नेशनल फेडेरेशन कप 2017-2018 में 81 किग्रा की श्रेणी में स्वर्ण पदक हासिल किया, जो कि उनके कैरियर का नौवां स्वर्ण पदक है। गिरीश ने यह पदक उसी कैंसर अस्पताल को दान दे दिया जहां उनका इलाज हुआ था। वे बताते हैं कि मैं नहीं चाहता जहां मैंने जिंदगी की जंग जीती है वहां कोई भी इस जंग को हारे, इसीलिए मैंने अपना नौवां स्वर्ण पदक कैंसर अस्पताल को दे दिया। ताकि हर रोज़ उसे देख कर कोई न कोई प्रेरित होता रहे।   
गिरीश बताते हैं कि जीवन में कई लोगों ने मुझे प्रेरित किया। कम उम्र में पिता को खोने के बाद कुछ लोगों ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा और उनसे जितना बन पड़ा हर संभव मेरी मदद में उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया। सतीश मित्तल और अल्का इन्हीं में से एक हैं। 
उन्होंने न केवल मुझे उठ खड़े होने की प्रेरणा दी बल्कि आर्थिक रूप से भी मेरी भरपूर मदद की। आज ऐसे ही लोगों की वजह से मैं इस मुकाम तक पहुंच पाया हूं। गिरीश कहते हैं कि मैं मानता हूं एक न एक दिन सबको मरना ही है, लेकिन मरने के पहले कुछ ऐसा करना है जो मरने के बाद भी लोग याद रख सकें। युवा वर्ग को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि हार-जीत संसार का नियम है लेकिन हार के बाद भी अगर जीतने की इच्छा रखते हो तो असल मायनो में जिंदगी जी सकते हो। इसीलिए हार कर निराश न हो हार को हार मनाकर अपने परिवार और अपने देश का नाम ऊंचा करें।

कई सेलिब्रिटीज को दे रहे फिटनेस ट्रेनिंग
अभिषेक अंबरीश
प्रज्वल देवराज
प्रणम देवराज
मेघा देवराज
चिरंजीवी देवराज

कई पुरस्कारों से हुए सम्मानित
राष्ट्रीय तौर पर 10 बार मिला स्वर्ण पुरस्कार
2016 वर्ल्ड चैंपियनशिप में मिला रजत पदक
कर्नाटक को किक बॉक्सिंग में दिलाया पहला स्वर्ण पदक

जीवन की महत्वपूर्ण बातें
प्रतिभा है तो उसे प्रदर्शित करें 
अपने लक्ष्य और दुर्दर्शिता का निर्धारण करें
कड़ी मेहनत पर जोर दें
हार मान कर पीछे न हटें
कठिनाइयों का सामना डट कर करें
गलतियों से सीखें

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